भविष्य महा पुराण

मरणासन्न (मृत्युके पूर्व) प्राणीके कर्तव्य तथा ध्यानके चतुर्विध भेद

राजा युधिष्ठिरने पूछा- भगवन्! गृहस्थ व्यक्तिको अपने अन्त समयमें क्या करना चाहिये । कृपाकर इस विधिको आप बतायें। मुझे यह सुननेको बहुत ही अभिलाषा है।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! जब मनुष्यको यह ज्ञात हो जाय कि उसका अन्त समीप आ गया है तो उसे गरुडध्वज भगवान् विष्णुका स्मरण करना चाहिये। स्नान करके पवित्र हो शुद्ध श्वेत वस्त्र धारण कर अनेक प्रकारके पुष्पादि उपचारोंसे नारायणकी पूजा एवं स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करे। अपन्ही शक्तिके अनुसार गाय, भूमि, सुवर्ण, वस्त्र आदिका दान करे और बन्धु, पुत्र, मित्र, स्त्री, क्षेत्र, धन, धान्य तथा पशु आदिसे चित्तको हटाकर ममत्वका परित्याग कर दे। मित्र, शनु, उदासोच अपने और पराये लोगों के उपकार और अपकारके विषय विचार न करे अर्थात् शान्त हो जाया प्रपलपूर्वक सभी शुभ एवं अशुभ कर्मोका परित्याग कर इन श्लोकोंका स्मरण करे- मैंने समस्त भौगों एवं मित्रों का परित्याग कर दिया, भोजन भी छोड़ दिया तथा अनुलेपन, माला, आभूषण, गीत, दान, आसन, हवन आदि क्रियाएँ, पदार्थ, नित्य-नैमित्तिक और काय सभी क्रियाओं का उत्सर्जन कर दिया है। श्राद्धधर्मोका भी मैंने परित्याग कर दिया है. आश्रमधर्म और वर्णधर्म भी मैंने छोड़ दिये हैं। जबतक मेरे हाथ-पैर बरन रहे हैं, तबतक मैं स्वयं अपना कार्य कर लूँगा, मुझसे सभी निर्भय है, कोई भी पाप कर्मन करे। आकाश, जल, पृथ्वी, विवर, बिल, पर्वत, पत्थरोंके मध्य, धान्यादि फसलों, वस्त्र, शयन तथा आसनों आदिम जो कोई राणी अवस्थित हैं, वे मुझसे निर्भय होकर सुखी रहे जगद्गुर भगवान विष्णुके अतिरिक्त मेरा कोई बन्धु नहीं। मेरे नीचे ऊपर दाहिने-बायें, मस्तक, हृदय, बाहुओं,

इसी तरहको बातें गरुडपुराण, भागवत १ ॥ १२ ॥ ५७-५८. आदिमें महाराज मीदिनद्वारा महर्षि शुकदेवजी आदिसे यूछी गयी हैं तथा मनुष्यके जीवनका सव अन्त हो जाय, यह नहीं कहा आ सकता। अतः सदा ही ध्यानपूर्वक भगवान्का स्मरण-मजन करते रहना चाहिये,

नेत्रों तथा कानोंमें मित्ररूपमें भगवान् विष्णु ही विराज रहे हैं*।'

इस प्रकार सब कुछ छोड़कर सर्वेश भगवान् अच्युतको हदयमें धारण कर निरन्तर वासुदेवके नामका कीर्तन करता रहे और जब मृत्यु अति समीप आ जाय, तब दक्षिणान कुशा बिछाकर पूर्व अथवा उत्तरकी ओर सिरकर शयन करे तथा जगत्पति भगवान् विष्णुका इस प्रकार चिन्तन करे-

विष्णुं जिष्णुं हृषीकेशं केशवं मधुसूदनम्।

नारायणं नरं शौरि वासुदेवं जनार्दनम्॥ ॥

वाराह यज्ञपुरुष पुण्डरीकाक्षमच्युतम्।

बामनं श्रीधरं कृष्णं नृसिंहमपराजितम्॥

पद्मनाभपज श्रीशं दामोदरमधोक्षजम्।

सर्च भरे वर शुद्धमनन्तं विश्वरूपिणम्॥

चक्रिणं गदिनं शान्तं शाडिनं गरुडध्वजम् ।

किरीटकौस्तुभधरं प्रणमाम्यहमव्ययम्।।

अहमस्मि जगन्नाथ मयि वासं कुरु द्रुतम्।

आवयोरन्तरं मास्तु समीराकाशयोरिव ॥

अयं विष्णुरयं शौरिरयं कृष्णः पुरो मम।

नीलोत्पलदलश्याम: पाद्यपत्रायतेक्षण:॥

एष पश्यतु मामीशः पश्याम्यहमधोक्षजम् ।

इत्थ जपेदेकपनाः स्मरन् सर्वेश्वरं हरिम्॥

(उत्तरपन १२६ । १२-२५)

'भगवान् विष्णु जिष्या हपोकेशा, केशव, मधुसूदन, नारायण, नर, शौरि, बासुदेव, जनार्दन, बाराह, यज्ञपुरुष पुण्डरीकाक्ष, जन्मत, वामन, श्रीधर कृष्णा, नृसिंह,  अपराजित, पदानाम, जज श्रोश दामोदर, अधोक्षज, सर्वेश्वरेश्वर, शुद्ध, अनन्त, विश्वरूपी, चक्री, गदी, शान्त, शङ्खी, गरुडध्वज, किरीटकौस्तुभधर तथा अव्यय परमात्माको मैं प्रणाम करता हूँ।जगन्नाथ ! मैं आपका ही हूँ, आप शीघ्र मुझमें निवास करें। वायु एवं आकाशकी तरह मुझमें और आपमें कोई अन्तर न रहे। मैं नीले कमलके समान श्यामवर्ण, कमलनयन भगवान् विष्णु अथवा शौरि या भगवान् श्रीकृष्ण आपको अपने सामने देख रहा हूँ, आप भी मुझे देखें।'

इन मन्त्रोंको पढ़कर भगवान् विष्णुको प्रणाम करे और उनका दर्शन करे तथा 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' इस मन्त्रका निरन्तर जप करता रहे। जो व्यक्ति प्रसन्नमुख, शङ्ख, चक्र, गदा तथा पद्म धारण किये हुए, केयूर, कटक, कुण्डल, श्रीवत्स, पीताम्बर आदिसे विभूषित, नवीन मेघके समान श्यामस्वरूप भगवान् विष्णुका ध्यान कर प्राणोंका परित्याग करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो भगवान् अच्युतमें लीन हो जाता है।

राजा युधिष्ठिरने पुनः पूछा- भगवन्! अन्त समयकी जो यह विधि आपने बतायी, वह स्वस्थचित्त रहनेपर ही सम्भव है, परंतु अन्तसमयमें तरुण और नीरोगी पुरुषोंकी भी चित्तवृत्ति मोहग्रस्त हो जाती है, वृद्ध और रोगियोंकी तो बात ही क्या है। अतिवृद्ध और रोगग्रस्त व्यक्तिके लिये कुशाके आसनपर ध्यान करना तो असम्भव ही है। इसलिये प्रभो! दूसरा भी कोई सुगम उपाय बतानेका कष्ट करें, जिससे साधन निष्फल न हो।

परित्यजाम्यहं भोगांस्त्यजामि सुददोऽखिलान् ।

भोजनं हि मयोत्सएमुत्सृष्टमनुलेपनम्॥

खाभूषणादिकं गेय दानमासनमेव च।

होमादयः पदार्था देये च नित्यक्रमागताः॥

नमितिकास्तथा काम्याः डाडधर्मादयोज्झिताः ।

त्यताशा श्रमिका धमा वर्णधमांस्तथोज्झिताः॥

पस्या कराभ्या विहरत् कुवांग कम चोहहन् ।

न पापं कस्यचिन्याय्याः प्राणिनः सन्तु निर्भया: ।

नाम प्राणिनी ये च ये जले ये च भूतले ।

शिविधागा ये च ये च पाराणसटे।

धादिप च चम्ने शायनेमारनेषु च ।

से स्वयं तु विबुध्यन्ते दतं तेभ्योऽयं मया ॥

नमेऽस्ति बाधव शिशिष्j मुक्या जगद्गुरुम् ।

मित्रप च में विष्णुरधशोज तथा पुनः॥

पार्श्वतो मूभिः ह्रदये बाहुभ्यां चैव चक्षुषोः

  श्रोत्रादिषु च सर्वेषु मन विष्णुः प्रतिमिरः ॥

(उत्तरपर्व १२६।१-१६)

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! यदि और कुछ करना सम्भव न हो तो सबसे सरल उपाय यह है कि चारों तरफसे चित्तवृत्ति हटाकर गोविन्दका स्मरण करते हुए प्राणका त्याग करना चाहिये, क्योंकि व्यक्ति जिस-जिस भावका स्मरण कर प्राण त्यागता है, उसे वही भाव प्राप्त होता है। अत: सब प्रकारसे निवृत्त होकर निरन्तर वासुदेवका चिन्तन करना चाहिये।

राजन् ! अब आप भगवान्के चिन्तन-ध्यानके स्वरूपोंको सुनें, जिन्हें महर्षि मार्कण्डेयजीने मुझसे कहा था-राज्य, उपभोग, शयन, भोजन, वाहन, मणि, स्त्री, गन्ध, माल्य, वस्त्र, आभूषण आदिमें यदि अत्यन्त मोह रहता है तो यह रागजनित 'आद्य ध्यान है।

यदि जलाने, मारने, तड़पाने, किसीके ऊपर प्रहार करनेकी द्वेषपूर्ण वृत्ति हो और दया न आये तो इसे ही क्रोधजनित 'रौद्र' ध्यान कहा गया है। वेदार्थके चिन्तन, इन्द्रियोंके उपशमन, मोक्षकी चिन्ता, प्राणियोंके कल्याणकी भावना आदि ही धर्मपूर्ण सात्त्विक ('धर्म्य') ध्यान है। समस्त इन्द्रियोंका अपने-अपने विषयोंसे निवृत्त हो जाना, हृदयमें इष्ट-अनिष्ट किसीकी भी चिन्ता नहीं करना और आत्मस्थिर होकर एकमात्र परमेश्वरका चिन्तन करना, परमात्मनिष्ठ हो जाना—यह 'शुक्ल'- ध्यानका स्वरूप है। 'आद्य'-ध्यानसे तिर्यक्- योनि तथा अधोगतिकी प्राप्ति होती है, 'रौद्र'- ध्यानसे नरक प्राप्त होता है। 'धर्य' (सात्त्विक)- ध्यानसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है और 'शुक्ल' ध्यानसे मोक्षकी प्रासि होती है। इसलिये ऐसा प्रयत्न करना चाहिये, जिससे कल्याणकारी 'शुक्ल'- ध्यान में ही मन-चित्त सदा लगा रहे । (अध्याय १२६)