भविष्य महा पुराण

महाशान्ति-विधान

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-राजन् ! अब मैं भगवान् शंकरद्वारा कही गयी महाशान्तिका विधान बतलाता हूँ, यह राजाओंके लिये कल्याणकारी है तथा भयंकर विोंको दूर करनेवाली है। इस महाशान्तिको राजाके अभिषेक, यात्रा तथा दुःस्वपके समय, दुर्निमित्तमें, ग्रहोंकी प्रतिकूलतामें, बिजली और उल्काके गिरनेपर, जन्म-नक्षत्र में केतुके उदय होनेपर, पृथ्वी-कम्पन और प्रसूटिकालमें, मूलगण्डान्तमें, मिथुन संततिके उत्पत्तिकालमें, राजाके छत्र अथवा ध्वजके अपने स्थानसे पतनके समय, काक, उलूक और कबूतरके घरमें प्रवेश करनेपर, क्रूर ग्रहकी दृष्टि पड़नेपर या जन्मके समय क्रूर ग्रहोंके योग होनेपर, लग्नकुण्डलीमें द्वादश, चतुर्थ और अष्टम स्थानमें बृहस्पति, शनि, सूर्य एवं मंगलके स्थित होनेपर तथा युद्धके समय, वस्त्र, आयुध, मणि, केश, गौ, अपके विनाशके समय, रात्रिमें इन्द्रधनुष दिखायी पड़नेपर, घरके तुला-भंगके समय तथा सूर्य और चन्द्र-ग्रहणं आदिके समयमें यह महाशान्ति प्रशस्त मानी गयी है। इसके करनेसे सभी दुनिमित्त शान्त हो जाते हैं। पाण्डव! उत्तम कुलमें उत्पन्न तथा शीलसम्पन्न वैदिक ब्राह्मणोंसे इस महाशान्तिको कराना चाहिये विशेषरूपसे अथर्ववेद, यजुर्वेद तथा ऋग्वेदके ज्ञाता, पवित्र ज्ञानसम्पा, जप-होमपरायण और अनेक कृच्छादि व्रतोंके द्वारा शुद्ध व्यक्ति इसमें प्रशस्त माने गये हैं। प्रथम भगवानकी आराधना करके क्रियाका आरम्भ करना चाहिये।

दस या बारह हाथका एक सुन्दर मण्डप बनाकर उसके मध्यमें चार हाथकी वेदी बनाये और आनेय दिशामें एक हाथ प्रमाणवाला एक सुन्दर कुण्ड बनवाये एवं वह कुण्ड तीन मेखलाओंसे युक्त तथा योनिसे विभूषित होना चाहिये। मण्डपको चन्दन, माला, तोरण आदिसे अलंकृत कर गोबरसे लीपना चाहिये। मण्डपमें वेदीके ऊपर आनेयादि कोणाम वामशः चार और बीच में पाँच कलश स्थापित करना चाहिये।

*वर्तमान समयके लिये यह विषय अत्यन्त उपयोगी है। सम्पन्न, धर्मात्मा तथा राजनीति को इसका आश्रय लेकर विन कल्याण करना चाहिये। आजकल विचमें अनेक देवी और सामाजिक उपद्रव व्याप्त हैं। कोटिहोमपर कोटिन्होमात्मक-पद्धति आदि अनेक ग्रन्य प्रकाशित है, किंतु यह प्रकरण भी उपयोगी है।

कलशोंको पञ्चपल्लवों, सौषधि, पञ्चरन, रोचना, चन्दन, सप्तमृत्तिका, धान्य तथा पुण्य तीर्थके जल, नारिकेल आदिसे भलीभाँति स्थापित करना चाहिये। ब्रह्मकूर्च-विधानसे पश्चगव्यका निर्माण करे। इसके अनन्तर वैदिक मन्त्रोंसे कलशोको अभिमन्त्रित कर उनका पूजन करे। मध्य कुम्भको रुद्रकुम्भ कहा जाता है।

इसके बाद स्वस्तिवाचन करना चाहिये। अनन्तर अग्निकार्य सम्पन्न करे। 'अनि दूत०' (यजु० २२ । १७) इस मन्त्रके द्वारा कुण्डमें अग्रि स्थापित करे। 'हिरण्यगर्भ:०' (यजु० १३। ४) इस मन्त्रसे ब्रह्मासनको स्थापित करे। अग्रिपूजनके अनन्तर आज्य (घृत) का संस्कार करे, अनन्तर विधिपूर्वक यज्ञीय द्रव्योंको यथावत् स्थापित करना चाहिये। इसके बाद पुरुषसूक्त (यजु० ३१ । १-१६)-का पाठ करते हुए चरुका निर्माण करे। उसके सिद्ध होनेके बाद पृथ्वीपर स्थापित करे। इसके पश्चात् शमीको अठारह तथा पलाशकी सात समिधाओंको अग्नि प्रज्वलित करनेके लिये कुण्डमें डाले। आधार और आज्य-भाग संज्ञक हवन करनेके बाद 'जातवेदसे०' (ऋ० १। १९। १) इस ऋचाके द्वारा घीकी सात आहुतियाँ प्रदान करे। पुनः 'जातवेदसे०' इस मन्त्रसे स्थालीपाकव्यका हवन करे। 'तरत् स मन्दी०' (ऋ० ९।५८।१-४) इस सूक्तसे चार बार हवन करे। इसके बाद 'यमाय सोम' (२०१०।१४।१३) इस सबसे 'स्वाहा' शब्दका प्रयोगकर सात आहुलियाँ दे। तदनन्तर 'इदं विष्णुवि०' (यजु० ५। १५) इस मन्यसे सात बार आहुति दे। फिर २७ नक्षत्रों के

लिये २७ आहुतियाँ दे। अनन्तर 'यत्कर्मणा.' इसके द्वारा हवन करनेके बाद स्विष्टकृत् हवन करे। तदनन्तर घृतसहित तिलसे ग्रहहोम करे। इसके बाद प्रायश्चित्त-निमित्तक हवन करके होम- कर्मको समाप्त करे। तदनन्तर श्रेष्ठ द्विज यजमानके दुर्निमित्तकी शान्तिके लिये पाँच कलशोंके जलसे मन्त्रों के द्वारा यथाक्रम अभिषेक करे।'सहस्त्राक्षेण०' (ऋ० १०।१६१ । ३) इस मन्त्रसे प्रथम कलशके जलसे, 'शतायुषा०' द्वारा द्वितीय कलशके जलसे, 'सजोषा०' (ऋ०३।४७। २) इस मन्त्रसे तृतीय कलशके जलसे, 'विश्वानि देव०' (ऋ० ५। ८२।५) इस मन्त्रसे चतुर्थ कलशके जलसे तथा 'ऋतमस्तु०' इस मन्त्रसे पञ्चम कलशके जलसे अभिषेक करे। इसके बाद 'नमोऽस्तु सर्वभूतेभ्य:०' इस मन्त्रसे दिशाओंको बलि-नैवेद्य प्रदान करे।

यजमानके स्नान करनेके समय ब्राह्मणगण शान्तिका पाठ करें। चारों ओर शान्ति-जलसे जलकी धारा गिराये। अन्तमें पुण्याहवाचनपूर्वक शान्तिकर्मको सम्पन्न करे। ब्राह्मणों को यथाशक्ति भूमि, स्वर्ण, वस्त्र, शय्या, आसन एवं दक्षिणा दे। दीन, अनाथ, विशिष्ट श्रोत्रियोंको भी भोजन आदि प्रदान करना चाहिये। ऐसा करनेसे आयुकी बृद्धि और शत्रुपर तत्क्षण विजय प्राप्त होती है तथा पुत्र-लाभ होता है। जैसे शस्त्रोंका प्रहार कवचसे हट जाता है, वैसे ही दैवी विघ्र भी इस शान्तिकर्मसे दूर हो जाते हैं। अहिंसक, इन्द्रियसंयमी, धर्मसे धन अर्जित करनेवाला, दया और दक्षिणासे युक्त व्यक्तिके लिये सभी ग्रह अनुकूल हो जाते हैं*। (अध्याय १४३)

*अहिंसकस्य दान्तस्य धर्मार्जितधनस्य च। दयादश्रिन्युकस्य सानुग्रहाः ग्रहाः।।

(उत्तरपर्व १४३१)