सूतजीने कहा-ब्राहाणो! युगान्तरमें ब्रह्माने जिस अन्तर्वेदि और बहिर्वेदिकी बात बतलायी है, वह द्वापर और कलियुगके लिये अत्यन्त उत्तम मानी गयी है। जो कर्म ज्ञानसाध्य है, उसे अन्तर्वेदिकर्म कहते हैं। देवताकी स्थापना और पूजा बहिर्वेदि (पूर्त)-कर्म है। वह बहिर्वेदिकर्म दो प्रकारका है-कुआँ, पोखरा, तालाब आदि खुदवाना और ब्राहाणोंको संतुष्ट करना तथा गुरुजनोंकी सेवा।
निष्कामभावपूर्वक किये गये कर्म तथा व्यसनपूर्वक किया गया हरिस्मरणादि श्रेष्ठ कर्म अन्तर्वेदि-कोके अन्तर्गत आते हैं, इनके अतिरिक्त अन्य कर्म बहिर्वेदिकर्म कहलाते हैं। धर्मका कारण राजा होता है, इसलिये राजाको धर्मका पालन करना चाहिये और राजाका आश्रय लेकर प्रजाको भी बहिदि (पूर्त) काँका पालन करना चाहिये। यों तो बहिदि (पूर्त) कर्म सताली प्रकार के कहे गये हैं, फिर भी इन तीन प्रधान है-
देवताका स्थापन, प्रासाद और तडाग आदिका निर्माण। इसके अतिरिक्त गुरुजनोंकी पूजापूर्वक पितृपूजा, देवताओंका अधिवासन और उनकी प्रतिष्ठा, देवता-प्रतिमा-निर्माण तथा वृक्षारोपण आदि भी पूर्त-कर्म हैं।
देवताओं की प्रतिष्ठा उत्तम, मध्यम तथा कनिष्ठ- भेदसे तीन प्रकारको होती है। प्रतिष्ठामें पूजा, हवन तथा दान आदि ये तीन कर्म प्रधान हैं। तीन दिनों में सम्पन्न होनेवाले प्रतिष्ठा-विधानों में अट्ठाईस देवताओंकी पूजा तथा जापकरूपमें सोलह ब्राह्मण प्रखकर प्रतिष्ठा करानी चाहिये। प्रतिष्ठाकी यह उत्तम विधि कही गयी है। ऐसा करनेसे अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है। मध्यम प्रतिष्ठा-विधिमें यजन करनेवाले चार विद्वान् ब्राह्मण तथा तेईस देवता होते हैं। इसमें नवग्रह, दिक्पाल, वरुण, पृथ्वी, शिव आदि देवताओंकी एक दिनमें ही पूजा सम्मत कर देवताको प्रतिमा की जाती है। जो मात्र गणपति, प्रह-दिव्याल-वरुण और शिवकी अर्चना कर प्रतिष्ठा-
विधान किया जाता है, वह कनिष्ठ विधि है। क्षुद्र देवताओंकी भी प्रतिमाएँ नाना प्रकारके वृक्षोंकी लकड़ियोंसे बनायी जाती हैं।
नवीन तालाब, बावली, कुण्ड और जल- पौंसरा आदिका निर्माण कर संस्कार-कार्यके लिये गणेशादि-देवपूजन तथा हवनादि कार्य करने चाहिये। तदनन्तर उनमें वापी, पुष्करिणी (नदी) आदिका पवित्र जल तथा गङ्गाजल डालना चाहिये।
एकसठ हाथका प्रासाद उत्तम तथा इससे आधे प्रमाणका मध्यम और इसके आधे प्रमाणसे निर्मित प्रासाद कनिष्ठ माना जाता है। ऐश्वर्यकी इच्छा करनेवालेको देवताओंकी प्रतिमाके मानसे प्रासादका निर्माण करना चाहिये। नूतन तडागका निर्माण करनेवाला अथवा जीर्ण तडागका नवीन रूपमें निर्माण करनेवाला व्यक्ति अपने सम्पूर्ण कुलका उद्धार कर स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। वापी, कूप, तालाब, बगीचा तथा जलके निर्गम-स्थानको जो व्यक्ति बार-बार स्वच्छ या संस्कृत करता है, वह मुक्तिरूप उत्तम फल प्राप्त करता है। जहाँ विमों एवं देवताओंका निवास हो, उनके मध्यवर्ती स्थानमें वापी, तालाब आदिका निर्माण मानवोंको करना चाहिये । नदीके तटपर और श्मशानके समीप उनका निर्माण न करे। जो मनुष्य वापी, मन्दिर आदिको प्रतिष्ठा नहीं करता, उसे अनिश्का भय होता है तथा वह पापका भागी भी होता है। अत: जनसंकुल गाँवोंके समीप बड़े तालाब, मन्दिर, कूप आदिका निर्माण कर उनकी प्रतिष्ठा शास्वविधिसे करनी चाहिये। उनके शास्त्रीय विधिसे प्रतिक्षित होनेपर उत्तम फल प्राप्त होते हैं । अतएव श्यलपूर्वक मनुष्य मायापालिमासे शुभ गहलो शक्ति के अनुसार का प्रतिष्ठा करे । भगवान् के कानिट सध्या पास गरियो बनानेवालाकि विम्युलोकको प्राप्त होता है और क्रमिका मुत्त्किको प्राप्त करता है। जो व्यक्ति गिरे हुए या गिर रहे अर्थात् जीर्ण मन्दिरका रक्षण करता है, वह समस्त पुण्योंका फल प्राप्त करता है। जो व्यक्ति विष्णु, शिव, सूर्य, ब्रह्मा, दुर्गा तथा लक्ष्मीनारायण आदिके मन्दिरोंका निर्माण कराता है, वह अपने कुलका उद्धार कर कोटि कल्पतक स्वर्गलोकमें निवास करता है। उसके बाद वहाँसे मृत्युलोकमें आकर राजा या पूज्यतम धनी होता है। जो भगवती त्रिपुरसुन्दरीके मन्दिरमें अनेक देवताओंकी स्थापना करता है, वह सम्पूर्ण विश्वमें स्मरणीय हो जाता है और स्वर्गलोकमें सदा पूजित होता है। जलकी महिमा अपरम्पार है। परोपकार या देव-कार्यमें एक दिन भी किया गया जलका उपयोग मातृकुल, पितृकुल, भार्याकुल तथा आचार्यकुलकी अनेक पीढ़ियोंको तार देता है। उसका स्वयंका भी उद्धार हो जाता है। अविमुक्त दशार्णव तीर्थ में देवार्चन करनेसे अपना उद्धार होता है तथा अपने पितृ-मातृ आदि कुलोंको भी वह तार देता है। जलके ऊपर तथा प्रासाद (देवालय) के ऊपर रहनेके लिये घर नहीं बनवाना चाहिये। प्रतिष्ठित अथवा अप्रतिष्ठित शिवलिङ्गको कभी उखाड़ना नहीं चाहिये। इसी प्रकार अन्य देव- प्रतिमाओं और पूजित देववृक्षोंको चालित नहीं करना चाहिये। उसे चालित करनेवाले व्यक्तिको रौरव नरककी प्राप्ति होती है, परंतु यदि नगर या ग्राम उजड़ गये हों, अपना स्थान किसी कारण छोड़ना पड़े या विप्लव मचा हो तो उसकी पुन प्रतिमा बिना विचारके करनी चाहिये। शुभ मुहर्त के अभाव देवमन्दिर तथा देववृक्ष आदि स्थापित नहीं करने चाहिये। बाद उन्हें हटानेपर ब्रह्महत्याका दोष लगता है। देवताओंके मन्दिरके सामने पुष्करिणी आदि बनाने चाहिये। पुष्करिणी बनानेवाला अनन्त फल प्राप्तकर ब्रह्मलोकसे पुनः नीचे नहीं आता।