विष्णुभगवान्ने ब्रह्माजीसे पूछा-अहान् ! संसारमें मनुष्य विष, रोग, ग्रह और अनेक प्रकारके उपद्रवोंसे पीड़ित रहते हैं, यह किन कर्मोंका फल है, कृपाकर आप कोई ऐसा उपाय बतायें, जिससे जीवोंको रोग आदिकी बाधा न हो।
ब्रह्माजीने कहा-जिन्होंने पूर्वजन्ममें व्रत-उपवास आदिके द्वारा भगवान् सूर्यको प्रसन्न नहीं किया, वे मनुष्य विष, ज्वर, ग्रह, रोग आदिके भागी होते हैं और जो सूर्यनारायणकी आराधना करते हैं, उन्हें आधि-व्याधियाँ नहीं सताती। पूर्वजन्ममें भगवान् सूर्यकी आराधनासे इस जन्ममें आरोग्य, परम बुद्धि और जो-जो भी मनमें इच्छा
करता है, नि:संदेह उसे प्राप्त कर लेता है। आधि- व्याधियोंसे पीड़ित नहीं होता है और न विष एवं दुष्ट ग्रहों के बन्धनमें ही फँसता है तथा कृत्या आदिका भी भय उसे नहीं रहता। सूर्यनारायणके भक्तके लिये दुष्ट भी अनुकूल हो जाते हैं और सब ग्रह सौम्य दृष्टि रखते हैं। जिसपर सूर्यदेव संतुष्ट हो जाते हैं, वह देवताओंका भी हो जाता है। परंतु भगवान् सूर्यका अनुग्रह उसी पुरुषपर होता है, जो सब जीवोंको अपने समान ही समझता है और भक्तिपूर्वक उनकी आराधना करता है। प्रजाओंके स्वामी भगवान् सूर्यके प्रस्त्र हो जानेपर मनुष्य पूर्णमनोरथ हो जाता है।
एवमाकृष्टचित्तानां विपयैः स्वादुतर्पणैः ।
नृणां न जायते बुद्धिः परमार्थविलोकिनी ॥
तथा च विषयासने करोत्यविरतं मनः ।
को हि भारो रवेर्नानि जिह्वायाः परिकीर्तने ॥
वर्तितैलेऽल्पमूल्ये च यद्वतिर्लभ्यते सुधा ।
अतो वै कतरो लाभ: कातश्चिन्ता भवेत् तदा ॥
(ब्राह्मपर्व ११९।१०-१३)
*व्रतोपवासैर्यैर्भानुर्नान्यजन्मनि तोपितः ।
ते नरा देवशार्दूल ग्रहरोगादिभागिनः॥
यैर्न तत्प्रवणं चित्तं सर्वदैव नरैः कृतम् ।
विषग्रहज्वराणां ते मनुष्याः कृष्ण भागिनः ॥
आरोग्यं परमां वृद्धि मनसा यद्यदिच्छति ।
तत्तदाप्रोत्यसंदिग्धं परत्रादित्यतोषणात्॥
नाधीन् प्राप्नोति न व्याधीन् न विषग्रहबन्धनम् ।
कृत्यास्पर्शभयं वापि तोषिते तिमिरापहे ॥
सर्वे दुष्टाः समास्तस्य सौम्यास्तस्य सदा ग्रहाः ।
देवानामपि पूज्योऽसौ तुष्टो यस्य दिवाकरः ॥
यः समः सर्वभूतेषु यथात्मनि तथा हिते ।
उपवासादिना येन तोप्यते तिमिरापहः ।।
तोषितेऽस्मिन् प्रजानाथे नराः पूर्णमनोरथाः ।
अरोगाः सुखिनो नित्यं बहुधर्मसुखान्विताः ।।
भगवान् विष्णुने पूछा-ब्रह्मन्! जिन्होंने पहले भगवान् सूर्यकी आराधना नहीं की और रोग- व्याधिसे दुःखी हो गये हैं, वे उन कष्ट एवं पापोंसे कैसे मुक्त हों, कृपाकर बतायें। हम भी भक्तिपूर्वक भगवान् सूर्यको आराधना करना चाहते हैं।
ब्रह्माजी बोले-भगवन्! यदि आप भगवान् सूर्यकी आराधना करना चाहते हैं तो आप पहले वैवस्वत (सूर्यभक्त) बनें, क्योंकि बिना विधिपूर्वक सौरी दीक्षाके उनकी उपासना पूरी नहीं हो सकती। जब मनुष्योंके पाप क्षीण होने लगते हैं तब भगवान् सूर्य और ब्राह्मणोंमें उनकी नैष्ठिकी श्रद्धा- भक्ति होती है। इस संसार-चक्रमें भ्रमण करते हुए प्राणियोंके लिये भगवान् सूर्यको प्रसन्न करना एकमात्र कल्याणका निष्कण्टक मार्ग है।
विष्णुभगवान्ने पूछा-ब्रह्मन्! वैवस्वतोंका क्या लक्षण है और उन्हें क्या करना चाहिये? यह आप बतायें।
ब्रह्माजी बोले-वैवस्वत वही है जो भगवान् सूर्यका परम भक्त हो तथा मन, वाणी एवं कर्मसे कभी जीवहिंसा न करे। ब्राह्मण, देवता और भोजकको नित्य प्रणाम करे, दूसरेके धनका हरण न करे, सभी देवताओं एवं संसारको भगवान् सूर्यका ही स्वरूप समझे और उनसे अपनेको अभिन्न समझे। देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी, पिपीलिका, वृक्ष, पाषाण, काम, भूमि, जल, आकाश तथा दिशा-सर्वत्र भगवान् सूर्यको व्याप्त समझे, साथ ही स्वयंको भी सूर्य से भिन्न न समझे। जो किसी
भी प्राणीमें दुष्ट भाव नहीं रखता, वही वैवस्वत सूर्योपासक है। जो पुरुष आसक्तिरहित होकर निष्कामभावसे भक्तिपूर्वक भगवान् सूर्यके निमित्त क्रियाएँ करता है, वह वैवस्वत कहलाता है। जिसका न तो कोई शत्रु हो और न कोई मित्र हो तथा न उसमें भेद-बुद्धि हो, सबको बराबर देखता हो, ऐसा पुरुष वैवस्वत कहलाता है। जिस उत्तम गतिको वैवस्वत पुरुष प्राप्त करता है, वह योगी और बड़े-बड़े तपस्वियोंके लिये भी दुर्लभ है। जो सभी प्रकारसे भगवान् सूर्यका दृढ़ भक्त है, वह धन्य है। भक्तिपूर्वक आराधना करनेसे ही सूर्यभगवान्का अनुग्रह प्राप्त होता है।
ब्रह्माजी पुनः बोले- मैं भी उनके दक्षिण किरणसे उत्पन्न हुआ हूँ और उन्हींके वाम किरणसे भगवान् शिव तथा वक्षःस्थलसे शङ्ख-चक्र-गदाधारी आप उत्पत्र हैं। उन्हींको इच्छासे आप सृष्टिका पालन तथा शङ्कर संहार करते हैं। इसी प्रकार रुद्र, इन्द्र, चन्द्र, वरुण, वायु, अग्नि आदि सब देवता सूर्यदेवसे ही प्रादुर्भूत हुए हैं और उनकी आज्ञाके अनुसार अपने-अपने कर्मों में प्रवृत्त हो रहे हैं। इसलिये भगवन् ! आप भी सूर्यभगवानको आराधना करें, इससे सभी मनोरथ पूर्ण होंगे।
पितामह ब्रह्माजी एवं विष्णुभगवान्के इस संवादको जो भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, वह मनोवाञ्छित फलोंको प्राप्त कर अन्तमें सुवर्णके विमानमें बैठकर सूर्यलोकको जाता है।(अध्याय १२०)
न तेषां शत्रवो नैव शरीराधभिचारकम् । ग्रहरोगादिकं चापि पापकार्युपजायते ।
जन्याहतानि देवस्य धनजातानि नरम् । शान्ति राकतापत्सु येन चेतापिपोचितः ॥
(ग्रामपर्ष ११०१४-१२)