भविष्य महा पुराण

आशादशमी-व्रत-कथा एवं व्रत-विधान

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-पार्थ! अब मैं आपसे आशादशमी-व्रत-कथा एवं उसके विधानका वर्णन कर रहा हूँ। प्राचीन कालमें निषध देशमें नल नामक एक राजा थे। उनके भाई पुष्करने द्यूतमें जब उन्हें पराजित कर दिया, तब नल अपनी भार्या दमयन्तीके साथ राज्यसे बाहर चले गये। वे प्रतिदिन एक वनसे दूसरे वनमें भ्रमण करते रहते थे, केवल जलमात्रसे अपना जीवन-निर्वाह करते थे और जनशून्य भयंकर वनोंमें घूमते रहते थे। एक बार राजाने वनमें स्वर्ण-सी कान्तिवाले कुछ पक्षियोंको देखा। उन्हें पकड़नेकी इच्छासे राजाने उनके ऊपर वस्त्र फैलाया, परंतु वे सभी उस वस्वको लेकर आकाशमें उड़ गये। इससे राजा बड़े दुःखी हो गये। वे दमयन्तीको गाढ़ निद्रामें देखकर उसे उसी स्थितिमें छोड़कर चले गये।

दमयन्तीने निद्रासे उठकर देखा तो नलको न पाकर वह उस घोर वनमें हाहाकार करते हुए रोने लगी। महान् दुःख और शोकसे संतप्त होकर वह नलके दर्शनोंकी इच्छासे इधर-उधर भटकने लगी। इसी प्रकार कई दिन बीत गये और भटकते हुए वह चेदिदेशमें पहुँची। वहाँ वह उन्मत्त सी रहने लगी। छोटे छोटे शिशु उसे कौतुकवश घेरे रहते थे। किसी दिन मनुष्योंसे घिरी हुई उसे चेदिदेशके राजाको माताने देखा। उस समय दमयन्ती चन्द्रमाको रेखाके सम्मान भूमिपर पड़ी हुई थी। उसका मुखमण्डल प्रकाशित था। राजमाता ने उसे अपने भवनों बुलाकर पूछा-'वरानने ! तुम कौन हो?' इसपर दमयन्तीने लज्जित होते हुए कहा-'मैं सैरन्ध्री हूँ। मैं न किसीके चरण धोती हूँ और न किसीका उच्छिष्ट भक्षण करती हूँ। यहाँ रहते हुए कोई मुझे प्राप्त करेगा तो वह आपके द्वारा दण्डनीय होगा। देवि! इस प्रतिज्ञाके साथ मैं यहाँ रह सकती हूँ।' राजमाताने कहा- 'ठीक है ऐसा ही होगा।' तब दमयन्तीने वहाँ रहना स्वीकार किया और इसी प्रकार कुछ समय व्यतीत हुआ और फिर एक ब्राह्मण दमयन्तीको उसके माता-पिताके घर ले आया । पर माता-पिता तथा भाइयोंका स्नेह पाने पर भी पतिके बिना वह अत्यन्त दुःखी रहती थी।

एक बार दमयन्तीने एक श्रेष्ठ ब्राह्मणको बुलाकर उससे पूछा-'हे ब्राह्मणदेवता! आप कोई ऐसा दान एवं व्रत बतलायें, जिससे मेरे पति मुझे प्राप्त हो जायें।' इसपर उस बुद्धिमान् ब्राह्मणने कहा- 'भद्रे ! तुम मनोवाञ्छित्त सिद्धि प्रदान करनेवाले आशादशमी-व्रतको करो।' तब दमयन्तीने पुराणवेत्ता उस दमन नामक पुरोहित ब्राह्मणके द्वारा ऐसा कहे जानेपर आशादशमी व्रतका अनुष्ठान किया। उस व्रतके प्रभावसे दमयन्तीने अपने पतिको पुन: प्राप्त किया।

युधिष्ठिरने पूछा-हे गोविन्द ! यह आशादशमी- व्रत किस प्रकार और कैसे किया जाता है, सर्वज्ञ है, आप इसे बतलायें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-हे राजन् ! इस व्रतके प्रभावसे राजपुत्र अपना राज्य, कृषक खेती, वणिक व्यापारमें लाभ, पुत्रार्थी पुत्र तथा मानव धर्म, अर्थ एवं कामकी सिद्धि प्राप्त करते हैं। कन्या श्रेष्ठ वर प्राप्त करती है, ब्राह्मण निर्विघ्न यज्ञ सम्पन्न कर लेता है, रोगी रोगसे मुक्त हो जाता है और पतिके चिर-प्रवास हो जानेपर, स्त्री ठसे शीघ्र ही प्राप्त कर लेती है। शिशुके दन्तजनित पीड़ामें भी इस व्रतसे पीड़ा दूर हो जाती है और कष्ट नहीं होता। इसी प्रकार अन्य कार्योंकी सिद्धिके लिये इस आशादशमी-व्रतको करना चाहिये। जब भी जिस किसीको कोई कष्ट पड़े, उसकी निवृत्तिके लिये इस व्रतको करना चाहिये।

यह आशादशमी-व्रत किसी भी मासके शुक्ल पक्षकी दशमीको किया जाता है। इस दिन प्रात:काल स्नान करके देवताओंकी पूजा कर रात्रि में पुष्प, अलक्त तथा चन्दन आदिसे दस आशादेवियोंकी पूजा करनी चाहिये। घरके आँगनमें जौसे अथवा पिष्टातकसे पूर्वादि दसों दिशाओंके अधिपतियों को प्रतिमाओंको उनके वाहच तथा अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित कर उन्हें ही ऐन्द्री आदि दिशा देवियोंके रूपमें मानकर पूजन करना चाहिये। सबको घृतपूर्ण नैवेद्य, पृथक् पृथक् दीपक तथा ऋतुफल आदि समर्पित करना चाहिये। इसके अनन्तर अपने कार्यकी सिद्धिके लिये इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये-

आशाशाशाः सदा सन्तु सिद्धयन्तां मे मनोरधाः ।

भवतीनां प्रसादेन सदा कल्याणमस्त्विति ।।

(उत्तरपर्च ६४।२५)

'हे आशादेवियो। मेरी आशाएँ सदा सफल हों, मेरे मनोरथ पूर्ण हों, आपलोगोंके अनुग्रहसे मेरा सदा कल्याण हो।'

इस प्रकार विधिवत् पूजा कर ब्राह्मणको दक्षिणा प्रदानकर प्रसाद ग्रहण करना चाहिये। इसी क्रमसे प्रत्येक मासमें इस व्रतको करना चाहिये। जबतक अपना मनोरथ पूर्ण न हो जाय, तबतक इस वतको करना चाहिये। अनन्तर उद्यापन करना चाहिये। उद्यापनमें आशादेवियोंकी सोने, चाँदी अथवा पिष्टातकसे प्रतिमा बनाकर घरके आँगनमें उनकी पूजा करके ऐन्द्री, आग्नेयी, याम्या, नैर्ऋति, वारुणि, वायव्या, सौम्या, ऐशानी, अधः तथा ब्राह्मी-इन दस आशादेवियों ( दिशा-देवियों)- से अभीष्ट कामनाओंकी सिद्धिके लिये प्रार्थना करनी चाहिये, साथ ही नक्षत्रों, ग्रहों, ताराग्नहों, नक्षत्र-मातृकाओं, भूत प्रेत-विनायकोंसे भी अभीष्ट सिद्धिके लिये प्रार्थना करनी चाहिये। पुष्प, फल, धूप, गन्ध, बस्त्र आदिसे उनकी पूजा करनी चाहिये। सुहागिनौ स्त्रियोंको नृत्य-गीत आदिके द्वारा रात्रि-जागरण करना चाहिये। प्रात:काल विद्वान् ब्राह्मणको सब कुछ पूजित पदार्थ निवेदित कर देना चाहिये और उन्हें प्रणाम कर क्षमा याचना करनी चाहिये। अनन्तर बन्धु-बान्धवों एवं मित्रोंके साथ प्रसन्न-मनसे भोजन करना चाहिये। हे पार्थ ! जो इस आशादशमी-व्रतको श्रद्धापूर्वक करता है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। यह व्रत स्त्रियोंके लिये विशेष श्रेयस्कर है। (अध्याय ६४)