महाराज युधिष्ठिरने कहा- भगवन्! आपने शुक्ल पक्षके अनेक तृतीया-व्रतोंको बतलाया। अब आप आनन्तर्य-व्रतका स्वरूप बतलायें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज ! ब्रह्मा, विष्णु और महेशने देवताओंको बतलाया है कि यह आनन्तर्य-व्रत अत्यन्त गुह्य है, फिर भी मैं आपसे इस व्रतका वर्णन करता हूँ। इस व्रतका आरम्भ मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षको तृतीयासे करना चाहिये। द्वितीयाके दिन रातमें व्रतकर तृतीयाको उपवास करे। गन्ध, पुष्प आदिसे उमादेवीका पूजन कर शर्करा और पूरीका नैवेद्य समर्पित करे। स्वयं दहीका प्राशन कर रात्रिमें शयन करे। प्रातःकाल उठकर भक्तिपूर्वक ब्राह्मण-दम्पतिको भोजन कराये। इस विधिसे जो स्त्री व्रत करती है, वह सम्पूर्ण अश्वमेध यज्ञके फलको पास करती है।
मार्गशीर्ष मासके कृष्ण पक्षको तृतीयाको भरावलो कात्यायनी के पूजनमें नारिकेल समर्पित कर दुग्धका प्राशन करे। काम-क्रोधका त्याग कर रात्रिमें शयन करे एवं प्रात: उठकर ब्राह्मण-दम्पतिका पूजन करे। ऐसा करनेसे अनेक यज्ञोंका फल प्राप्त होता है।
पौष मासके शुक्ल पक्षको तृतीयाको उपवासकर गौरीका पूजन करे, लडका नैवेद्य निवेदित करे और घृतका प्राशन कर शयन करे। प्रात: उठकर सपत्नीक ब्राह्मणका पूजन करे। इससे महान् यज्ञका फल मिलता है। इसी प्रकार पौषकी कृष्ण-तृतीयाको भगवत्ती पार्वतीको पूजा करे और नैवेद्य अर्पण करे, रातमें पूरी और गोमयका प्राशन करना चाहिये। प्रात:काल ब्राह्मण-दम्पतिका पूजन करे। इससे अभमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है।
माघ मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको भगवती पार्वतीका ‘सुरनायिका' नामसे पूजन कर खाँड़ और बिल्वका नैवेद्य समर्पित करे। कुशोदकका प्राशन कर जितेन्द्रिय रहे, भूमिपर शयन करे। प्रातः ब्राह्मण-दम्पतिको भोजन कराये। इससे सुवर्णदानका फल मिलता है। इसी प्रकार माघ कृष्ण तृतीयाको पवित्र होकर 'आर्या' नामसे पार्वतीका पूजन कर भक्ष्य पदार्थोंका नैवेद्य समर्पित कर मधुका प्राशन करे। देवीके आगे शयन करे, दूसरे दिन भक्तिपूर्वक ब्राह्मण-दम्पतिका पूजन करे। इससे वाजपेय-यज्ञका फल मिलता है।
फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको पवित्र होकर उपवास करे और देवी पार्वतीका 'भद्रा' नामसे पूजन कर कासारका नैवेद्य निवेदित करे। शर्कराका प्राशन कर रात्रिमें शयन करे। प्रात:काल सपत्नीक ब्राह्मणको भोजन कराये। इससे सौत्रामणि- यागका फल प्राप्त होता है। इसी प्रकार कृष्ण पक्षकी तृतीयामें 'विशालाक्षी' नामसे भगवती पार्वतीका पूजन कर पूरीका भोग लगाये। जल तथा चावल निवेदित कर भूमिघर शयन करे। प्रात:काल सपत्नीक ब्राह्मणको भोजन कराये। इससे अग्निष्टोम यज्ञका फल प्राप्त होता है।
चैत्र मासके शुक्ल पक्षको तृतीयाको जितेन्द्रिय और पवित्र होकर भगवती पार्वतीका 'श्री' नामसे पूजन करे। वटक (दहीबड़ा)-का नैवेद्य निवेदित करे, बिल्वपत्रका प्राशन करे एवं देवीका ध्यान करता हुआ विश्राम करे। प्रात:काल भक्तिपूर्वक ब्राह्मण-दम्पतिकी पूजा करे, इससे राजसूय यज्ञका फल प्राप्त होता है। इसी प्रकार कृष्ण-तृतीयाको देवीकी 'काली' नामसे पूजा करे। अपूपका नैवेद्य निवेदित करे, पीठीका प्राशन करे और रात्रिमें विश्राम करे। प्रात:काल सपत्नीक ब्राह्मणको भोजन कराये। इससे अतिरात्र-यज्ञका फल प्राप्त होता है। वैशाख मासके शुक्ल पक्षको तृतीयाको जितेन्द्रिय होकर उपवास करे। भगवती पार्वतीको 'चण्डिका नामरो पूजा कर मधुक निवेदित करे। श्रोखण्ड चन्दनसे लिप कर देवीके सम्मुख विश्राम करे प्रातः काल सपत्नीक ब्राह्मणको पूजा करे। इससे चान्द्रायणव्रतका फल मिलता है। ऐसे ही कृष्ण पक्षको तृतीयाको विमत्सर होकर उपवास करे। देवीकी कालरात्रि' नामसे गन्ध, पुष्प, धूप, दीप आदिसे पूजा करे। घी तथा जौके आटेसे बना नैवेद्य निवेदित करे। तिलका प्राशन कर रात्रिमें शयन करे। प्रात:काल सपत्नीक ब्राह्मणको भोजन कराये। इससे अतिकृच्छ्वतका फल प्राप्त होता है।
ज्येष्ठ मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको उपवासकर पार्वतीको पूजा 'शुभा' नामसे करे तथा आम्र- फलका नैवेद्य निवेदित करे एवं आँवलेका प्राशन कर गौरीका ध्यान करते हुए सुखपूर्वक सोये। प्रात:काल सपत्नीक ब्राह्मणको भोजन कराये। इससे तीर्थयात्राका फल प्राप्त होता है। इसी प्रकार ज्येष्ठ कृष्ण तृतीयाको सुवासिनी स्त्री उपवास करे। 'स्कन्दमाता' की पूजा कर भोग लगाये। पशगव्यका प्राशन कर देवीके सामने शयन करे। प्रात:काल ब्राह्मण-दम्पतिकी पूजा करे। इससे कन्यादानका फल प्राप्त होता है।
आषाढ़ मासके शुक्ल पक्षको तृतीयाको सतीका पूजन कर दहीका नैवेद्य समर्पित करे। गोशृङ्ग- जलका प्राशन कर शयन करे। प्रातः ब्राह्मण-दम्पतिका पूजन करे, इससे कन्यादानका फल प्राप्त होता है । पुनः आषाढ़ मासके कृष्ण पक्षकी तृतीयामें कृष्याण्डीका पूजन कर गुड़ और घृतके साथ सत्तूका नैवेद्य अर्पित करे। कुशोदकका प्राशन कर शयन करे। प्रातःकाल ब्राह्मण-दम्पतिकी पूजा करे। इससे गोसहस्र-दानका फल प्राप्त होता है।
श्रावण मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको उपवासकर चन्द्रघण्टाका पूजन करे। कुल्माष (कुलथी)-को नैवेद्यरूपमें समर्पित कर पुष्पोदकका प्राशन कर शयन करे, प्रातःकाल ब्राह्मण-दम्पतिका पूजन करे। ऐसा करनेसे अभयदानका फल प्राप्त होता है। इसी प्रकार श्रावणकी कृष्ण-तृतीयाको 'रुद्राणी' नामसे पार्वतीका पूजन कर सिद्ध पिण्ड आदि नैवेधके रूपमें समर्पित करे। तिलकुटका प्राशन करे। प्रातः सपत्नीक ब्राह्मणका पूजन करे, इससे इष्टापूर्त-यज्ञका फल प्राप्त होता है।
भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयामें हिमाद्रिजा' नामसे पार्वतीका पूजन कर गोधूमका नैवेद्य समर्पित करे । श्वेत चन्दन तथा गन्धोदकका प्राशन कर शयन करे। प्रातः सपत्नीक ब्राह्मणका पूजन करे, इससे सैकड़ों उद्यान लगानेका फल प्राप्त होता है । भाद्रपद कृष्ण-तृतीयाको दुर्गाकी पूजा करे। गुड़युक्त पिष्ट और फलका नैवेद्य समर्पित करे, गोमूत्रका प्राशन कर शयन करे। प्रातः सपत्नीक ब्राह्मणकी पूजा करे। इससे सदावर्तका फल प्राप्त होता है।
आश्विनमें उपवासकर 'नारायणी' नामसे पार्वतीका पूजनकर पलानका नैवेद्य समर्पित करे। रक्त चन्दनका प्राशन कर रात्रिमें शयन करे। प्रात: ब्राह्मण-दम्पतिका पूजन करे। इससे अग्निहोत्र यज्ञका फल प्राप्त होता है। आश्विन कृष्ण-तृतीयाको 'स्वस्ति' नागसे पार्वतीकी पूजा करे। गुड़के साथ शाल्योदन समर्पित करे। कुसुम्भकै बीजोंका प्राशन कर रात्रि में विश्राम करे। प्रात:काल सपत्नीक ब्राह्मणको भोजन कराये। इससे गवाहिक (अन्न, घास आदिसे दिनभर गो-सेवा करने)- -का फल प्राप्त होता है।
कार्तिक मासके शुक्ल पक्षको तृतीयाको 'स्वाहा' नामसे पार्वतीका पूजन कर घृत, खाँड़ और खोरका नैवेद्य समर्पित करे। कुंकुम, केसरका प्राशन कर शयन करे और प्रात: ब्राहाण-दम्पतिकी पूजा करे। इससे एकभुक्त व्रतका फल प्राप्त होता है कार्तिककी कृष्ण तृतीयाको 'स्वधा' नामसे पार्बतीका पूजन कर मूंगकी खिचड़ीका नैवेद्य सार्पित करे और घीका प्राशन कर रातो शयन करे। प्रात: सपत्रीक ब्राहाणका पूजन करे। इससे नकव्रतका फल प्राप्त होता है। इस प्रकार वर्षभर प्रत्येक मास एवं पक्षकी तृतीयाको व्रतादि करनेसे व्रती सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त और पवित्र हो जाता है। व्रत पूर्ण कर उद्यापन इस प्रकार करना चाहिये-
मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको उपवास कर शास्त्र-रीतिसे एक मण्डप बनाकर सुवर्णकी शिव-पार्वतीकी प्रतिमा बनवाये। उन प्रतिमाओंके नेत्रोंमें मोती और नीलम लगाये। ओष्ठोंमें मूंगा और कानोंमें रत्नकुण्डल पहनाये। भगवान् शंकरको यज्ञोपवीत और पार्वतीजीको हारसे अलंकृत कर क्रमशः श्वेत और रक्त वस्त्र पहनाये। चतु:सम (एक गन्ध-द्रव्य जो कस्तूरी, चन्दन, कुंकुम और कपूरके समान-भागके योगसे बनता है)-से सुशोभित करे। तदनन्तर गन्ध, पुष्प, धूप आदि उपचारोंसे मण्डलमें पूजनकर अगरुका हवन करे। इसमें अपराजिता भगवतीकी अर्चना करे। मृत्तिकाका प्राशन कर रातमें जागरण करे । गीत, नृत्य आदि उत्सव करे। सूर्योदयपर्यन्त जप करे। प्रातः उत्तम मण्डल बनाकर मण्डलमें शय्यापर शिव-पार्वतीकी प्रतिमा स्थापित करे। वितान, ध्वज, माला, किंकिणी, दर्पण आदिसे मण्डपको सुशोभित करे, अनन्तर शिव-पार्वतीकी पूजा करे। सपत्नीक ब्राह्मणको भोजनादिसे संतुष्ट करे। पान निवेदित कर प्रार्थना करे कि 'हे भगवान् शिव-पार्वती! आप दोनों मुझपर प्रसन्न होवें। इसके बाद उच्छिष्ट स्थानको पवित्र कर ले। तत्पश्चात् सुवर्णसे मण्डित सींग तथा चाँदीसे मण्डित खुरवाली, कांस्य दोहनपात्रसे युक्त, लाल वस्त्रसे आच्छादित, घण्टा आदि आभरणोंसे युक्त पयस्विनी लाल रंगकी गौकी प्रदक्षिणा कर दक्षिणाके साथ जूता, खड़ाऊँ, छाता एवं अनेक प्रकारके भक्ष्य पदार्थ गुरुको समर्पित करे। पुनः शिव-पार्वतीको प्रणाम कर गुरुके चरणोंमें भी प्रणाम कर क्षमा माँगे। इस प्रकार इस आनन्तर्य- व्रतकी समाप्ति करे। जो स्त्री या पुरुष इस व्रतको करता है, वह दिव्य विमानमें बैठकर गन्धर्वलोक, यक्षलोक, देवलोक तथा विष्णुलोकमें जाता है। वहाँ बहुत समयतक उत्तम भोगोंको भोगकर शिवलोकको प्राप्त करता है और फिर भूमिपर जन्म लेकर प्रतापी चक्रवर्ती राजा होता है। व्रत करनेवाली उसकी स्त्री उसकी पटरानी होती है। जिस प्रकार शिवजीके साथ पार्वती, इन्द्रके साथ शची, वसिष्ठके साथ अरुन्धती, विष्णुके साथ लक्ष्मी, ब्रह्माके साथ सावित्री सदा विराजमान रहती हैं, उसी प्रकार वह नारी भी जन्म-जन्ममें अपने पतिके साथ सुख भोगती है। इस व्रतको करनेवाली नारी पतिसे वियुक्त नहीं होती तथा पुत्र, पौत्र आदि सभी वस्तुओंको प्राप्त करती है। (अध्याय २९)