भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-राजन्! एक बार। त्रेतायुगमें अनावृष्टिके कारण भयंकर दुर्भिक्ष पड़. गया। उस घोर अकालमें कौशिकमुनि अपनी स्त्री तथा पुत्रोंके साथ अपना निवास स्थान छोड़कर दूसरे प्रदेशमें निवास करने निकल पड़े। कुटुम्बका भरण-पोषण दूभर हो जानेके कारण बड़े कष्टसे . उन्होंने अपने एक बालकको मार्गमें ही छोड़ दे दिया। वह बालक अकेला भूख-प्याससे तड़पता हुआ रोने लगा। उसे अकस्मात् एक पीपलका वृक्ष दिखायी पड़ा। उसके समीप ही एक बावड़ी भी थी। बालकने पीपलके फलोंको खाकर ठंडा जल पी लिया और अपनेको स्वस्थ पाकर वह वहीं कठिन तपस्या करने लगा तथा नित्यप्रति पीपलके फलोंको खाकर समय व्यतीत करने लगा अचानक वहाँ एक दिन देवर्षि नारद पधारे, उन्हें देखकर बालकने प्रणाम किया और आदरपूर्वक बैठाया। दयालु नारदजी उसको अवस्था, विनय और नमताको देखकर बहुत ही प्रसन्न हुए और उन्होंने बालकका गौशीबन्धन आदि सब संस्कार कर पद क्रम-रहस्यसहित वेदका अध्ययन कराया तथा साथ ही द्वादशाक्षर वैष्णवमन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) का उपदेश दिया।
अब वह प्रतिदिन विष्णुभगवान्का ध्यान और मन्त्रका जप करने लगा। नारदजी भी वहीं रहे। थोड़े समयमें ही बालकके तपसे संतुष्ट होकर भगवान् विष्णु गरुडपर सवार हो वहाँ पहुँचे। देवर्षि नारदके वचनसे बालकने उन्हें पहचान लिया, तब उसने भगवान्में दृढ़ भक्तिकी मांग की। भगवान्ने प्रसत्र होकर ज्ञान और योगका उपदेश प्रदान किया और अपने में भक्तिका आशीर्वाद देकर वे अन्तर्धान हो गये। भगवान्के उपदेशसे वह बालक महाज्ञानी महर्षि हो गया।
एक दिन बालकने नारदजीसे पूछा-'महाराज! यह किस कर्मका फल है जो मुझे इतना कष्ट उठाना पड़ा। इतनी छोटी अवस्थामें भी मैं क्यों ग्रहाद्वारा पीड़ित हो रहा हूँ। मेरे माता-पिताका कुछ भी पता नहीं, वे कहाँ हैं। फिर भी मैं अत्यन्त कष्टसे जी रहा हूँ। द्विजोत्तम । सौभाग्यवश आपने दया करके मेरा संस्कार किया और मुझे ब्राहाणात प्रदान किया। नारदजी यह वचन सुनकर बोले
बालक !शनैश्चरग्रहने तुम्हें बहुत पीड़ा पहुँचायी और आज यह सम्पूर्ण देश उसके मन्दगतिसे चलनेके कारण उत्पीड़ित है। देखो, वह अभिमानी शनैश्चर-ग्रह आकाशमें प्रज्वलित दिखायी पड़ रहा है।'
यह सुनकर बालक क्रोधसे अग्रिके समान उद्दीप्त हो उठा। उसने उग्र दृष्टि से देखकर शनैश्चरको आकाशसे भूमिपर गिरा दिया। शनैश्चर एक पर्वतपर गिरे और उनका पैर टूट गया, जिससे वे पंगु हो गये। देवर्षि नारद भूमिपर गिरे हुए शनैश्चरको देखकर अत्यन्त प्रसन्नतासे नाच उठे। उन्होंने सभी देवताओंको बुलाया । ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, अग्नि आदि देवता वहाँ आये और नारदजीने शनैश्चरकी दुर्गति सबको दिखायी।
ब्रह्माजीने बालकसे कहा-महाभाग! तुमने पीपलके फल भक्षण कर कठिन तप किया है। अतः नारदजीने तुम्हारा पिप्पलाद नाम उचित ही रखा है। तुम आजसे इसी नामसे संसारमें विख्यात होओगे। जो कोई भी शनिवारको तुम्हारा भक्तिभावसे पूजन करेंगे अथवा 'पिप्पलाद' इस नामका स्मरण करेंगे, उन्हें सात जन्मतक शनिकी पीड़ा नहीं सहन करनी पड़ेगी और वे पुत्र-पौत्रसे युक्त होंगे। अब तुम शनैश्चरको पूर्ववत् आकाशमें स्थापित कर दो, क्योंकि इनका वस्तुत: कोई अपराध नहीं है। ग्रहोंको पीड़ासे छुटकारा पानेके लिये नैवेद्य निवेदन, हवन, नमस्कार आदि करना चाहिये। ग्रहोंका अनादर नहीं करना चाहिये। पूजित होनेपर ये शान्ति प्रदान करते हैं। शनिको ग्रहजन्य पीड़ाकी निवृत्तिके लिये शनिवारको स्वयं तैलाभ्यङ्ग करके ब्राह्मणों को भी अभ्यङ्गके लिये तैल देना चाहिये। शनिकी लौह- प्रतिमा बनाकर तैलयुक्त लौह-पात्रमें रखकर एक वर्षतक प्रति शनिवारको पूजन करनेके बाद कृष्ण पुष्प, दो कृष्ण वस्त्र, कसार, तिल, भात आदिसे उनका पूजन कर 'काली गाय, काला कम्बल, तिलका तेल और दक्षिणासहित सब पदार्थ ब्राहाणको प्रदान करना चाहिये। पूजन आदिमें शनिके इस मन्त्रका प्रयोग करना चाहिये-
शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं योरभि स्रवन्तु नः॥
(यजु० ३६॥ १२)
राज्य नाए हुए राजा नलको शनिदेवने स्वप्रमें अपने एक प्रार्थना-मन्त्रका उपदेश दिया था। उसी नाम स्तुतिसे उन्हें पुनः राज्य उपलब्ध हुआ था। उस स्तुतिरो शनिको प्रार्थना करनी चाहिये। सर्वकामप्रद वह स्तुति इस प्रकार है-
कोई नीलाचनप्रख्यं नीलवर्णसमस्रजम् ।
छायामार्तण्डसम्भूतं नमस्यामि शनैश्चरम्।
नमोऽर्कपुत्राय शनैश्चराय
नीहारवर्णाजनमेचकाय श्रुत्वा रहस्यं भवकामदश
फलप्रदो मे भव सूर्यपुत्र ॥
नमोऽस्तु प्रेतराजाय कृष्णदेहाय वै नमः।
शनैश्चराय क्रूराय शुद्धबुद्धिप्रदायिने॥
१-यहां यह कथा बडो सुन्दर है। इसके पढ़नेसे शनिप्रहको पोड़ा भी शान्त हो जाती है। ये महर्षि अधर्वण पप्पलादसंहिताके दृष्टा है। इनकी कथा प्राय: अनेक व्रत-माहात्म्य एवं स्कन्द आदि पुराणों में मिलती है। पर अन्ना यह है कि अन्यत्र सर्वत्र इन्हें दधीचि ऋषिका पुत्र बताया गया है। माताके नाम में भी थोड़ा अन्तर है, कहीं प्रातिचेयीका और कहाँ सुबर्चाका नाम मिलता है, जो पति के साथ सती हो गयी थी। तब ये पीपसके द्वारा पालित हुए। सभी कथा वही पुण्यप्रद एवं शनि-पीडाको शान्त करनेवाली हैं। अन्तर कल्पभेदका है, अतः संदेह नहीं करना चाहिये।
२-चरन्वृक्षं शनैरेष शुभाशुभफलप्रदः ।
हतसाध्या ग्रहाते न भवन्ति कदाचन।
बलिहोमनमस्कारैः शान्ति यच्छन्ति पूजिताः ।
अतोऽयमस्व दिवसे नानमध्यपूर्वकम् ॥
(उत्तरपर्व ११४ । २९-३०)
इसी भावके श्लोक बाजवल्क्य आदि स्मृतियों में भी आये हैं।
य एभिर्नामभिः स्तौति तस्य तुष्टो भवाम्यहम्।
मदीयं तु भयं तस्य स्वप्रेऽपि न भविष्यति।
(उत्तरपर्व ११४ । ३९-४२)
जो भी व्यक्ति प्रत्येक शनिवारको एक वर्षतक इस व्रतको करता है और इस विधिसे उद्यापन करता है, उसे कभी शनिकी पीड़ा नहीं भोगनी पड़ती। यह कहकर ब्रह्माजी सभी देवताओंके साथ अपने परमधामको चले गये और पिप्पलादमुनिने भी ब्रह्माजीके आज्ञानुसार शनैश्चरको उनके स्थानपर प्रतिष्ठित कर दिया। महामुनि पिप्पलादने शनिग्रहकी इस प्रकार प्रार्थना की-
कोणस्थः पिङ्गलो बभुः कृष्णो रौद्रोऽन्तको यमः।
सौरिः शनैश्चरो मन्दः प्रीयतां मे ग्रहोत्तमः॥
(उत्तरपर्य ११४ । ४७)
जो व्यक्ति शनैश्चरोपाख्यानको भक्तिपूर्वक सुनता है तथा शनिकी लौह-प्रतिमा बनाकर तेलसे भरे हुए लौह-कलशमें रखकर ब्राह्मणको दक्षिणासहित दान देता है, उसको कभी भी शनिकी पीड़ा नहीं होती। (अध्याय ११४)