ब्रह्माजी बोले-हे वीर ! मार्गशीर्ष मासमें शुक्ल। पक्षकी जो सप्तमी होती है, वह नन्दा कहलाती है। वह सभीको आनन्दित करनेवाली तथा कल्याणकारिणी है। इस व्रतमें पञ्चमी तिथिको एकभुक्त और षष्ठी तिथिमें नक्तव्रत कर मनीषीलोग सप्तमी तिथिको उपवास बतलाते हैं। इस व्रतमें विद्वानोंने तीन पारणाओंके करनेका उपदेश किया है। इसके पूजनमें मालतीके पुष्प, सुगन्ध, चन्दन, कपूर और अगरुसे मिश्रित धूपका प्रयोग करना चाहिये । खाँड़के सहित दही-भातका नैवेद्य भगवान् भास्करको प्रिय है। उसी खाँडमिश्रित दही-भातका भोजन ब्राह्मणोंको करवाना चाहिये। तत्पश्चात् स्वयं भी उसी भोजनको करना चाहिये । भगवान् भास्करको धूप देनेके लिये
प्रथम पारणामें विधि इस प्रकार है-पलाशके पुष्प, पक्षक धूप अथवा यथासामर्थ्य जो भी धूप हो सके, उसी धूपसे पूजा करनी चाहिये।
द्वितीय पारणामें प्रबोधर धूप, शर्कराखण्डसे मिश्रित पुएका नैवेद्य सूर्यनारायणको अर्पित करनेका विधान है। खाँडमिश्रित भोजनसे ब्राह्मणोंको भोजन भी कराना चाहिये। निम्ब-पत्रका प्राशन करनेके पश्चात् स्वयं भी मौन होकर भोजन करना चाहिये।
तृतीय पारणामें भगवान् भास्करको प्रसन्न करनेके लिये नील या श्वेत कमल और गुग्गुलके धूप तथा पायसका नैवेद्य अर्पित करना चाहिये। प्राशनमें तथा विलेपनमें भी चन्दनके उपयोगकी विधि कही गयी है।
१-कर्पूरं चन्दनं कुष्ठमगर: सिहक तथा॥
सप्रन्थि वृषणं भीम कुंकुम गृजनं तथा।
हरीतको तथा भीम एप पक्षक उज्यते ॥
(ब्राह्मपर्व १००।६-७).
कपूर, चन्दन, कुष्ठ (कुटकी), अगरु, सिंहक, ग्रन्थिपर्णी, कस्तूरी, कुंकुम, गृजन तथा हरीतकीके मेलसे पक्षक धूप बनता है।
२-कृष्णागरुः सितं कं चालक पर्ण तथा॥
चन्दनं तगरी मुस्ता प्रबोधशर्करान्चिता।
(बाह्यपर्व १००।८-९)
कृष्णागरू, श्वेत कमल, सुगन्धबाला, कस्तूरी, चन्दन, तगरु, नागरमोथा और शर्करा मिलाकर प्रबोध धूप बनता है।
मनुष्योंको सदा पवित्र करनेवाले भगवान् सूर्यनारायणके नार्मोंको भी सुनें-विष्णु, भग तथा धाता-ये उनके नाम हैं। प्रत्येक पारणामें क्रमश: 'विष्णुः प्रीयताम्' इत्यादि उच्चारण करना चाहिये। इस विधिसे जो मनुष्य दत्तचित्त होकर भगवान् भास्करकी पूजा करता है, वह इस लोकमें अपनी कामनाओंको पूर्ण करके अनन्तकालतक आनन्दित रहता है। तत्पश्चात् सूर्यलोकमें जाकर वह वहाँ भी आनन्दको प्राप्त करता है।
ब्रह्माजी बोले-शुक्ल पक्षमें सप्तमी तिथिको जब हस्त नक्षत्र हो तो वह भद्रा-सप्तमी कही जाती है। उस दिन भगवान् सूर्यदेवको पहले घीसे, अनन्तर दूधसे तत्पश्चात् इक्षुरससे सान कराकर चन्दनका लेप करना चाहिये । तत्पश्चात् उन्हें गुग्गुलका धूप दिखाये। चतुर्थी तिथिको एकभुक्त तथा पञ्चमी तिथिको नक्तव्रत करनेका विधान है। षष्ठी तिथिको अयाचित रहकर सप्तमी तिथिको उपवास रखना श्रेष्ठ कहा गया है। सप्तमी-व्रतका पालन करनेवाले मनुष्यको चाहिये कि वह उस व्रतके दिन पाखण्डी, सत्कर्मों से दूर करनेवाले, विडाल-वृत्तिका आचरण करनेवाले मनुष्योंसे दूर रहे। बुद्धिमान् व्यक्ति सप्तमी-व्रतका पालन करते हुए दिनमें शयन न करे। इस विधिसे जो मनुष्य भद्रा-सप्तमीका व्रत करता है, उसे ऋभु नामक देवता सदा समस्त कल्याणकी वस्तुएँ प्रदान करते हैं। जो मनुष्य इस तिथिको शालिचूर्णसे भद्र (वृषभ) बनाकर सूर्यदेवको समर्पित करता है, उसको भद्र पुत्र प्राप्त होता है और वह जीवनपर्यन्त आनन्दित रहता है।
जो मनुष्य भक्तिपूर्वक ससमी-कल्पको प्रारम्भसे सुनता है, वह अश्वमेध यज्ञके फलको प्राप्त करनेके पश्चात् परमपद-मोक्षकी प्राप्त होता है। (अध्याय १००-१०१)
Summary of chapter 63 of the Bhavishya Mahā Purana is as follows:
The vrata teaching concludes with additional observances covering lunar-solar combinations, eclipse-day vratas, solstice observances, and a rich cycle of vratas specifically for women's welfare — sumāṅgalī vratas for the longevity of the husband, saubhāgya vratas for marital happiness, vratas for the welfare of children, and vratas for agricultural prosperity and rainfall. Each vrata is complete with its procedure, stotra, dāna, and narrative illustration of the grace it confers.