भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-महाराज! एक बार विश्वके उत्पत्ति, पालन और संहारकारक अक्षर पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु भेतद्वीपमें सुखपूर्वक बैठे हुए थे। उसी समय जगन्माता लक्ष्मीने उनके चरणोंग पक्षान प्रणाम कर उनसे पूछा-'भगवन्!
आप भक्तोंपर अनुकम्पा करनेवाले हैं। महाभाग। मुझपर भी दया करके आप कोई ऐसा रूप- सौभाग्यदायक सर्वोत्तम व्रत बतलायें, जिसके आचरणसे समस्त तीर्थ आदि पुण्य कमौका फल प्राप्त हो जाय।
भगवान् विष्णु बोले-देवि ! जिस प्रकार आश्रमोंमें गृहस्थाश्रम, वर्णीमें ब्राह्मण, नदियोंमें गङ्गा, जलाशयोंमें समुद्र, देवताओंमें विष्णु (मैं) तथा स्त्रियोंमें तुम (लक्ष्मी) श्रेष्ठ हो, उसी प्रकार व्रतोंमें काञ्चनपुरीव्रत उत्तम है। इस व्रतका पहले भगवती पार्वतीने भगवान् शंकरके साथ अनुष्ठान किया था। सीताजीने भी भगवान् श्रीरामके साथ इसी व्रतका पालन कर अखण्ड साम्राज्य प्राप्त किया था। दमयन्तीके वियोगमें राजा नलने भी इस व्रतको किया था। वनवासी पाण्डवोंने भी द्रौपदीके साथ इस व्रतका आचरण किया और सभी कष्टों से मुक्त होकर साम्राज्य-लाभ किया। भद्रे! यह व्रत स्वर्ग और मोक्षको प्रदान करनेवाला है। रम्भा, मेनका, इन्द्राणी (शची) सत्यभामा, शाण्डिली, अरुन्धती, उर्वशी तथा देवदत्ता आदि श्रेष्ठ स्त्रियोंने इस व्रतका आचरण करके सौभाग्य, सुख और अपने मनोरथ प्राप्त किये थे। पातालमें नागकन्याओंने और गायत्री, सरस्वती एवं सावित्री आदि उत्तम देवियों तथा अन्य नारियोंने सभी कामनाओंकी पूर्तिकी अभिलाषासे इस ब्रतका अनुष्ठान किया था। यह व्रत सभी प्रकारके दुःखोंका नाशक, प्रीतिवर्धक तथा व्रतों में उत्तम है, इसलिये इस व्रतका मैं वर्णन कर रहा हूँ। इसके अनुष्ठानसे ब्रहाहत्या आदि महापातकोंके करनेवाले, तौल मापमें कमो करनेवाले, कन्या बेचनेवाले, गौ बेचनेवाले, अगम्यागमनमें लिस, मांसभक्षी, जारजपुत्रके यहाँ भोजन करनेवाले, भूमिका हरण करनेवाले आदि पापकर्मी भी पापोंसे निःसंदेह मुक्त हो जाते हैं। इसकी विधि इस प्रकार है-
देवि ! यह काञ्चनपुरी व्रत किसी महीने में शुवल या कृष्ण पक्षकी तृतीया, एकादशी, पूर्णिमा, संक्रान्ति, अमावास्या तथा अष्टमीको उपवासपूर्वक किया जा सकता है। व्रती इस दिन काञ्चनपुरी बनवाकर दान करे। वह पूर्वाहमें नदी आदिके शुद्ध निर्मल जलमें स्नान करे। पहले मन्त्रपूर्वक पवित्र मृत्तिका ग्रहणकर उसे शरीरमें लगाये फिर जलमें गोते लगाये। इस विधिसे स्नान कर शुद्धात्मा व्रती अपने घर आये और उस दिन किसी पाखण्डी, विधर्मी, धूर्त, शठ आदिसे वार्तालाप न करे। अपना हाथ-पैर धोकर पवित्र हो आचमन करे। एक उत्तम जलसे भरा स्वर्णयुक्त शङ्ख लेकर उस जलको द्वादशाक्षरमन्त्रसे अभिमन्त्रितकर 'हरि' इस मन्त्रका जप कर जल पी ले। शमीवृक्षसे चार स्तम्भोंसे युक्त एक वेदी बनाये जो चार हाथ प्रमाणकी हो। वेदीको पुष्पमाला, वितान, दिव्य धूप आदिसे अधिवासित और अलंकृत कर ले। वेदोके मध्य में एक पाको रचना करे। मण्डलके बीचमें सुन्दर एक 'भद्रपीठका निर्माण कराये। भद्रपीठके ऊपर सुन्दर आसनपर लक्ष्मीके साथ भगवान् जनार्दनकी स्थापना करे। मण्डलके अग्र- भागमें जलपूर्ण कलशको स्थापना कर उसमें क्षीरसागरकी कल्पना करे। कलशपर चार पल, दो पल अथवा एक पलकी काशनपुरीको स्वर्णमयी प्रतिमा बनाकर स्थापित करे। उसके आगे कदली- स्तम्भ और तोरण लगाये। फिर ब्राह्मणों द्वारा उसकी प्रतिष्ठा कराये।
उस पुरीके मध्य में विष्णुसहित लक्ष्मीकी सुवर्णमय प्रतिमा की स्थापना करनी चाहिये। पञ्जामृतसे देवेश नारायण तथा लक्ष्मीको स्नान कराकर मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए चन्दन, पुष्प आदि उपचारोंद्वारा उनका पूजन करना चाहिये। इन्द्रादि लोकपालोंकी पूजा भी यथाक्रमसे करनी चाहिये। विप्ननिवारणके में लिये गणपति तथा नवग्रहोंका पूजन कर हवन करना चाहिये। तत्पश्चात् पायस, सोहाल, फेनी, मोदक आदिका नैवेद्य अर्पित कर देश-कालके अनुसार फल भी अर्पण करना चाहिये। दस दिशाओंमें दस घृतपूरित दीपक प्रज्वलित करे। पुष्पमाला, चन्दन आदि भी चढ़ाये, साथ ही विष्णुस्तवराज, पुरुषसूक्त आदिका पाठ करे। सोलह सपत्नीक ब्राह्मणों में लक्ष्मी-विष्णुकी भावना कर पूजा करे। अन्तमें पूजित सभी पदार्थ उन्हें निवेदित कर प्रार्थना करे कि 'ब्राह्मण देवता! भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हो जायँ।' शय्या-दान तथा गो-दान भी करे। जो काञ्चनपुरी आदिकी प्रतिमा पूजित की गयी है, उसे व्रती देख न सके, इसलिये वस्त्रसे आच्छादितकर अपने नेत्रोंको वस्त्रसे ढककर दीपके साथ मण्डपमें ले आये और आचार्य कहे-'आप सभी कामनाओंको देनेवाली एवं दुःख दौभाग्यको दूर करनेवाली इस रमणीय काञ्चनपुरीका दर्शन करें।'
अनन्तर व्रती नेत्रके वस्त्रको खोलकर गुरुके सम्मुख पुष्पाञ्जलि देकर उस शुभ पुरीका दर्शन करे। तदनन्तर चाँदी, ताँबे अथवा किसी शङ्खमें पञ्चरन, गङ्गाजल, फल, सरसों, अक्षत, रोचना तथा दहीमिश्रित अर्घ्य बनाकर भगवान् विष्णुको प्रदान करे और प्रार्थना करे-'सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले भगवान् लक्ष्मीनारायण! आप इस सुवर्णपुरीके प्रदान करनेसे मनोवाञ्छित फल पूर्ण करें। नारायण। लक्ष्मीकान्त! जगनाथ! आप इस अर्घ्यको ग्रहण करें, आपको नमस्कार है।' इस प्रकार महातेजस्वी भगवान् विष्णुको अर्घ्य देकर भक्तिपूर्वक देवी लक्ष्मीको भी अर्ध्य प्रदान करना चाहिये और कहना चाहिये कि 'देवि! आप ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, पार्वती एवं भगवान् कार्तिकेयसे पूजित हैं। धर्मकी कामनासे मेरे द्वारा भी आप पूजित हैं, आप मुझे सौभाग्य, पुत्र, धन, पौत्र प्रदान करें। देवि! आप मेरे द्वारा प्रदत्त इस अर्घ्यको ग्रहण कर मुझे सुख प्रदान करें। इस प्रकार व्रतको पूर्णकर महोत्सव मनाये एवं रात्रिमें जागरण करे। निद्रारहित होकर जागरण करनेसे सौ यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। प्रात:काल निर्मल जलसे स्नानकर पितर और देवताओंकी पूजा कर सपलीक ब्राह्मणों को वस्त्र देकर भोजन कराये और यथाशक्ति दक्षिणा प्रदानकर क्षमा-याचना करे। दीन, अन्ध, बधिर, पंगु आदि सबको संतुष्ट करे। अनन्तर पारणा करे। तदनन्तर मधुर पायसयुक्त व्यञ्जनोंसे मित्र और बान्धवोंके साथ भोजन करे। ऐसा करनेसे व्रती ब्रह्मलोकको प्राप्त कर ब्रह्माके साथ आनन्दमय जीवन व्यतीत करता है। अनन्तर रुद्रलोक, उसके बाद विष्णुलोकको प्राप्त करता है। देवि! काञ्चनपुरी नामक यह व्रत पूर्वसमयमें तुमने भी किया था, उसी पुण्यके प्रभावसे त्रैलोक्यपूजित मुझे स्वामीके रूपमें तुमने प्राप्त किया है। (अध्याय १४७)