सूतजी बोले-ऋषियो! भगवान् नारायणने स्वयं कृपापूर्वक देवर्षि नारदजीद्वारा जिस प्रकार इस व्रतका प्रचार किया, अब मैं उस कथाको कहता हूँ, आपलोग सुनें-
लोकप्रसिद्ध काशी नगरीमें एक श्रेष्ठ विद्वान् ब्राह्मण रहते थे, जो विष्णुव्रतपरायण थे, वे गृहस्थ थे, दीन थे तथा स्त्री-पुत्रवान् थे। वे भिक्षा-वृत्तिसे अपना जीवन-यापन करते थे। उनका नाम शतानन्द था। एक समय वे भिक्षा माँगनेके लिये जा रहे थे। उन विनीत एवं अतिशय शान्त शतानन्दको मार्गमें एक व्द्ध ब्राहाण दिखायी दिये, जो साक्षात् हरि हो थे। उन वृद्ध ब्राह्मणवेषधारी श्रीहरिने ब्राह्मण शतानन्दसे गूछा-'द्विज श्रेष्ठ। आप किस निमित्तसे कहाँ जा रहे हैं?' शतानन्द बोले-'सौभ्य। अपने पुत्र- कलत्रादिके भरण-पोषणके लिये धन-याचनाकी
कामनासे मैं धनिकों के पास जा रहा हूँ।'
नारायणने कहा-द्विज! निर्धनताके कारण आपने दीर्घकालसे भिक्षावृत्ति अपना रखी है, इसकी निवृत्तिके लिये सत्यनारायणवत कलियुगमें सर्वोत्तम उपाय है। इसलिये मेरे कथनके अनुसार आप कमलनेत्र भगवान् सत्यनारायणके चरणोंको शरण-ग्रहण करें, इससे दारिद्र्य, शोक और सभी संतापोंका विनाश होता है तथा भोक्ष भी प्राप्त होता है।
करणागृति भगवाने सपनों को सुनकर ब्राह्मण शतानन्दने पूछा-'ये सत्यनारायण कौन हैं ?'
ब्राह्मणरूपधारी भगवान् बोले- नानारूप धारमा करनेवाले, सत्यनत, सर्वत्र व्यास रहनेवाले तथा निरञ्जन वे देव इस समय विप्रका रुप धारणकर तुम्हारे सामने आये हैं। इस महान् दुःखरुपी संसार-सागरमें पड़े हुए प्राणियोंको तारनेके लिये भगवान्के चरण नौकारूप हैं। जो बुद्धिमान् व्यक्ति हैं, वे भगवान्की शरणमें जाते हैं, किंतु विषयोंमें व्याप्त विषयबुद्धिवाले व्यक्ति भगवान् की शरणमें न जाकर इसी संसार-सागरमें पड़े रहते हैं। इसलिये द्विज! संसारके कल्याणके लिये विविध उपचारोंसे भगवान् सत्यनारायण-देवकी पूजा, आराधना तथा ध्यान करते हुए तुम इस व्रतको प्रकाशमें लाओ।
विप्ररूपधारी भगवान्के ऐसा कहते ही उस ब्राह्मण शतानन्दने मेघोंके समान नीलवर्ण, सुन्दर चार भुजाओंमें शङ्ख, चक्र, गदा तथा पद्म लिये हुए और पीताम्बर धारण किये हुए, नवीन विकसित कमलके. समान नेत्रवाले तथा मन्द-मन्द मधुर मुसकानवाले, वनमालायुक्त और भौरोंके द्वारा चुम्बित चरण-कमलवाले पुरुषोत्तम भगवान् नारायणके साक्षात् दर्शन किये।
भगवान् की वाणी सुनने और उनका प्रत्यक्ष दर्शन करनेसे उंस विप्रके सभी अङ्ग पुलकित हो उठे, आँखोंमें प्रेमा श्रु भर आये। उसने भूमिपर गिरकर भगवान्को साष्टाङ्ग प्रणाम किया और गद्गद वाणीसे वह उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगा-
संसारके स्वामी, जगत्के कारणके भी कारण, अनाथोंके नाथ, कल्याण मङ्गलको देनेवाले, शरण देनेवाले, गुण्मरूप, पवित्र, अव्यक तथा व्यक्त होनेवाले और आधितिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक
तीनों प्रकारके तापोका समूल उच्छेद करनेवाले भगवान् सत्यनारायणको मैं प्रणाम करता हूँ। इस संसारके रचयिता सत्यनारायणदेवको नमस्कार है। विश्वके भरण-पोषण करनेवाले शुद्ध सत्वस्वरूपको नमस्कार है तथा विश्वका विनाश करनेवाले कराल महाकालस्वरूपको नमस्कार है। सम्पूर्ण संसारका मङ्गल करनेवाले आत्ममूर्तिस्वरूप हे भगवन्! आपको नमस्कार है। आज मैं धन्य हो गया, पुण्यवान् हो गया, आज मेरा जन्म लेना सफल हो गया, जो कि मन-वाणीसे अगम-अगोचर आपका मुझे प्रत्यक्ष दर्शन हुआ। मैं अपने भाग्यको क्या सराहना करूँ। न जाने मेरे किस पुण्यकर्मका यह फल था, जो मुझे आपके दर्शन हुए। प्रभो! आपने क्रियाहीन इस मन्द-बुद्धिके शरीरको सफल कर दिया।
लोकनाथ ! रमापते! किस विधिसे भगवान् सत्यनारायणका पूजन करना चाहिये, विभो! कृपाकर ठसे भी आप बतायें। संसारको मोहित करनेवाले भगवान् नारायण मधुर वाणीमें बोले-'विप्रेन्द्र ! मेरी पूजामें बहुत अधिक धनकी आवश्यकता नहीं, अनायास जो धन प्रास हो जाय, उसीसे श्रद्धापूर्वक मेरा यजन करना चाहिये। जिस प्रकार मेरी स्तुतिसे, स्मृतिसे ग्राह-ग्रस्त गजेन्द्र, अजामिल संकटसे मुक्त हो गये, इसी प्रकार इस व्रतके आश्रयसे मनुष्य तत्काल क्लेशमुक्त हो जाता है।' इस व्रतकी विधिको सुने-
अभीष्ट कामनाकी सिद्धिके लिये पूजाकी सामग्री
१-दुःखोदधिनिमग्नानां सरणिधरणौ हरेः ।
कुशलाः शरणं यान्ति नेतरे विषयात्मिकाः ॥
(प्रतिसर्गपर्व २॥ २५ ॥ १०)
प्रणमपि जान्नाथं जगत्कारणकारणम् ।
अनाथनार्थ शिवदं शरण्यमनघं शुचिम्॥
अव्यक्त व्यक्तता यातं तापत्रयविमोचनम् ॥
नमः सत्यनारायणायास्य कर्वे नमः शुमसत्त्वाय विश्वस्थ भा। कालायकालावविश्वस्यहर्बनमस्तेजामकलायात्यामूर्त ।
धन्योऽस्म्या कृती धन्यो भवोऽद्य सफलोमम ।
याङ्मनोऽगोचरो यस्त्वं मम प्रत्यक्षमागतः ।
दिष्टं किं वर्णयाम्याहो न जाने कस्य वा फलम् ।
क्रियाहीनस्य मन्दस्य देहोऽयं फलवान् कृतः।
(प्रतिमापर्व १२५१५-११)
एकत्रकर विधिपूर्वक भगवान् सत्यनारायणकी पूजा करनी चाहिये। सवा सेरके लगभग गोधूम-चूर्णमें दूध और शक्कर मिलाकर, उस चूर्णको घृतसे युक्तकर हरिको निवेदित करना चाहिये, यह भगवान्को अत्यन्त प्रिय है। पञ्चामृतके द्वारा भगवान् शालग्रामको स्नान कराकर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य तथा ताम्बूलादि उपचारोंसे मन्त्रोंद्वारा उनकी अर्चना करनी चाहिये। अनेक मिष्टात्र तथा भक्ष्य-भोज्य पदार्थों एवं ऋतुकालोद्भूत विविध फलों तथा फूलोंसे भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। फिर ब्राह्मणों तथा स्वजनोंके साथ मेरी कथा, राजा (तुङ्गध्वज)-के इतिहास, भीलोंकी और वणिक् (साधु)-की कथाको आदरपूर्वक श्रवण करना चाहिये। कथाके अनन्तर भक्तिपूर्वक सत्यदेवको प्रणामकर प्रसादका वितरण करना चाहिये। तदनन्तर भोजन करना चाहिये। मेरी प्रसन्नता द्रव्यादिसे नहीं, अपितु श्रद्धा-भक्तिसे ही होती है।
विप्रेन्द्र! इस प्रकार जो विधिपूर्वक पूजा करते हैं, वे पुत्र-पौत्र तथा धन-सम्पत्तिसे युक्त होकर श्रेष्ठ भोगोंका उपभोग करते हैं और अन्त में मेरा सांनिध्य प्राप्त कर मेरे साथ आनन्दपूर्वक रहते हैं। व्रती जो-जो कामना करता है, वह उसे अवश्य ही प्राप्त हो जाती है।
इतना कहकर भगवान् अन्तर्धान हो गये और वे ब्राह्मण भी अत्यन्त प्रसन्न हो गये। मन-ही-मन उन्हें प्रणाम कर वे भिक्षाके लिये नगरकी ओर चले गये और उन्होंने मनमें यह निश्चय किया कि आज शिक्षामें जो धन मुझे प्रास होगा, मैं उससे भगवान् सत्यनारायणकी पूजा करूंगा।'
उस दिन अनायास बिना माँगे ही उन्हें प्रचुर धन प्राप्त हो गया। वे आश्चर्यचकित हो अपने घर आये। उन्होंने सारा वृत्तान्त अपनी धर्मपत्नीको बताया। उसने भी सत्यनारायणके व्रत-पूजाका अनुमोदन किया। बह पतिकी आज्ञासे श्रद्धापूर्वक बाजारसे पूजाकी सभी सामग्रियोंको ले आयी और अपने बन्धु-बान्धवों तथा पड़ोसियोंको भगवान् सत्यनारायणको पूजामें सम्मिलित होनेके लिये बुला ले आयी। अनन्तर शतानन्दने भक्तिपूर्वक भगवान् की पूजा की। कथाकी समाप्तिपर प्रसन्न होकर उनकी कामनाओंको पूर्ण करनेके उद्देश्यसे भक्तवत्सल भगवान् सत्यनारायणदेव प्रकट हो गये। उनका दर्शन कर ब्राह्मण शतानन्दने भगवान्से इस लोकमें तथा परलोकमें सुख एवं पराभक्तिकी याचना की और कहा-'हे भगवन् ! आप मुझे अपना दास बना लें।' भगवान् भी 'तथास्तु' कहकर अन्तर्धान हो गये। यह देखकर कथामें आये सभी जन अत्यन्त विस्मित हो गये और ब्राह्मण भी कृतकृत्य हो गया। वे सभी भगवान्को दण्डवत् प्रणामकर आदरपूर्वक प्रसाद ग्रहणकर 'यह ब्राह्मण धन्य है, अन्य है', इस प्रकार कहते हुए अपने-अपने घर चले गये। तभीसे लोकमें यह प्रचार हो गया कि भगवान् सत्यनारायणका ब्रत अभीष्ट कामनाओंकी सिद्धि प्रदान करनेवाला, क्लेशनाशक और भोग- मोक्षको प्रदान करनेवाला है। (आयाय २५)
[सत्यनारायणव्रत-कथाका द्वितीय अध्याय]