सूतजी कहते हैं-ब्राह्मणो! उद्यान आदिकी प्रतिष्ठामें जो कुछ विशेष विधि है, अब उसे बता रहा हूँ, आपलोग सुनें। सर्वप्रथम एक चौकोर मण्डलकी रचना कर उसपर अष्टदल कमल बनाये। मण्डलके ईशानकोणमें कलशकी स्थापना कर उसपर भगवान् गणनाथ और वरुणदेवकी पूजा करे। तदनन्तर मध्यम कलशमें सूर्यादि ग्रहोंका पूजन करे। फिर पश्चिमादि द्वारदेशोंमें ब्रह्मा और अनन्त तथा मध्य में वरुणकी पूजा करे। जलपूरित कलशमें भगवान् वरुणका आवाहन करते हुए कहे-'वरुणदेव ! मैं आपका आवाहन करता हूँ। विभो! आप हमें स्वर्ग प्रदान करें। तदनन्तर पूर्वभागमें मन्दरगिरिकी स्थापना कर तोरणपर विष्वक्सेनकी पूजा करे और कर्णिका-देशमें भगवान् वासुदेवका पूजन करे। भगवान् वासुदेव शुद्ध स्फटिकके सदृश हैं। वे अपने चारों हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा और पा धारण किये हुए हैं। उनके वक्षःस्थलपर श्रीवत्स-चिह्न और कौस्तुभमणि सुशोभित है तथा मस्तक सुन्दर मुकुटसे अलंकृत है। उनके दक्षिण भागमें भगवती कमला, वाम भागमें पुष्टिदेवी विराजमान हैं। सुर, असुर, सिद्ध, किन्नर, यक्ष आदि उनकी स्तुति करते हैं। विष्णो रराट' (यजु ५।२१) इस मन्त्रसे भगवान् विष्णुको पूजा करे। उनके साथमें संकर्षणादि व्यूह और विमला आदि शक्तियोंको धूप, दीप आदि उपचारोंसे अर्चना कर प्रार्थना करे। उनके सामने घीका दीप जलाये और गुग्गुलका धूप प्रदान कर पृतमिश्रित खोरका नैवेध लगाये। कर्णिकाके दक्षिणको ओर कमलके ऊपर स्थित सोमका ध्यान करे। उनका वर्ण शुक्ल है, वे शान्तस्वरूप हैं, वे अपने हाथों में वरद और अभय-मुद्रा धारण किये हैं एवं केयूरादि धारण करनेके कारण अत्यन्त शोभित हैं। 'इमं देवा.' (यजु ९।४०) इस मन्त्रसे इनकी पूजा कर इन्हें घृतमिश्रित भातका नैवेद्य अर्पण करे। पूर्व आदि दिशाओंमें इन्द्र, जयन्त, आकाश, वरुण, अग्नि, ईशान, तत्पुरुष तथा वायुकी पूजा करे । कर्णिकाके वाम भागमें शुक्ल वर्णवाले महादेवका 'त्र्यम्बकं.' (यजु ३।६०) इस मन्त्रसे पूजन कर नैवेद्य आदि प्रदान करे। भगवान् वासुदेवके लिये हविष्यसे आठ, सोमके लिये अट्ठाईस तथा शिवके लिये दो खीरकी आहुतियाँ दे। गणेशजीको बीकी एक आहुति दे। ब्रह्मा एवं वरुणके लिये एक-एक आहुति और ग्रहों एवं दिक्पालोंके लिये विहित समिधाओं तथा घीसे एक-एक आहुतियाँ दे। अग्निकी सात जिह्वाओं-कराली, धूमली, श्वेता, लोहिता, स्वर्णप्रभा, अतिरिक्ता और पारागाको भी मन्त्रोंसे घृत एवं मधुमिश्रित हविष्यद्वारा एक-एक आहुति प्रदान करे। इसी प्रकार अग्नि, सोम, इन्द्र, पृथ्वी और अन्तरिक्षके निमित्त मधु और क्षीरयुक्त यवोंसे एक-एक आहुतियाँ प्रदान करे। फिर गन्ध-युष्यादिसे उनकी पृथक् पृथक् पूजा करके रुद्रसूक्त तथा सौरसूक्तका जप करे। अनन्तर यूपको भलो हौति स्नान कराकर और उसका मार्जन कर उसे उधानके मध्य भागमें गाड़ दे। यूपके प्रान्त भागमें सोम तथा वनस्पतिके लिये ध्वजाओको लगा है। कोदाकस्मा(यजु) इस मन्त्रसे वृक्षोंका कर्णवेष संस्कार करे। एक तीखी सूईसे वृक्षके दक्षिण तथा वाम भागके दो पत्तोंका छेदन करे । नवग्रहोंकी तृप्ति के लिये लड्डू आदिका भोग लगाये तथा बालक और कुमारियोंको मालपुआ खिलाये। रंजित सूत्रोंसे उद्यानके वृक्षोंको आवेष्टित करे। उन वृक्षोंको जलादिका प्राशन कराये और यह प्रार्थना-मन्त्र पढ़े-
वृक्षाग्नात् पतितस्यापि आरोहात् पतितस्य च।
मरणे वास्ति भने वा कर्ता पापैर्न लिप्यते॥
(मध्यमपर्व ३।१।३१)
तात्पर्य यह कि विधिपूर्वक उद्यान आदिमें लगाये गये वृक्षके ऊपरसे यदि कोई गिर जाय, गिरकर मर जाय या अस्थि टूट जाय तो उस पापका भागी वृक्ष लगानेवाला नहीं होता। उद्यानके निमित्त पूजा आदि कर्म करानेवाले आचार्यको स्वर्ण, धान, गाय तथा दक्षिणा प्रदान कर उनकी प्रदक्षिणा करे। ऋत्विको भी स्वर्ण, रजत आदि दक्षिणामें दे। ब्रह्माको भी दक्षिणा देकर संतुष्ट करे एवं अन्य सदस्योंको भी प्रसन्न करे। अनन्तर यजमान स्थापित अधिकलशके जलसे स्नान करे। सूर्यास्तसे पूर्व ही पूर्णाहुति सम्पन्न करे। सम्पूर्ण कार्य पूर्णकर अपने घर जाय और विप्रोंके द्वारा वहाँ बल, काम, हयग्रीव, माधव, पुरुषोत्तम, वासुदेव, धनाध्यक्ष और 'नारायण-इन सबका विधिवत् स्मरण कर पूजन कराये और पशगच्यमिश्रित दधि भातका नैवेद्य समर्पित करे।
बल आदि देवताओं की पूजा करनेके पश्चात् दक्षिणकी ओर 'स्योना पृथिवी-' (यजु ३५ । २१) इस मन्जसे पृथ्वीदेवीका पूजन करे। मधुमिश्रित पायसाबका नैवेद्य अर्पित करे। पृथ्वीदेवो शुद्ध काश्चन वर्णकी आभासे युक्त है। हाथमें वरद और अभयमुद्रा धारण किये हुए हैं। सम्पूर्ण अलंकारोंसे अलंकृत हैं। घरके वाम भागमें विश्वकर्माका यजन करे। 'विश्वकर्मन्' (ऋ १०॥८१।६) यह मन्त्र उनके पूजनमें विनियुक्त है। भगवान् विश्वकर्माका वर्ण शुद्ध स्फटिकके समान है, ये शूल और टंकको धारण करनेवाले हैं तथा शान्तस्वरूप हैं। इन्हें मधु और पिष्टककी बलि दे। अनन्तर कौष्माण्डसूक्त तथा पुरुषसूक्तका पाठ करे। इसी पृथ्वी-होम-कर्ममें मधु और पायस-युक्त हविष्यसे आठ आहुतियाँ दे तथा अन्य देवताओंको एक-एक आहुति दे।
उद्यानके चारों ओर अथवा बीच-बीचमें उद्यानकी रक्षाके लिये मेड़ोंका निर्माण करे, जिन्हें धर्मसेतु कहा जाता है। उद्यानकी दृढ़ताके लिये विशेष प्रबन्ध करे। धर्मसेतुका निर्माण कर उनसे इस प्रकार प्रार्थना करे-
पिच्छिले पतितानां च उच्छ्रितेनाङ्गसंगतः।
प्रतिष्ठिते धर्मसेतो धर्मो मे स्यान्न पातकम्।
ये चात्र प्राणिनः सन्ति रक्षां कुर्वन्ति सेतवः ।
वेदागमेन यत्पुण्यं यथैव हि समर्पितम्।
(मध्यमपर्व ३।१।४४-४६)
तात्पर्य यह कि यदि कोई व्यक्ति इस धर्मसेतु (मेड़)-पर चलते समय गिर जाय, फिसल जाय तो इस धर्मसेतुके निर्माणका कोई पाप मुझे न लगे। क्योंकि इस धर्मसेतुका निर्माण मैंने धर्मकी अभिवृद्धिके लिये ही किया है। इस स्थानपर आनेवाले प्राणियोंकी ये धर्मसेतु रक्षा करते हैं। वेदाध्ययन आदिसे जो पुण्य प्राप्त होता है, वह पुण्य इस धर्म सेतुके निर्माण करनेपर प्राप्त होता है। (अध्याय १)