भविष्य महा पुराण

परिहारवंश और बंगालके शूरवंश आदिका वर्णन

सूतजी बोले-हे भृगु श्रेष्ठ शौनक ! अब आप परिहारवंशके राजाओंका वर्णन सुनें। अथर्ववेदवेत्ता परिहारने सभी बौद्धोंको जीतकर सर्वशक्तिमयी देवीकी श्रद्धापूर्वक आराधना की। सर्वशक्तिमयो देवीने प्रसन्न होकर चित्रकूट पर्वतके ऊपर डेढ़ योजन विस्तृत एक नगरका निर्माण किया। देवताओंके प्रिय इस नगरमें कलिको बंदी बना लिया गया था और यहाँ कलिका कभी प्रवेश नहीं होता, इसलिये यह नगर 'कलिंजर' नामसे इस पृथ्वीपर प्रसिद्ध हुआ। परिहारने उस कलिंजर नामके नगरमें बारह वर्षातक राज्य किया। उसका पुत्र गौरवर्मा हुआ। गौरवमति अपने पिताके समान ही राज्य किया। उसने प्रसन्नतापूर्वक अपने छोटे भाई घोरवर्गाको कलिंजरका राज्य सौंप दिया। अनन्तर वह गौडदेशमें मला आया और वहाँ राज्य करने लगा। गौरवांका पुरषर्ण अपने पिताके बाद वहाका राजा हुआ। उसका पुत्र रुपण हुआ और रूपणका पुत्र कारवर्मा (कामवर्मा) हुआ।

इधर शक नामके राजाने महालक्ष्मी सनातनी देवीकी आराधना की। तीन वर्षके अन्त में उस देवीने कामाक्षीका रूप धारण कर अपने भक्तका पालन करनेके लिये वहाँ निवास किया कामवर्माने पचास वर्षतक राज्य किया। कामवर्माके भोगवर्मा नामका पुत्र और भोगवती नामकी कन्या उत्पन्न हुई। उस राजाने भोगवती नामको अपनी कन्या विक्रमको प्रदान की और अपना राज्य अपने पुत्र भोगवर्माको दे दिया। भोगवर्माका पुत्र कालिवर्मा हुआ।

कालिवर्माने  भक्तिपूर्वक महाकालीकी उपासना  की। उससे प्रसन्न होकर बर देने के लिये भगवती काली स्वयं उपस्थित हुई। भगवती काली प्रसा होकर अनेक पुमोको पालियोको पपी को, जिससे

*नगरं निजकूटाद्री चकार कलिनिर्जरम् । कलियंत्र भवेद्धो गरेऽस्मिन् सुरप्रिये ।।

अतः कलिजरी नाना प्रसिद्धोभूमहोतले।(प्रतिसर्गपर्व ४।४।३-४)

एक सुन्दर नगर उत्पन्न हुआ। जो कलिकातापुरी (कलकत्ता)-के नामसे इस पृथ्वीपर प्रसिद्ध हुआ। कालिवर्माका पुत्र कौशिक, उसका पुत्र कात्यायन, उसका पुत्र हेमवत, हेमवतका पुत्र शिववर्मा, शिववर्माका पुत्र भववर्मा और भववर्माका पुत्र रुद्रवर्मा हुआ। इन्होंने भी अपने-अपने पिताके समान राज्य किया। रुद्रवर्माका पुत्र भोजवर्मा हुआ। भोजवर्माने अपने पिताका राज्य त्यागकर वनप्रदेशमें भोजराष्ट्रका निर्माण किया। भोजवर्माका पुत्र गववर्मा हुआ और उसका पुत्र विंध्यवर्मा राजा हुआ। विंध्यवर्मा अपने छोटे भाईको राज्य सौंपकर वंग (बंगाल)-देश चला गया। विंध्यवर्माका पुत्र सुखसेन, उसका पुत्र बलाक हुआ। बलाकने दस वर्षतक राज्य किया और उसका पुत्र लक्ष्मण (सेन), उसका पुत्र माधव, ठसका पुत्र वेशव और वेशवका पुत्र सुरसेन हुआ। सुरसेनका पुत्र नारायण और नारायणका पुत्र शान्तिवर्मा हुआ।

शान्तिवर्माने गङ्गाके किनारे शान्तिपुर नामक एक नगर बसाया और वह वहाँ रहने लगा। पुत्र नदीवर्मा हुआ महान् बलवान् गांगादरा हुआ। उसने गौड़ (हाका) राष्ट्र की ओर जानेवाली दिशामें नदोहा (नदिया) नामक एक रम्य नगरी बसायो। गंगादत्तने एक विशेषज्ञ विद्याधरको बुलाया। उसोके द्वारा यह वेदपरायणपुरी नदीहा रक्षित थी। राजा गंगादत्तने बीस वर्षतक वहाँ राज्य किया। तभीसे उसके कुलमें उत्पन्न होनेवाले गावंशी इस पृथ्वीपर प्रसिद्ध हुए। गंगादत्तका शार्ङ्गदेव नामक एक महाबली और

विष्णुभक्त पुत्र हुआ। वह शादेव गौड़देशमें जाकर श्रीहरिके ध्यानमें तल्लीन हो गया। शायदेवने दस वर्षतक राज्य किया और उसका पुत्र गंगादेव हुआ। बीस वर्षतक उसने राज्य किया। गंगादेवका पुत्र अनंग राजा हुआ। बलवान् अनंग गौड़देशका महीपति हुआ। पिताके समान उसने भी राज्य किया। अनंगका पुत्र राजेश्वर, उसका पुत्र नृसिंह और उसका पुत्र कलिवर्मा हुआ। राष्ट्रदेशमें जाकर बलवान् कलिवर्मान वहाँके राजाको जीतकर महावती नामक रमणीय पुरीके मध्य सुखपूर्वक राज्य किया। कलिवर्माका पुत्र हुआ धृतिवर्मा। धृतिवर्माका पुत्र महीपति हुआ। जयचन्द्रकी आज्ञासे राजा महीपतिने उवामाया (उर्वीया) नामसे एक प्रसिद्ध नगरीका निर्माण किया और वहाँपर निवास करने लगा। कुरुक्षेत्रमें सभी चन्द्रवंशीय क्षत्रिय राजा मारे गये। तब महीपति महावतीका राजा हुआ। बीस वर्षतक महीपत्तिने राज्य किया। अनन्तर सहोद्दीनके द्वार सुयोधनके कलांशसे उत्पन्न जो राजा थे वे सभी कुरुक्षेत्रमें मारे गये। परिहारके पुत्र घोरवनि कलिंजरमें राज्य किया। उसका पुत्र हुआ शार्दूल। उसके वंशमें जो राजा हुए वे शार्दूलीय नामसे प्रसिद्ध हुए। महामायाके प्रसादसे सम्पूर्ण भूमिपर शार्दूलवंशम उत्पन्न राजा व्याप्त हो गये।

हे शौनक ! इस प्रकार अप्रिवंशीय राजाओंके कुलका मैंने वर्णन किया, चन्द्र और सूर्यवंशका स्मरण करनेसे जैसे पाप नष्ट हो जाते हैं. ऐसे ही यह अधिवेशभी पवित्र करनेवाला है। जब अन्य बंशका वर्णन कर रहा है, जिसमें हरि स्वयं उत्पन्न हुए।(अध्याय)

कलिका बहुपुष्याणां सा चकार जाहर्यतः ।

ताभिर्भवं च नगरे संजातं च मनोहरम्॥

कलिकाता पुरी नाना प्रसिद्धान्महौतले।

(प्रतिसर्गपर्व ४।४।१३-१४)