महाराज युधिष्ठिरने पूछा- भगवन्! आपके श्रीमुखसे मैंने पुराणोंके विषयोंको सुना। व्रतोंको भी मैंने विस्तारपूर्वक सुना, संसारकी असारताको भी मैंने समझा, अब मैं दानके माहात्म्यको सुनना चाहता हूँ। दान किस समय, किसको, किस विधिसे देना चाहिये, यह सब बतानेको कृपा करें। मेरी समझसे दानसे बढ़कर अन्य कोई पुण्य कार्य नहीं है। क्योंकि धनिकोंका धन चोरोंद्वारा चुराया जा सकता है अथवा राजाद्वारा छिनवाया जा सकता है, अत: धन रहनेपर दान अवश्य करना चाहिये।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज ! मुल्युके उपरान्त धन आदि वैभव व्यक्तिके साथ नहीं जाते, परंतु बाहरणको दिया गया दान परलोको पाथेय बनकर उसके साथ जाता है। हए, पुष्ट, बलवान् शरीर पानेसे भी कोई लाभ नहीं है, जबतक कि किसीका उपकार न करे। उपकारहीन जीवन व्यर्थ है। इसलिये एक ग्राससे आधा अथवा उससे भी कम मात्रामें किसी चाहनेवाले व्यक्तिको दान क्यों नहीं दिया जाता? इच्छानुसार धन कब और किसको प्राप्त हुआ या होगा? धर्म, अर्थ तथा कामके विषय में सचेष्ट होकर जिसने प्रयल नहीं किया, उसका जीवन लोहारकी धौंकनीकी भाँति व्यर्थ ही चलता है। जिस व्यक्तिने न दान दिया, न हवन किया, तीर्थस्थानों में प्राण नहीं त्यागा, सुवर्ण, अन्न वस्त्र तथा जल आदिसे ब्राह्मणोंका सत्कार नहीं किया, वही व्यक्ति जन्म-जन्ममें अत्र, वस्त्ररहित, रोगसे प्रसित, हाथमें कपाल
१-द्विजपुत्रमनाचं या संस्कुर्यास कर्मभिः ।
चूडोपनयनाद्यैश्व सोऽश्वमेधफलं लभेत् ।
अन्नायां कन्यका दत्त्वा नाकलोके महोयते ॥
(उत्तरपर्य १४८ ॥ ७-८)
२-प्रासादर्धमपि प्रासमर्थिभ्यः किं न दीयते ।
इच्छानुरूपो विभवः कदा कल्प भविष्यति ।
(उत्तरपर्व १५१।६)
लेकर दर-दर भटकता हुआ याचना करता रहता है। अनेक प्रकारके कष्टोंको सहकर प्राणोंसे भी अधिक प्रिय जो धन एकत्र किया गया है, उसकी एक ही सुगति है दान। शेष भोग और नाश तो प्रत्यक्ष विपत्तियाँ ही हैं.1 उपभोगसे और दानसे धनका नाश नहीं होता, केवल पूर्व-पुण्यके क्षीण होनेसे ही धनका नाश होता है। मरणोपरान्त धनपर अपना स्वामित्व नहीं रह जाता, इसलिये अपने हाथसे ही सुपात्रको धनका दान कर लेना चाहिये। राजन्! दान देनेके अनेक रूप हैं, इस विषयमें व्यास, वाल्मीकि, मनु आदि महापुरुषोंने पहले ही बतलाया है कि पूर्वजन्ममें किये गये व्रत, दान एवं देवपूजन आदि पुण्यकर्म ही दूसरे जन्ममें फलीभूत होते हैं।
राजा युधिष्ठिरने पूछा-भगवन्! भगवान् विष्णु, शिव एवं ब्राह्मणों को प्रसन्नताके लिये जो दान जिस विधिसे देना चाहिये आप उस विधिका वर्णन करें।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा-महाराज! गौ, भूमि 'और सरस्वती-ये तीन दान सभी दानों में श्रेष्ठ और मुख्य हैं। ये अतिदान कहे गये हैं। गायोंके दुहने, पृथ्वीको जोतकर अन्न उपजाने तथा विद्याके पड़ने पढ़ानेसे सात कुलोंका उद्धार होता है। अब मैं दान देने योग्य गौके लक्षणों और गोदानकी विधि बता रहा हूँ-महाराज! सुपष्ट सुन्दर, सवत्सा, पयस्विनी और न्यायपूर्वक अर्जित धनसे प्राप्त गौ श्रेष्ठ ब्राह्मणको देना चाहिये। वृद्धा, रोगिणी, वध्या, आहीन, मृतवत्सा, इशोला और दुग्धरहित तथा अन्यायपूर्वक पाप गौका कभी दान नहीं करना चाहिये। राजन्! किसी पुण्य दिनमें नानकर पितरोंका तर्पणकर भगवान् शिव और विष्णुका घी और दुग्धसे अभिषेक करनेके बाद सोनेके सींगयुक्त, रौप्य खुरवाली, कांस्यके दोहन-पात्रसहित सवत्सा गौका पुष्प आदिसे भलीभाँति पूजन करना चाहिये, उसे वस्त्र तथा माला आदिसे अलंकृत कर ले। गौको पूर्व या उत्तराभिमुख खड़ा करना चाहिये। अनन्तर दक्षिणाके साथ ब्राह्मणको गौका दान करना चाहिये और प्रार्थनापूर्वक इस प्रकार प्रदक्षिणा करनी चाहिये-
गावो ममाग्रतः सन्तु गावो मे सन्तु पृष्ठतः ।
गावो मे हृदये सन्तु गवां मध्ये वसाम्यहम्।
(उत्तरपर्व १५१ । २९-३०)
गायकी पूंछ पकड़कर, हाथीका सूंड़, घोड़ेका कान तथा दासीके सिरका स्पर्श कर और मृगचर्मको पूंछ पकड़कर दान करना चाहिये। जब ब्राह्मण गाय लेकर जाने लगे तो उसके पीछे-पीछे आठ-दस कदमतक जाना चाहिये। इस विधिसे जो व्यक्ति गोदान करता है, उसे सभी प्रकारके अभीष्ट फल प्राप्त होते हैं और स्वर्गकी प्राप्ति होती है। सात जन्मों में किये गये पापका उसी क्षण नाश हो जाता है। राजन् ! यह विधि दक्षप्रजापतिके लिये भगवान् विष्णुने कही है। गोदान करनेवाला चतुर्दश इन्द्रोंके समयतक स्वर्गमें निवास करता है। यह गोदान सभी पापोंको दूर करनेवाला है। इससे बढ़कर और कोई प्रायश्चित्त नहीं है। गोदान ही एक ऐसा दान है, जो जन्म-जन्मान्तरतक फल देता रहता है।' (अध्याय १५१)
१-आयासशतलब्धस्य प्राणध्योऽपि गरीयसः ।
गतिरेकैद वित्तस्य पानमन्या विपत्तयः ।
(उत्तरपर्व (५१)
दान भीगो नाशस्तिनी गतयो भवन्ति धनस्य ।
यो न ददाति न पुरते तस्य तृतीया गतिवति ॥ (सुभाषितरत्नावली)
सो धन धन्य प्रथम गति जाकी । धन्य पुन्य रत मति मोह पाको । (रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड)
२-त्रीण्याहरतिदानानि गाव: पृथ्वी सरस्वती ।
(उत्तरपर्व १५१/१८)