भगवान् श्रीकृष्ण कहते है-महाराज ! अब मैं सभी पापोंको हरनेवाले पवित्र और सब दानों में उत्तमादि उस वराहदानका विधान बता रहा हूँ, जिसके दानका विधान साक्षात् भगवान्ने अपने मुखसे धरणीदेवीको बताया था। यह दान संक्रान्ति, ग्रहण, द्वादशी, यज्ञोत्सव, विवाह, दुःस्वप्र-दर्शन आदि कालोंमें अथवा जब श्रद्धा हो तब करना चाहिये। कुरुक्षेत्र आदि तीर्थों, गङ्गा आदि नदियोंके किनारे, पवित्र पुरियों, अरण्यों, वनों, गोष्ठ, देवालय अथवा अपने घरपर ही कुटुम्बी ब्राह्मणको विधिपूर्वक दान देना चाहिये। वह ब्राह्मण वेद-वेदाङ्ग जाननेवाला सुशील और सम्पूर्णाङ्ग होना चाहिये।
पवित्र भूमिपर प्रणव-मन्त्रसे कुशा बिछाकर उसपर यथाशक्ति दो अथवा चार द्रोण तिलोंसे भगवान् वराहकी मूर्ति बनाये। उसका मुख सुवर्णका और चाँदीका जबड़ा बनाकर पारागसे उसे अलंकृत कर दे। दो भुजाओंमें चंक और गदा धारण कराये, सुवर्णका बना शक तथा वनमाला अगल-बगलमें रख दे। उसके दोनों पैरोंको पुष्पोंसे अथवा चाँदीसे निर्मित करे। उसके दाँतके अग्रभागपर लगी हुई एक सुवर्णमयी पृथ्वी अङ्कित करे। समस्त धान्य-पदार्थों और रसोंको स्थापित करे। उसके शरीरको अलंकृत कर वस्त्रसे आच्छादित कर दे। कुोंसे रोएँ बना दे। तदनन्तर गन्ध, पुष्प आदिसे उस वराहभगवान् की प्रतिमाकी अर्चना करे। फिर ग्रहयज्ञ और तिलोंसे होम करे। अनन्तर भगवान् वराहकी स्तुतिकर नमस्कार करे तथा प्रदक्षिणा कर वस्त्र, आभूषण और दक्षिणासहित वह प्रतिमा ब्राह्मणको दे दे। राजन् ! इस दानसे सभी यज्ञों और सभी दानोंका फल प्राप्त हो जाता है। वराहभगवान्ने जिस प्रकार भूमिका उद्धार किया, उसी भाँति इस दानको करनेवाला पुरुष अपने कुलका उद्धार करता है और विष्णुलोकमें पूजित होता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्री, शैव, वैष्णव, योगी आदि सभी यह दान कर सकते हैं। (अध्याय १२४)