भविष्य महा पुराण

भगवान् सूर्यकी प्रतिमाके अधिवासन और प्रतिष्ठाका विधान तथा फल

नारदजी बोले- साम्ब ! अब मैं अधिवासनविधि कहता हूँ। पवित्र भूमिको लीपकर पाँच रंगोसे चतुरस्र सुन्दर मण्डली रचना करे। पताका, ध्वज, तोरण, छत्र, पुष्पमाला आदिसे उसे अलंकृत

*देवास्त्वामभिषिजन्तु ब्रह्मविष्णुशिवादयः।

व्योमगङ्गम्पुर्णेन कलशेल सुरोत्तम।।

मात याभिषिक्षन्तु भक्तिमन्तो दिवस्पते।

मेघतोयाभिपूर्णेन द्वितीयकलशेन तु।।

सारस्वतेन पूर्णेन कलशेन सुरोत्तम।

विद्याधराभिषिठन्तु तृतीयकलशेन तु।।

शक्राद्या अभिषिचन्तु लोकपाला: सुरोतमा:।

सागरोदकपूर्णेन चतुर्थकलशेन तु।।

वारिणा परिपूर्णेनन पद्यरेणुसुन्धिना।

पञ्चमेनाभिषिञ्चन्तु नागास्त्वां कलशेन तु।।

हिमबद्धेमकूटाद्या अभिपिञ्चन्तु चाचलाः।

नैर्ऋतोदकपूर्णेन षष्ठेन कलशेन तु।।

सर्वतीर्धाम्युपूर्णेन पद्यरेणुसुगन्धिना।

सप्तमेनाभिपिञ्चन्तु ऋषयः सप्त खेचराः।।

वसवश्वाभिपिञ्चन्तु कलशेनाष्टमेन वै।

अष्टमङ्गलयुकेन देवदेव नमोस्तु ते।।

कर मण्डलमें कुशा बिछाये और सूर्यदेवकी मूर्ति स्थापित करे। भगवान् सूर्यका आवाहन कर उन्हें अर्घ्य दे, मधुपर्क तथा वस्त्र, यज्ञोपवीत आदिसे पूजन करे और अव्यङ्ग अर्पण करे। जिस प्रकार देवताओंको पवित्रक अर्पण किया जाता है, वैसे ही प्रतिवर्ष श्रावण मासमें नवीन अव्यङ्गकी रचना कर सूर्यनारायणको समर्पित करना चाहिये । इनका यह पवित्रक है। नवीन अव्यङ्गके समर्पणके समय ब्राह्मणोंको भोजन कराये। भगवान्की प्रतिमाको सुगन्धित द्रव्योंसे उपलिप्त कर पुष्पमाला चढ़ाये तथा धूप आदि दिखाये। 'नमः शम्भवायः' (यजु० १६ । ४१) इस मन्त्रसे भगवान्की प्रतिमाको शय्याके ऊपर शयन कराये। सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्तिके लिये इस प्रकार पाँच दिन, तीन दिन अथवा एक ही रात्रि प्रतिमाका अधिवासन करे*।

देवालयके ईशानकोणमें उत्तम स्थानके मध्य में कुशा बिछाकर वहाँ शुक्ल वस्त्रोंसे सुसज्जित शय्या रखे। शय्याका सिरहाना पूर्वमुख रखा जाय। उसी शय्यापर भगवान् सूर्यकी प्रतिमाको शयन कराये। उनके दाहिने भागमें निक्षुभा, वाम भागमें राज्ञो और चरणोंके समीप दण्डनायक तथा पिङ्गलको स्थापित करे। उस रात्रिमें सूर्यनारायणके समीप जागरण करे, वन्दी चारणसे स्तुति, नृत्य, गीत आदि उत्सव कराये। प्रभात होते ही ऋग्वेदके विधानसे प्रतिमाका उद्बोधन करे और स्वस्तिवाचनपूर्वक भगवान् को पूजा कर ब्राह्मण तथा भोजकोंको हविष्यान्न भोजन कराये तथा उन्हें दक्षिणा देकर प्रसन्न करे। अनन्तर मन्दिरके गर्भगृह में पिण्डिकाके ऊपर सात अधोसे युक्त सुवर्णका रथ स्थापित कर सूर्यनारायणको अर्घ्य देकर मङ्गल वाद्यों के साथ जलधारा गिराये। फिर उत्तम गुहूर्त और स्थिर लगमें प्रतिमाको स्थापना करे। प्रतिमाका मुख नीचे ऊपर या अगल बगल, तिरछा न हो, वरन् सीधा और सम रहे। भगवान् सूर्यको प्रतिमाके दक्षिणभागमें और वामभागों क्रमशः निक्षुभा और राज्ञीकी प्रतिमा स्थापित करे। अनन्तर मोदक, शष्कुली, पायस, कृशर आदिसे इन्द्रादि दस दिक्पालोंका आवाहन तथा पूजन कर उन्हें बलि समर्पित करे।

इसके अनन्तर स्तुतियों तथा विविध उपचारों से सूर्यदेवका पूजन कर ब्राह्मणों और भोजकोंको भोजन कराये और उन्हें दक्षिणा दे। इस प्रकार भक्तों द्वारा भक्तिपूर्वक प्रतिमाको स्थापना किये जानेपर, वह उनकी सभी प्रकार कल्याण, मङ्गल और सुख-समृद्धिको वृद्धि करती है और उसमें भगवान् सूर्यका नित्य सांनिध्य रहता है। सूर्यकी स्थापना करनेवाला व्यक्ति मोक्ष प्राप्त करता है और उसे सात जन्मोंतक आधि-व्याधियाँ भी नहीं सतातीं। तीन दिनोंतक प्रतिष्ठाके उत्सवों में सम्मिलित रहनेवाला - व्यक्ति सूर्यलोकको जाता है। सूर्यनारायणकी प्रतिमाकी स्थापना करनेसे दस अश्वमेध तथा सौ वाजपेय-यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। मन्दिरको ईट जबतक चूर्ण नहीं हो जाती, तबतक मन्दिर बनवानेवाला पुरुष स्वर्ग सुख भोगता है। सूर्य- मन्दिरके जीर्णोद्धार करनेका पुण्य इससे भी अधिक है। जो पुरुष मन्दिरका निर्माण कराकर प्राणियोंकी सृष्टि, स्थिति एवं प्रलयके हेतुभूत सुर श्रेष्ठ भगवान् सूर्यकी प्रतिमा स्थापित करता है, वह संसारके सब सुखोंको भोगकर सौ कल्पोतक सूर्यलोकमें निवास करता है। मन्दिरमें इतिहास पुराणका पाठ भी करना चाहिये

इसी प्रकार अन्य देवताओकी प्रतिमाओंका भी शय्याधिवास तथा दोधन को और शुभ मुहूर्तमें उन प्रतिमाओको यथास्थान पिण्डिकापर स्थापित कर पूजा करे। (अध्याय १७)

*पाञ्चरात्र-अगमों तथा विविध प्रतिष्ठा-ग्रन्थोंमें अधिवासनकी विस्तृत विधियाँ निर्दिष्ट हैं।