भगवान् सूर्यने कहा-हे खुगश्रेष्ठ ! व्रतीको चाहिये कि जप, होम आदि सभी क्रियाओंको विधिपूर्वक सम्पन्न कर देवाधिदेव भगवान् सूर्यका ध्यान करता हुआ भूमिपर शयन करे। स्वपमें यदि मनुष्य भगवान् सूर्य, इन्द्रध्वज तथा चन्द्रमाको देखे तो उसे सभी समृद्धियाँ सुलभ होती हैं। शृङ्गार, चंवर, दर्पण, स्वर्णालंकार, रुधिरस्ताव तथा केशपातको देखे तो ऐश्वर्यलाभ होता है। स्वप्नमें वृक्षाधिरोपण शीघ्र ऐश्वर्यदायक है। महिषो, सिंही तथा गौका अपने हाथसे दोहन और इनका बन्धन करनेपर राज्यका लाभ होता है। नाभिका स्पर्श करनेपर दुर्बुद्धि होती है। भेड़ एवं सिंहको तथा जलमें उत्पन्न जन्तुको भारकर स्वयं खानेसे, अपने अङ्ग, अस्थि, अग्नि-भक्षण, मदिरा पान, सुवर्ण, चाँदी और पापत्रके पात्र में खीर खानेपर उसे ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है। द्यूत या युद्धमें विजय देखना सुखप्रद होता है। अपने शरीरके प्रज्वलन तथा शिरोबन्धन देखनेसे ऐश्वर्य प्राप्त होता है। माला, शुक्ल वस्त्र, अश्व, पशु, पक्षीका लाभ और विष्ठाका अनुलेपन प्रशंसनीय माना गया है। अश्व या रथपर यात्राका स्वप देखना शीघ्र ही संततिके आगमनका सूचक है। अनेक सिर और भुजाएँ देखने पर घरमें लक्ष्मी आती है। वेदाध्ययन 'देखना श्रेष्ठ है। देव, द्विज, श्रेष्ठ वीर, गुरु, वृद्ध तपस्वी स्वप्न मनुष्यको जो कुछ कहें उसे सत्य ही मानना चाहिये। इनका दर्शन एवं
*देवद्विजश्रेष्ठवीरगुरुवृद्धतपस्विनः
।।यद्धदन्ति स्वप्ने सत्यमेवेति तद्विदुः।
आशीर्वाद श्रेष्ठ फलदायक है। पर्वत, अश्व, सिंह, बैल और हाथीपर विशिष्ट पराक्रमके साथ स्वप्नमें जो आरोहण करता है, उसे महान् ऐश्वर्य एवं सुखकी प्राप्ति होती है। ग्रह, तारा, सूर्यका जो स्वप्नमें परिवर्तन करता है और पर्वतका उन्मूलन करता है, उसे पृथ्वीपति होनेका संकेत मिलता है। शरीरसे आँतोंका निकालना, समुद्र एवं नदियोंका पान करना ऐश्वर्य-प्राप्तिका सूचक है। जो स्वप्न में समुद्रको एवं नदीको साहसके साथ पार करता है, उसे चिरजीवी पुत्र होता है। यदि स्वप्नमें कृमिका भक्षण करना देखता है तो उसे अर्थकी प्राप्ति होती है। सुन्दर अङ्गोंको देखनेसे लाभ होता है। मङ्गलकारी वस्तुओंसे योग होनेपर आरोग्य और धनकी प्राप्ति होती है, इसमें कोई संदेह नहीं।
भगवान् भास्कर अज्ञानान्धकारको दूरकर अपनी अचल भक्ति प्रदान करते हैं, उनके विधिपूर्वक पूजन करनेके पश्चात् सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम कर प्रदक्षिणा करनी चाहिये। जो व्यक्ति भगवान् भास्करकी पूजा करता है, वह उत्तम विमानमें बैठकर सूर्यलोकको जाता है। विधिपूर्वक पूजन करनेके पश्चात् उनके यथेष्ट मन्त्रोंका जप तथा हवन करना चाहिये। सप्तमीके दिन भगवान् सूर्यनारायणका विधिपूर्वक पूजन कर केवल आधी अञ्जलि जल पोकर व्रत करनेको उदक सप्तमी कहते हैं, वह सदैव सुख देनेवाली है। (अध्याय १९४-१९७)