सूतजी बोले- शौनक ! इस प्रकार दैत्यों ने बलिके पास जाकर अपनी पराजयका वृत्तान्त बतलाया। दैत्यराज बलिने देवताओको महान् विजय सुनकर रोषण नामक दैत्येन्द्रको बुलाकर कहा 'तुम तिमिरलिज (तैमूरलंग) के पुत्र होकर कहा आदिशंकराचा आदिआचाप रोकार सरुष नामसे प्रसिद्ध होगे। अतः तुम वहाँ जाकर दैत्योंकि श्रेष्ठ कार्यका सम्पादन करो। इसपर उसने कृद्ध हो देहली आकर वेदमार्गस्थ पुरुषोंका नाश करना शुरु कर दिया। उसने पाँच वर्षतक राज्य किया। उसीका पुत्र बाबर हुआ, बीस वर्षतक
*यहाँ आदिशंकाराचार्य आदि आचार्यगण अभिप्रेत न होकर कोई तत्कालीन शंकर आदि नामवाले महात्मा इष्ट प्रतीत होते हैं।
उसने राज्य किया। (कुछ वर्ष समरकन्दमें और कुछ दिन भारतमें।) उसका पुत्र होमायु (हुमायूँ) हुआ। मदान्ध होमायुने देवताओंका निरादर किया। तब देवताओनि नदीहाके उपवनमें स्थित कृष्णचैतन्यकी स्तुति की। स्तुति सुनकर हरि क्रुद्ध हुए और उन्होंने अपने तेजसे उसके राज्यमें विघ्र उत्पन्न किया। उनके सैन्योंद्वारा होमायुका पराजय हुआ। उस समय शेषशाक (शेरशाह)-ने रमणीय देहली नगरमें आकर पाँच वर्षतक अत्यन्त कुशलतापूर्वक राज्य किया। उन्हीं दिनोंकी बात है, शंकराचार्यक गोत्रमें उत्पन्न मुकुन्द नामक एक श्रेष्ठ ब्राह्मण अपने बीस शिष्योंके साथ प्रयागमें तप कर रहा था। 'म्लेच्छराज बाबरके द्वारा देवताओंकी प्रतिमाओं आदिको नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया है' यह जानकर ब्राह्मण मुकुन्दने दुःखी होकर- अग्निमें अपने प्राणोंकी आहुति दे दी। उसके बीस शिष्योंने भी गुरुके मार्गका ही अनुगमन किया। किसी समय ब्राह्मण मुकुन्दने गौके दूधके साथ गौके रोमका भी पान कर लिया था, इसी दोषके कारण वह दूसरे जन्ममें म्लेच्छयोनिमें उत्पन्न हुआ। जब हुमायूँ कश्मीर (अपने भाई मकरानके यहाँ काबुल-कश्मीरको सीमा) में निवास कर रहा था, तब उसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ और उसी समय यह आकाशवाणी हुई कि 'तुम्हारा पुत्र बड़ा प्रतापी और भाग्यशाली होगा। यह अकस्मात् (अक) प्राप्त वर (वरदान)-से उत्पन्न हुआ है, अतः इसका नाम 'अकबर' होगा और यह ग्लेच्छ या पिशाचोंके मार्गका अनुसरण नहीं करेगा। यह श्रीधर श्रीपति, शम्भु, वरेण्य मधुचतो. विमल, देवयान, सोम, पर्थन पकचि मायाला, मानकारी केशव माधव मधु देवापिसोमपा पुरावा माचीसविले शिष्य हैं, वही पूर्वजन्मका मुकुन्द ब्राह्मण भाग्यवश तुम्हारे घरमें इस रूपमें आया है।'
ऐसी आकाशवाणी सुनकर प्रसन्नचित्त हुमायूने भूखसे पीड़ित व्यक्तियोंको दान दिया और प्रेमपूर्वक पुत्रका पालन किया। पुत्रकी दस वर्षको अवस्था होनेपर वह देहलीमें आया और शेषशाकको पराजित कर वहाँका राजा हो गया। उसने एक वर्ष राज्य किया और बादमें उसका पुत्र अकबर राजा हुआ।
अकबर (मुकुन्द ब्राह्मण)-के राज्यप्राप्तिके बाद उसके पूर्वजन्मके सात प्रिय शिष्य (केशव, माधव, मधु, देवापि, सोमपा, सूर तथा मदन) इस जन्ममें भी पुनः उत्पन्न होकर अकबरके दरबारमें आये। मुकुन्द ब्राह्मणके शिष्य केशव अकबरके समयमें गानसेन (तानसेन) नामसे उत्पन्न हुए। पूर्वजन्मके माधव अकबरके समयमें वैजवाक् (बैजूबावरा) नामसे प्रसिद्ध हुए। पूर्वजन्मके मधु अकबरके समयमें सभी रागोंके ज्ञाता 'हरिदासगायक' नामसे विख्यात हुए। ये मध्वाचार्य- मतानुयायी प्रसिद्ध वैष्णव थे। पूर्वजन्मके देवापि अकबरके समयमें 'बीरबल' नामसे प्रसिद्ध हुए। वे पश्चिमी ब्राह्मण थे और उन्हें वाणीकी अधिष्ठात्री सरस्वतीदेवीका अभिमान था। पूर्वजन्मका गौतमवंशमें उत्पन्न सोमपा अकबरके समयमें 'मानसिंह नामसे उत्पन्न हुआ और वह आर्यभूपशिरोमणि अकबरका सेनापति बना। पूर्वजन्मका शूर दक्षिण देशमें ब्राह्मण कुलमें उत्पन्न हुआ, यह पण्डित था, इसका नाम हुआ 'बिल्चमंगल'। यह अकबरका मित्र बना। पूर्वजन्मका पूर्वीदेशका ब्राह्मण मदन अकबरके समयमें 'चन्दल' नामसे प्रसिद्ध हुआ। यह नर्तक और रह:क्रीडाविशारद था।
ये सात राजा अकबरके दरबार में स्थित हुए और पूर्वजन्मके श्रीधर आदि तेरह शिष्य दूसरे स्थानोंमें प्रतिष्ठित हुए। अकबरके समयमें अनपके पुत्र श्रीधर ही पुराणों में निपुण तुलसीशर्मा (तुलसीदास)
नामसे प्रसिद्ध हुए। वे नारीसे शिक्षा प्राप्तकर राघवानन्दके शिष्य श्रीरामानन्दकी परम्परामें काशीमें अत्यन्त विरक्त वैष्णव कवि हुए। पूर्वजन्मके श्रीपति अकबरके समयमें महान् अन्ध भक्त कवि 'सूरदास' के रूपमें उत्पन्न हुए, ये मध्याचार्यके मतमें स्थित रहनेवाले थे। इन्होंने कृष्णलीलाका वर्णन किया। पूर्वजन्मकें शम्भु अकबरके समय में चन्द्रभट्टके कुलमें हरिप्रिय नामसे उत्पन्न हुए , ये विष्णुभक्त थे और रामानन्दके मतमें स्थित हुए। पूर्वजन्मके वरेण्य अकबरके समयमें अग्रभुक् (अग्रदासर) नामके प्रसिद्ध संत थे, जो रामानन्दके मतमें स्थित हुए। ज्ञान-ध्यानपरायण, भाषा- छन्दकी रचना करनेवाले पूर्वजन्मके कवि मधुव्रती अकबर के समय में कीलक' नामसे विख्यात हुए। धीमान् कीलकने रामलीलाको रचना की और रामानन्दमतके अनुयायी हुए। पूर्वजन्मके विमल अकबरके समयमें 'दिवाकर' नामसे प्रसिद्ध हुए और भगवती सीताके पावन चरित्रका गान किया तथा वे रामानन्दके मतमें स्थित हुए। इसी प्रकार पूर्वजन्मके देववान् अकबरके समय में 'केशव नामसे अवतीर्ण हुए, ये विष्णुस्वामौके अनुयायी बने। कविप्रिया आदिकी रचनाकर इन्होंने प्रेतत्व प्राप्त किया और राम-ज्योत्स्ना नामक ग्रन्थको रचनाकर स्वर्ग प्राप्त किया। पूर्वजन्सके सोम 'व्यासदास' नामसे उत्पन्न हुए। ये निम्बादित्यके मतानुयायी हुए। इन्होंने रह क्रीडा अन्धकी रचनाकर स्वर्ग प्राप्त किया। पूर्वजन्मके वर्धन 'चरणदास' नामसे विख्यात हुए। इन्होंने ज्ञानमाला नामक ग्रन्थका निर्माण किया और ये रैदास-मार्गक अनुयायी बने। पूर्वजन्मके वर्तक 'रजभानु' नामसे उत्पन्न हुए, ये जैमिनि भाषाके रचयिता थे और रोपण-मतके अनुयायी थे। पूर्वजन्मके रुचि रोचन' नामसे उत्पन्न हुए। ये मध्वाचार्यके मतानुयायी थे। इन्होंने अनेक गानमयी लीला करके स्वर्ग प्राप्त किया। पूर्वजन्मके मान्धाता भूपति' नामके कायस्थ हुए। मध्वाचार्यके मतानुसार इन्होंने हिन्दी-भाषामें भागवतका सुन्दर अनुवाद किया। पूर्वजन्मके मानकारने नारीभावसे स्त्रीशरीरको प्राप्त किया और 'मीरा' के नामसे विख्यात राजाकी पुत्री हुई। मध्वाचार्यके मतको माननेवाली वह मीरा अत्यन्त प्रसिद्ध हुई। उनका प्रबन्ध भयंकर कलिकालके लिये मङ्गलकर होगा।
अकबरने पचास वर्षतक निष्कण्टक राज्य किया और अन्त में मरकर स्वर्ग चला गया। उसका पुत्र सलोमा-सलीम (जहाँगीर) था। उसने भी पिताके समान राज्य किया। उसका बेटा खुर्दक (खुसरो शाहजहाँ) था, उसने दस वर्षतक राज्य किया। उसके चार बेटे थे। उसका मध्यम बेटा नवरंग (औरंगजेब) था। उसने मिता और भाईको जीतकर राज्य किया। यह पूर्वजन्ममें अन्धक नामका प्रसिद्ध दैत्य था। इस कर्मभूमिमें अन्धकके अंशसे दैत्यराजकी आज्ञासे आया था। उसने चारों ओर अनेक मूर्तियोंको ध्वस्त किया। ऐसा देखकर देवताओंने आकर कृष्णचैतन्यसे कहा-'भगवन् ! दैत्यराजका अंशभूत (औरंगजेबर)' राजा उत्पन्न हुआ है, वह देवताओं और वेदोंका
१-ये बहुत बड़े सिद्ध महात्मा थे, इनकी कुण्डलिया प्रसिद्ध है। ये जयपुरके गलता गद्दीके संस्थापक थे। इनके सम्प्रदायके अधिकांश लोग दुग्धाहारपर जीवन-यापन करते थे। इससे इन्हें पयहारी कहा जाता था। भक्त नाभावास इनके हो शिष्य थे।
२-वास्तवमें औरंगजेब एवं महाप्रभुके समय में प्राय: ३०० वर्षाका अन्जर है। इसलिये यहाँ महाप्रभुसे किसी गौडीय सम्प्रदायके तत्कालीन प्रभावशाली संतका तात्पर्य ग्रहण करना चाहिये। औरंगजेवपर सर डॉ० अदुनाथ सरकारको पाँच बड़े जिल्दों की अत्यन्त
विनाश कर दैत्य-पक्षकी अभिवृद्धि कर रहा है। नदीहाके वनमें स्थित यज्ञांशने यह सुनकर उस दुराचारीके वंशक्षयका शाप दिया। उनचास वर्षातक उस दुष्टात्माने राज्य किया।
उस समय देवपक्षको वृद्धि करनेवाले सेवाजय (छत्रपति शिवाजी) नामके एक राजा हुए, जो महाराष्ट्र में उत्पन्न हुए थे तथा बुद्धविद्यामें विशारद थे। उन्होंने उस दुराचारीको मारकर उसके पुत्रको वह स्थान दे दिया। फिर वे दक्षिण देशमें चले गये। आलोमा नामके उसके पुत्रने पाँच वर्षतक राज्य किया और वह भी दिवंगत हो गया। तालनके कुलमें बलवान् म्लेच्छ 'फलरुष' हुआ। उसने मुकल (मुगल) कुलका नाश कर दस वर्षतक राज्य किया और अन्त में वह शत्रुओंसे मारा गया। उसका बेटा महामद हुआ, उसने बीस वर्षतक राज्य किया।
उसी समय नादर (फारस-निवासी नादिरशाह दुर्रानी) नामका एक भारी लुटेरा देशमें आया और आर्योको मारकर देवताओंको जीतकर वह खुरज (ईरान) देशमें चला गया। महामदका पुत्र था महामत्स्य। उसने अपने पिताकै स्थानको ग्रहण कर पाँच वर्षतक राज्य किया। तालनवंशमें उत्पन्न दुए महामत्स्य महाराष्टियोंद्वारा मारा गया। माधवने देहली नगरमें दस वर्षतक राज्य किया। उसने म्लेच्छ आलोमाके राज्यको प्राप्त किया। उस राष्ट्र में अपने देशमें उत्पन्ना अनेक राजा हुए। देश-देशमें, ग्राममें रहनेवाले बहुत से राजा हो गये। प्रायः कोई पक्रवर्ती सपा नहीं रहा। सर्वत्र छोटे-छोटे मण्डलीकों (तालुकेदारों) के अधिकारमें देश विभक्त हो गया। कुछ लोग तो गाँव-गाँवले हो मालिक रहे। इस प्रकार तीस वर्ष बीत गये। इसके बाद सभी देवगण कृष्णचैतन्यके पास आये। उन्होंने महीतलपर उनके दुःखको जानकर एक मुहूर्तके लिये ध्यानस्थ होकर देवताओंसे कहा–'पूर्वकालमें बुद्धिमान् राघवने राक्षस रावणको जीतकर सुधावृष्टि के द्वारा वानरोंको जीवित कर लिया था। विकट, वृजिल, जाल, बरलीन, सिंहल, जव (जावा), सुमात्र (सुमात्रा) नामके छोटे- छोटे वानरोंने भगवान् रामचन्द्रसे कहा कि हमलोगोंको मनोवाञ्छित वर दीजिये। दाशरथि रामने उनके मनोरथोंको जानकर रावणके द्वारा देवाङ्गनाओंसे उत्पन्न कन्याओंको वानरोंको प्रदान किया और प्रसन्नचित्त हो वानरोंसे कहा कि 'जालंधरद्वारा निर्मित आपलोगोंके नामसे जो द्वीप होंगे, उन द्वीपोंके आपल्लोग राजा होंगे और ये आपलोगोंको रानियाँ होंगी। नन्दिनी गौके रुगड (घड़) से जो म्लेच्छ उत्पन्न होंगे वे गुरुण्ड कहलायेंगे। उन्हें जीतकर आपलोग श्रेष्ठ राज्य प्रास करेंगे।'
यह सुनकर हरिको नमस्कारकर आनन्दपूर्वक वे सभी द्वीपोंमें चले गये। देवगणो! विकटके वंशमें उत्पत्र तथा उसके द्वारा प्रेरित वानरमुखी गुरुण्ड-लोग व्यापारका दृष्टिसे यहाँ आये और उनका हृदय ईश-पुत्र (ख्रिष्ट, ईशु या ईसामसीह)-का मतावलम्बी था। वे सत्यवती, कामजित, क्रोधरहित और सूर्यपरायण हैं। आपलोग वहाँ रहकर उनका कार्य करें। यह सुनकर देवता सूर्यको आदरपूर्वक अर्चना कर कलिकातामें आ गये। पशिम द्वीपमें विकट नामका राजा हुआ, उसकी पत्नी विकटावती (विक्टोरिया)-ने आए कौशलमार्गसे (पालियामेंटके परामर्शसे) शासन किया।
प्रामाणिक ऐतिहासिक जोचनो प्रसिद्ध है। कैम्ब्रिज इतिहासके चौथे भागके उत्तरार्धमें औरंगजेबका वृत्तान्त इन्होंके द्वारा लिखित है। यहाँ चैतन्य शब्दसे भगवान् जानाथ भी अभीष्ट हो सकते हैं।
* यहाँ भी तत्कालीन गौडीय सम्प्रदायका कोई आचार्य समझा जाना चाहिये, क्योंकि महाप्रभु बैतन्य तो इससे प्रायः ४५० वर्ष पूर्व हुए थे।
उसके वंशके सात और गुरुण्ड राजा हुए, जो चौसठ वर्षांतक राज्यकर नष्ट हो गये। गुरुण्डके आठवें राजातक न्यायपूर्वक शासन करनेपर कलिपक्षीय बलि दैत्यने मुर नामक महान् असुरको देवदेशमें भेजा। वह मुर वार्डिल राजाको वशमें करके आर्य-धर्मके विनाशके लिये तत्पर हो गया। मूर्तिमें स्थित देवगणोंने, महाप्रभुचैतन्य यज्ञाशके पास जाकर नमस्कार कर मुर नामक दैत्यके आनेकी बात कही। यह जानकर कृष्णाशने बौद्धपंथी गुरुण्डको शाप दिया कि 'जो मुरके मतमें हैं, वे नष्ट हो जायँगे।' इस तरहकी बात कहनेपर कालसे प्रेरित समस्त दुष्ट गुरुण्ड अपनी सेनाओं के साथ एक वर्षके अंदर ही नष्ट हो गये। वह राजा वार्डिल भी विनाशको प्राप्त हो गया। तत्पश्चात् मेकल (लार्ड मेकाले) नामक नौवाँ वीर्यवान् (शिक्षाशास्त्री) गुरुण्ड आया। इसने न्यायपूर्वक बारह वर्षतक राज्य किया। दसवाँ लार्डल (लाई वेवल) नामक विख्यात गुरुण्डने बत्तीस वर्षतक धर्मपूर्वक राज्य किया। लार्डलके स्वर्ग जानेपर मकरन्दकुलमें उत्पन्न आर्योचे शासन किया। तदनन्तर हिमतुंग-निवासी मौनोंने राज्य प्राप्त किया। वे बभ्रुवर्ण, सूक्ष्म तथा बर्तुल नासावाले एवं दीर्घ मस्तकवाले बौद्धमार्गगामी लाखोंकी संख्या में देहली आये । उनका राजा हुआ आर्जिक। उसके पुत्र देवकर्णने गङ्गोत्रगिरिके शिखरपर राज्यकी वृद्धिके लिये बारह वर्षतक घोर तपस्या की। उस बुद्धिमान्को तपस्यासे भगवती गङ्गाने उसे दर्शन दिया और कुबेरने उसे आर्योका मण्डलीक-पद प्रदान किया। तदनन्तर मण्डलीक देवकर्ण प्रजापालक राजा हुआ। साठ वर्षतक उसने महीतलपर राज्य किया। उसके वेशमें देवपूजक आठ राजा हुए। दो सौ वर्धतक राज्य करके स्वर्गलोक चले गये। ग्यारहवाँ भान राजा पन्नगारि हुआ। वह चालीस वर्मतक राज्य करनेके बाद पन्नगोंद्वारा मृत्युको प्राप्त हो गया। इस प्रकारसे महीतलपर मौन-जातियोंका राज्य हुआ। इसके अनन्तर नागवंशीय, आन्ध्रवंशीय, कौसलदेशीय, नैषधदेशीय, सौराष्ट्रदेशीय तथा गुर्जरदेशीय राजाओंने अनेक वर्षांतक राज्य किया। गुर्जरदेशमें कलिने आभीरीके गर्भसे 'राहु' नामसे सिंहिकाके पुत्ररूपमें जन्म ग्रहण किया। जैसे चन्द्रको कष्ट देनेवाला नभोमण्डलमें सिंहिकापुत्र राहु स्थित है, वैसे ही कलिका अंशभूत देवताओंको कष्ट देनेवाला आभीरीका राहु नामका पुत्र उत्पन्न हुआ। इसके उत्पन्न होते ही पृथ्वीपर भयंकर भूकम्प होने लगा। सभी विपरीत ग्रह भयंकर दुःख उत्पन्न करने लगे। उसके भयसे देवगण अपनी-अपनी मूर्तियों-प्रतिमाओंमेंसे देवांशका परित्याग कर सुमेरु पर्वतके शिखरपर महेन्द्रकी शरणमें चले गये। उन लोगोंके कल्याणके लिये भगवान् शक्रने जगदम्बिकाकी स्तुति की। तब कन्यामूर्ति उस कल्याणकारी देवीने देवताओंसे कहा-'देवगणो ! मेरे दर्शनसे आपलोग भूख-प्याससे रहित हो जायेंगे।' यह सुनकर देवगण प्रसन्न हुए।
आधौरी पुत्र राहु सौ वर्ष राज्य करके अपना प्राण त्यागकर कलिमें लीन हो गया। उसके वंशमें डेढ़ सौ राजा हुए, जिन्होंने दस हज़ार वर्षतक राज्य किया। उन्होंने नष्ट हुए महामदके मतका पुनः प्रचार किया। वे सभी म्लेच्छ हुए। उस समय कलियुगमें न वेदाध्ययन था, न वर्ण- व्यवस्था थी और न देवता ही थे। कोई भी मर्यादा नहीं थी। जो शेष ब्राह्मण थे, वे अर्बुद शिखरपर रहने लगे और बारह वर्षातक प्रयत्नपूर्वक देवताओंकी आराधना करने लगे। फलतः अर्बुद शिखरसे खड्ग और चर्मधारी एक क्षत्रिय प्रादुर्भूत हुआ। उसका नाम हुआ अर्वबली। उसने भयंकर म्लेच्छोंको जीतकर पाँच योजन भूमिपर
अर्वपुरीका निर्माण किया। धीरे-धीरे वहाँ आर्य भाकर बसने लगे और फिर आर्यकुलकी वृद्धि हो गयी। अर्वबलीने पचास वर्षांतक राज्य किया। उसके वंशमें डेढ़ सौ राजा हुए। दस हजार वर्षके बाद म्लेच्छोंकि मित्र वर्णसंकरोने म्लेच्छ-कन्याओंके साथ विवाह किया। आर्यमार्गानुगामी नाममात्रके रह गये। उस समय मलयदेशस्थ एक लाख म्लेच्छोंका अर्बुदीय आकि साथ भयंकर युद्ध हुआ। उसमें महाबलशाली म्लेच्छोंने विजय प्रास की। सम्पूर्ण भूमि म्लेच्छमयी हो गयी और सर्वत्र अलक्ष्मीका निवास हो गया। (अध्याय २२-२३)