भविष्य महा पुराण

अरण्यद्वादशी-व्रतका विधान और फल

महाराज युधिष्ठिरने कहा-श्रीकृष्णचन्द्र! आप अरण्यवादशी-व्रतका विधान बतलायें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-कौन्तेय! प्राचीन कालमें जिस व्रतको रामचन्द्रजीकी आज्ञासे वनमें सीताजीने किया था और अनेक प्रकारके भक्ष्य-भोज्य आदिसे मुनिपनियोंको संतुष्ट किया था, उस अरण्यद्वादशी-व्रतका विधान मैं बतलाता हूँ, आप प्रीतिपूर्वक सुनें । इस व्रतमें मार्गशीर्ष मासकी शुक्ला एकादशीको प्रातः स्नानकर भगवान् जनार्दनकी भक्तिपूर्वक गन्ध, पुष्पादि उपचारोंसे पूजा करनी चाहिये और उपवास रखना चाहिये। रात्रि में जागरण करना चाहिये। दूसरे दिन स्नान आदि करके वेदज्ञ ब्राह्मणों को उपवन में ले जाकर प्रायः फल आदि भोजन कराना चाहिये। अनन्तर चगव्यका प्राशन कर स्वयं भी भोजन करना चाहिये।

इस विधिसे एक वर्षतक व्रत करे। श्रावण, कार्तिक, माध्य तथा चैत्र मासमें वृक्षादिसे सुशोभित किसी सुन्दर वनमें अरण्यवासियों, मुनियों तथा ब्राह्मणोंको पूर्व या उत्तरमुख आसनपर बैठाकर मण्डक, घृतपूर, खण्डवेएक, शाक, व्यञ्जन, अपूप, मोदक तथा सोहालक आदि अनेक प्रकारके पक्वाल, फल तथा विभिन्न भोज्य पदार्थोसे संतुष्ट करे और दक्षिणा प्रदान करे। कर्पूर, इलायची, कस्तूरी आदिसे सुगन्धित पानक पिलाना चाहिये। बनमें रहनेवाले मुनिगण एवं उनकी पत्नियों, एक दण्डी अथवा त्रिदण्डी और गृहस्थ आदि अन्य ब्राह्मणों को भी भोजन कराना चाहिये। वासुदेव, जनार्दन, दामोदर, मधुसूदन, पद्मनाभ, विष्णु, गोवर्धन, त्रिविक्रम, श्रीधर, हषीकेश, पुण्डरीकाक्ष तथा वराह-इन बारह नामोंसे नमस्कारपूर्वक एक-एक ब्राह्मणको भोजन कराकर वस्त्र और दक्षिणा देकर 'विष्णुर्मे प्रीयताम्' यह वाक्य कहकर अपने मित्र, सम्बन्धी और बान्धवों के साथ स्वयं भी भोजन करे। इस प्रकारसे जो अरण्यद्वादशी व्रत करता है, वह अपने परिवारके साम्य दिव्य विमानमें बैठकर भगवान्के धाम श्वेतद्वीपमें निवास करता है। वह वहाँ प्रलयपर्यन्त निवासकर मुक्ति प्रास करता है। यदि कोई स्त्री भी इस व्रतका आचरण करती है तो यह भी संसारके सभी सुखोंका उपभोग कर भगवानकी कृपासे पतिलोकको प्राप्त करती है। (अध्याय ६६)