महाराज युधिष्ठिरने पूछा-प्रभो! उभयमुखी अर्थात् प्रसवके समयमें गौका दान किस प्रकार करना चाहिये और उसके दानका क्या फल है। इसे आप बतायें।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा-महाराज! उभयमुखी गौ दानका संयोग बड़े भाग्यसे प्राप्त होता है। जबतक बछड़ेके पैर प्रसवकै समय भीतर हों और केवल सिर बाहर दिखलायी दे, उस समय वह गौ मानो साक्षात् सप्तद्वीपवतो पृथ्वी है। ऐसी उभयमुखी गौके दानके फलका वर्णन शक्य नहीं। यज्ञ और दान करनेसे जो फल प्राप्त नहीं होता, वह फल केवल उभयमुखी धेनुके दानसे ही प्राप्त हो जाता है और दाताका उद्धार हो जाता है । सींगोंको स्वर्णसे, बुरोंको चाँदीसे तथा मूंछको मोतीको मालाओंसे अलंकृतकर जो उभयमुखी धेनुका दान करता है, वह गौ और बछड़ेके शरीरमें जितने रोम हैं, उतने ही हजार वर्षतक स्वर्ग में पूजित होता है तथा अपने पितरोंका उद्धार कर देता है। जो व्यक्ति सुवर्णसहित उभयमुखी धेनुका दान करता है, उसके लिये गोलोक और ब्रह्मलोक सुलभ हो जाता है। दुर्बल, अङ्गहीन गौ और दक्षिणासे रहित दान नहीं करना चाहिये। (अध्याय १५८)
३-इत्तने बहुमूल्य रनों का दान करने के उल्लेखसे लोध, धूर्तता या असम्भावनाको कल्पनाकर चकित नहीं होना चाहिये, क्योंकि पूर्ण धर्माचरण, देवाराधन और ईमानदारी तथ्या परस्पर उपकारकी भावनामे भारत ऐसा ही समृद्ध था कि कोई वस्तु दाम लेकर नहीं बेची जाती थी। इस बातको कल्याण' के हिन्दू संस्कृति-अङ्क' से लेकर १९६८ के कई साधारन अट्टोंमें बार-बार प्रमाणों द्वारा सिद्ध किया गया है।
२-अन्य पुराणों में भी इसका महत्त्व आया है और इसकी परिक्रमासे सतद्वीपवती पृथ्वीकी परिक्रमाका पुण्य बतलाया गया है।