श्रीसूतजी बोले-ब्राह्मणो ! पूर्व काल्हमा महाकेजस्वी ब्रह्माजीने पुराण-श्रवणको जिस विधिको मुझसे कहा था, उसे में आपको सुना रहार, आप सुने। इतिहास-पुरायो किपूर्वक सुनने से ब्रह्महत्या आदि सभी पापों से मुक्ति हो जाती है, जो प्रातः- सायं तथा रात्रिमें पवित्र होकर पुराणोंका श्रवण करता है, उसपर ब्रह्मा, विष्णु और शंकर संतुष्ट हो जाते हैं। प्रात:काल इसके पढ़ने और सुननेवालेसे
या कुचिनियो कृत्वा स्वयं रक्षति सर्वतः ।
नमामि जनों देवों पर प्रकृतिरूपिणीम् ।।
कृच्छेण महता देव्या धापितोऽहं यथादरे ।
त्वत्प्रसादाजगद्दृष्टं मालर्नित्व नमोऽस्तु ते॥
पृथिव्यां यानि तीर्थानि सागपादीनि सर्गशः ।
वन्ति यत्र तो नौमि मातरं भूतिहेतवे ।
गुरुदेवप्रसादेन विद्यायशस्करी ।
शिवरूप संसारार्णवसेतवे।
वेदवेदानशास्त्राणां ताच यत्र प्रतिष्ठितम् ।
आधारः सर्वभूतानामनस्मन् नमोऽस्तु ते॥
ब्राह्मणी जगतां तीर्थ पावनं परमं यतः ।
भूदेव हर में पापं विष्णुरूपिन् नमोऽस्तु ते ॥
(मध्यमपर्व ।।६।६-१४)
इतिहासपुराणानि श्रुत्वा भक्लाद्विजोत्तमाः ।
नुध्यो सर्वपापेभ्यो ब्राहल्याशतं २ यत् ।
साद प्रातस्तथा रात्री शुभिभूध वृष्णोनियः ।
तस्य विष्णुस्तथा ब्रह्मा पहें शङ्करस्तथा।।
(मध्यम्पर्व है। 3-3)
ब्रह्माजी प्रसन्न होते हैं तथा सार्यकालमें भगवान् विष्णु और रातमें भगवान् शंकर संतुष्ट होते है। पुराण-श्रवण करनेवालेको शुक्ल वस्त्र धारण कर कृष्ण-मृगचर्म तथा कुशके आसनपर बैठना चाहिये। आसन न अधिक ऊँचा हो और न अधिक नीचा। पहले देवता और गुरुकी तीन प्रदक्षिणा करे, तदनन्तर दिक्पालोंको नमस्कार करे। फिर ओंकारमें अधिष्ठित देवताओंको नमस्कार करे एवं शाश्वत धर्ममें अधिष्ठित धर्मशास्त्र-ग्रन्थोंको भी नमस्कार करे।
श्रोताका मुख दक्षिण दिशाकी ओर और वाचकका मुख उत्तरकी ओर हो। पुराण और महाभारत कथाकी यही विधि कही गयी है। हरिवंश, रामायण और धर्मशास्त्रके श्रवणकी इससे विपरीत विधि कही गयी है। अत: निर्दिष्ट विधिसे सुनना या पढ़ना चाहिये। देवालय या तीर्थोमें इतिहास- पुराणके वाचनके समय सर्वप्रथम उस स्थान और उस तीर्थक माहात्यका वर्णन करना चाहिये। अनन्तर पुराणादिका वाचन करना चाहिये। माहात्म्यके श्रवणसे गोदानका फलं मिलता है। गुरुकी आज्ञासे माता- पिताका अभिवादन करना चाहिये। ये वेदके समान, सर्वधर्ममय तथा सर्वज्ञानमय हैं। अतः द्विज श्रेष्ठ ! माता-पिताकी सेवासे ब्रह्मकी प्राप्ति होती है।
पुराणादि पुस्तकोंका हरण करनेवाला नरकको प्राप्त होता है। वेदादि ग्रन्थों तथा तान्त्रिक मन्त्रोंको स्वयं लिखकर उनका वाचन न करे। वाचकोंको चाहिये कि वेदमन्त्रोंका विपरीत अर्थ न बतलायें और न वेदमन्त्रोंका अशुद्ध पाठ करें। क्योंकि ये दोनों अत्यन्त पवित्र है, ऐसा करनेपर उन्हें पावसानी ऋचाओंका सौ बार जप करना चाहिये। पुराणादिके प्रारम्म, मध्य और अवसानमें तथा मन्त्रमें प्रणवका उच्चारण करना चाहिये।
देवनिर्मित पुस्तकको विदेश स्वरूप समझकर गन्ध-पुष्पादिसे उसकी पूजा करनी चाहिये। ग्रन्थके बाँधनेवाले (धागा) सूत्रको नागराज वासुकिका स्वरूप समझना चाहिये। इनका सम्मान न करनेपर दोष होता है। अतः उसका कभी भी परित्याग नहीं करना चाहिये। ग्रन्थके पत्रोंको भगवान् ब्रह्मा, अक्षरोंको जनार्दन, अक्षरों में लगी मात्राओंको अव्यय प्रकृति, लिपिको महेश तथा लिपिकी मात्राओंको सरस्वती समझना चाहिये।
पुराण-वाचकको चाहिये कि पुराण-संहिताओंमें परिगणित सभी व्यास, जैमिनि आदि महर्षियों तथा शंकर, विष्णु आदि देवताओंको आदि, मध्य और अवसानमें नमस्कार करे। इनका स्मरण कर धर्मशास्त्रार्थवेत्ता विप्रको पुराणादिका एकाग्रचित्त हो पाठ करना चाहिये। वाचकको स्पष्टाक्षरों में उच्चारण करते हुए सुन्दर ध्वनिमें सभी प्रकरणोंके तात्त्विक अधौंको स्पष्ट बतलाना चाहिये। पुराणादि- धर्मसंहिताके श्रवणसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र विशेषतः अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त करते हैं एवं सभी कामनाओंको भी प्राप्त कर लेते हैं तथा सभी पापोंसे मुक्त होकर बहुत-से पुण्योंको प्राप्ति कर लेते हैं।
जो वाचक सदा सम्पूर्ण ग्रन्थके अर्थ एवं तात्पर्यको सम्यक् रूपसे जानता है, वही उपदेश करनेके योग्य है और वही विप्र व्यास कहा जाता है। ऐसे वाचक बिप्र जिस नगर या ग्राममें रहते हैं, वह पुण्यक्षेत्र कहा जाता है। वहाँके निवासी धन्य तथा सफल-आत्मा हैं, कृतार्थ हैं एवं उनके समस्त मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं।
जैसे सूर्यरहित दिन, चन्द्रशून्य रात्रि, बालकोंसे शून्य गृह तथा सूर्यके बिना ग्रहोंकी शोभा नहीं होती, वैसे ही व्याससे रहित सभाकी भी शोभा नहीं होती।
श्रीसूतजी बोले-द्विजोत्तम ! गुरुको चाहिये
कि अध्यात्मविषयक पुराणका अध्यापन ज्ञानी, धार्मिक, पवित्र, भक्त, शान्त, वैष्णव, क्रोधरहित तथा जितेन्द्रिय शिष्यको कराये। अन्यायसे धनार्जन करनेवाले, निर्भय, दाम्भिक, द्वेषी, निरर्थक और मन्थर गतिवाले एवं सेवारहित, यज्ञ न करनेवाले, पुरुषत्वहीन, कठोर, क्रुद्ध, कृपण, व्यसनी तथा निन्दक शिष्यको दूरसे ही परित्याग कर देना चाहिये। पुत्र-पौत्र आदिके अतिरिक्त नम्र व्यक्तिको भी विद्या देनी चाहिये। विद्याको अपने साथ लेकर मर जाना अच्छा है, किंतु अनधिकारी व्यक्तिको विद्या नहीं देनी चाहिये। विद्या कहती है कि मुझे भक्तिहीन, दुर्जन तथा दुष्टात्मा व्यक्तिको प्रदान मत करो, मुझे अप्रमादी, पवित्र, ब्रह्मचारी, सार्थक तथा विधिज्ञ सज्जनको ही दो। यदि निषिद्ध व्यक्तिको श्रेष्ठ विद्याधन दिया जाता है तो दाता और ग्रहणकर्ता- इन दोनोंमेंसे एक स्वल्प समयमें ही यमपुरी चला जाता है। पढ़नेवालेको चाहिये कि वह आध्यात्मिक, वैदिक, अलौकिक विद्या पढ़ानेवालेको प्रथम सादर प्रणाम कर अध्ययन करे। कर्मकाण्डका अध्ययन बिना ज्योतिषज्ञानके नहीं करना चाहिये। जो विषय शास्त्रोंमें नहीं कहे, गये हैं और जो म्लेच्छोंद्वारा कथित हैं, उनका कभी भी अभ्यास नहीं करना चाहिये। जो स्वयं धर्माचरण कर धर्मका उपदेश करता है, वही ज्ञान देनेवाला पिता एवं गुरु-स्वरूप है तथा ऐसे ज्ञानदाताका ही धर्म प्रवर्तित होता है। (अध्याय ७-८)