महाराज युधिष्ठिरने कहा-जगत्पते ! अब आप कपिलादानका माहात्म्य बतलानेको कृपा करें, जो समस्त पापों का नाश करनेवाला एवं दानों में परम पुण्यपद है।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महामते ! इस सम्बन्धमें प्राचीन कालमें विनताश्चने भगवान् वाराह एवं धरणीदेवीके जिस संवादको मुझे बताया था उसे आप सुने धरणोदेवीके पूउनेपर भगवान् वाराहने कहा कि परे। कपिला गौके दान करलेसे सम्पूर्ण पापांका नाश हो जाता है तथा यह परम पवित्र पूर्वकाला बाजीने सम्पूर्ण तेजोका सार एकाकर पाप अमिहोत्रको सम्परता के लिये पवित्र करनेवाली, मङ्गलोंका मङ्गल तथा परम पूज्यमयी है। तप इसीका रूप है, व्रतोंमें यह उत्तम व्रत, दानोंमें उत्तम दान तथा निधियोंमें यह अक्षय निधि है। पृथ्वीमें गुप्त रूपसे या प्रकट रूपसे जितने पवित्र तीर्थ हैं एवं सम्पूर्ण लोकोंमें द्विजातियोंद्वारा सायंकाल और प्रात:काल अग्निहोत्र आदि हवनकी जो भी क्रियाएँ हैं, वे सभी कपिला गायके घृत, क्षीर तथा दहीसे होती हैं। भामिनि ! कपिलाके सिर और ग्रीवामें सम्पूर्ण तीर्थ निवास करते हैं। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर उसके गले एवं मस्तकके गिरे हुए जलको श्रद्धापूर्वक सिर झुकाकर प्रणाम करता है, वह पवित्र हो जाता है और उसी क्षण उसके पाप भस्म हो जाते हैं। प्रात:काल उठकर जिसने कपिला गौकी प्रदक्षिणा की, उसने मानो सम्पूर्ण पृथ्वीकी प्रदक्षिणा करली। वसुन्धरे। कपिला गौकी एक प्रदक्षिणा करनेपर भी दस जन्मके किये हुए पाप नष्ट हो जाते हैं। पवित्र व्रतके आचरण करनेवाले पुरुषको कपिला गौके मूत्रसे स्रान करना चाहिये। ऐसा करनेवाला मानो गङ्गा आदि सभी तीर्थोंमें स्नान कर चुका। भक्तिपूर्वक एक बार कपिलाके गोमूत्रसे स्रान करनेपर मनुष्यके जीवनभरके किये हुए पाप नष्ट हो जाते हैं। एक हजार गौके दानका फल एक कपिला गौके दानके समान है। गौओंकी यन्त्रपूर्वक रक्षा करनी चाहिये। गौके दूध-दही, घृत, गोमूत्र, गोमय आदिको अपवित्र नहीं करना चाहिये। गौओंके शरीरको खुजलाना और उनकी सेवा करना परम श्रेष्ठ धर्म माना गया है। गौके भय एवं रोगको स्थितिमें उसकी भलीभाँति सेवा करनी चाहिये। जो गौओंके चरनेके लिये हरी-भरी गोचरभूमिका दान करता है, वह दिव्य स्वर्गवासका फल प्राप्त करता है। साक्षात् ब्रह्माजीने कपिला गौके दस भेद बतलाये हैं। इस कपिला गौका जो श्रोत्रिय ब्राह्मणको दान करता है, वह अप्सराओंसे अलंकृत दिव्य विमानपर प्रतिष्ठित होकर स्वर्ग जाता है। सोनेके समान रंगवाली कपिला पहली श्रेणीकी है और गौर पिङ्गलवर्णवाली दूसरी श्रेणोकी। तीसरी लाल-पीले नेत्रवाली, चौथी अग्निके समान नेत्रवाली, पाँचवीं जुहूके समान वर्णवाली, छतो घोके समान पिङ्गलवर्णवाली, सातवों उजली- पीली, आठवीं दुग्धवर्णके समान पीली, नवों पाटलवर्णवाली तथा दसवों पौले पूँछवाली*। ये सभी कपिलाएँ संसार-सागरसे उद्धार कर देती हैं, इसमें संशय नहीं। जो शूर होकर कपिलाका दान लेता है और उसका दूध पीता है, वह पतित होकर चण्डाल हो जाता है और अन्तमें नरकमें जाता है। इसलिये किसी ब्राह्मणेतरको कपिलाका दान नहीं लेना चाहिये। श्रोत्रिय, धनहीन, सदाचारी तथा अग्निहोत्री ब्राह्मणको एक कपिला गौका दान करनेसे दाता सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है।'
गृहस्थ पुरुषको चाहिये कि दान देने के लिये जल्दी ही प्रसव करनेवाली धेनुका पालन करे। जिस समय वह कपिला धेनु आधा प्रसव करनेकी स्थितिमें हो जाय, उसी समय उसे ब्राह्मणको दान कर देना चाहिये। जब उत्पन्न होनेवाले बछड़ेका मुख योनिके बाहर दीखने लगे और शेष अङ्ग अभी भीतर ही रहें अर्थात् अभी पूरे गर्भका उसने मोचन (बाहर) नहीं किया, तबतक वह धेनु सम्पूर्ण पृथ्वीके समान मानी जाती है। वसुन्धरे! ऐसी गायका दान करनेवाले पुरुष ब्रह्मवादियों से सुपूजित होकर ब्रहालोको उत्तने करोड़ वर्षातक निवास करते हैं, जितनी कि धेनु और बछड़े के रोगों को संख्याएँ होती हैं। सोनेसे सीर" था चाँदीसे खुरको सम्पन्न करके कपिला गौका दान करते समय उस धेनुका पुच्छ ब्राहाणके हाथपर रख दे। हाथपर जल लेकर शुद्ध वाणीमें ब्राह्मणसे संकल्प पढ़ताये। जो पुरुष इस प्रकार (उभयमुखी गौका) दान करता है, उसने मानो समुद्रसे,घिरी तथा पर्वतों, वनों एवं रत्नोंसे परिपूर्ण समूची पृथ्वीका दान कर दिया-इसमें कोई संशय नहीं। ऐसा मनुष्य इस दानसे निश्चय ही पृथ्वीदानके तुल्य फलका भागी होता है। वह अपने पितरीके साथ प्रसन्नतापूर्वक भगवान् विष्णके परम धाममें पहुँच जाता है। ब्राहाणका धन छीननेवाला गोधाती अथवा गर्भपात करानेवाला, दूसराको लगनेवाला, निन्दक, नास्तिक बाहाणोंक
*कपिला के भेदों एवं उनकी अपार महिमाका वर्णन महाभारतके वैष्णधर्मपत्रके वैष्णवधर्मपर्वमें हुआ है, जो आश्वमेधिकपर्वता अन्तिम भाग है। पाणिनि-व्याकरण के गणपाठके अनुसार कपि अर्थात् बन्दरके समान वर्णमाली गायको कपिला कहते हैं।
निन्दक और सत्कर्ममें दोषदृष्टि रखनेवाला महान पापी समझा जाता है। किंतु ऐसा घोर पापी भी बहुतसे सुवर्णोसे युक्त उभयमुखी कपिलाके दानसे समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है। दाताको चाहिये कि उस दिन खीरका भोजन करे अथवा दूधके ही सहारे रहे।
जो इस प्रकार उभयमुखी कपिला गौका दान करता है, वह सम्पूर्ण पृथ्वीके दानका फल प्राप्त कर लेता है। जो व्यक्ति प्रातःकाल उठकर समाहितचित्तसे तीन बार भक्तिपूर्वक इस कल्प- 'गोदान-विधान' को पढ़ता है, उसके वर्षभरके किये हुए पाप उसी क्षण इस प्रकार नष्ट हो जाते है, जैसे वायुके झोंकेसे धूलके समूह । जो पुरुष श्राद्धके अवसरपर इस परम पावन प्रसङ्गका पाठ करता है, उस बुद्धिमान् पुरुषके अन्तरमें दिव्य संस्कार भर जाते हैं और पितर उसकी वस्तुओंको बड़े प्रेमसे ग्रहण करते हैं। जो अमावास्याको ब्राह्मणोंके सम्मुख इसका पाठ करता है, उसके पितर सौ वर्षके लिये तृप्त हो जाते हैं। जो पुरुष मन लगाकर निरन्तर इसका श्रवण करता है, उसके सौ वर्षोंके पाप नष्ट हो जाते हैं। (अध्याय १६१)