महाराज युधिहिरने कहा-भगवन् ! मैं बहुत बड़ा पातको हूँ। भीष्म, द्रोण आदि महात्माओंका मैंने वध किया। आप कृपाकर कोई ऐसा उपाय बतायें, जिससे मैं इस वधरूपी पापसमूहसे छुटकारा पा सकूँ।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! प्राचीन कालमें विदर्भ देशमें एक बड़ा प्रतापी कुशध्वज नामका राजा रहता था। किसी दिन वह मृगयाके लिये वनमें गया। वहाँ उसने मृगके धोखेमें एक तपस्वी ब्राह्मणको बाणसे मार दिया। मरनेके बाद उस पापसे उसे भयंकर रौरव नरककी प्राप्ति हुई। फिर वह बहुत दिनोंतक नरककी यातनाको भोगकर भयंकर सर्प-योनिमें गया। सर्प-योनिमें भी उसने पाप किया। इस कारण उसे सिंह-योनि प्राप्त हुई। इस प्रकार उसने कई निन्ध योनियों में जन्म लिया और उस उस योनिमें पाप-कर्म करता रहा। इस कर्मविपाकसे उसे कष्ट भोगना पड़ता था। चूंकि उसने पूर्वजन्ममें तारकद्वादशीका व्रत किया था, अतः उस व्रतके प्रभावसे इन पाप-योनियोंसे वह जल्दी जल्दी मुक्त होता गया। अन्तमें पुनः वह विदर्भ देशका धर्मात्मा राजा हुआ। वह भक्तिपूर्वक तारकद्वादशीका व्रत किया करता था। उसके प्रभावसे बहुत समयतक निष्कण्टक राज्यकर, मरनेपर उसने विष्णुलोकको प्राप्त किया।
राजा युधिष्ठिरने पूछा-श्रीकृष्णचन्द्र ! इस व्रतको किस प्रकार करना चाहिये?
भगवान् श्रीकृष्णाने कहा— राजन्! मार्गशीर्ष नासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीको तारकद्वादशी व्रत करना चाहिये। प्रात:काल नदी आदिमें मानकर तर्पण, पूजन आदि सम्पन्न कर सूर्यास्ततक हवन करता रहे। सूर्यास्त होनेपर पवित्र भूमिके ऊपर गोमयसे ताराओंसहित एक सूर्य-मण्डलका निर्माण करे। उस आकाशमें चन्दनसे ध्रुवको भी अङ्कित करे। अनन्तर ताम्रके अर्घ्यपात्रमें पुष्प, फल, अक्षत, गन्ध, सुवर्ण तथा जल रखकर मस्तकतक उस अर्घ्यपात्रको उठाकर दोनों जानुओंको भूमिपर टेककर पूर्वाभिमुख होकर 'सहस्रशीर्षा०' इस मन्त्रसे उस मण्डलको अर्घ्य प्रदान करे। अनन्तर ब्राह्मण- भोजन कराना चाहिये। मार्गशीर्ष आदि बारह महीनों में क्रमश: खण्ड-खाद्य, सोहालक, तिल- तण्डुल, गुड़के अपूप, मोदक, खण्डवेष्टक, सत्तू, गुडयुक्त पूरी, मधुशीर्ष, पायस, घृतपर्ण (करंज) और कसारका भोजन ब्राह्मणको कराये। तदनन्तर - क्षमा-प्रार्थना कर मौन धारणपूर्वक स्वयं भी भोजन - करे। उद्यापनमें चाँदीका तारकमण्डल बनाकर उसकी पूजा करे। मोदकके साथ बारह घड़े तथा दक्षिणाके साथ वह मण्डल ब्राह्मणको निवेदित कर दे। इस विधिसे जो पुरुष और स्त्री इस तारकद्वादशी-व्रतको करते हैं, वे सूर्यके समान देदीप्यमान विमानों में बैठकर नक्षत्र-लोकको जाते हैं। वहाँ अयुत वर्षांतक निवास कर विष्णुलोकको प्राप्त करते हैं। इस व्रतको सती, पार्वती, सीता, राज्ञी, दमयन्ती, रुक्मिणी, सत्यभामा आदि श्रेष्ठ नारियोंने किया था। इस व्रतको करनेसे अनेक जन्मों में किये गये पातक नष्ट हो जाते हैं। (अध्याय ६५)