भविष्य महा पुराण

हेमहस्तिरथदानकी विधि

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-महाराज! अब इसके बाद मैं मङ्गलमय सुवर्णनिर्मित हस्तिरथदानका वर्णन कर रहा हूँ, जिससे मनुष्य विष्णुलोकमें जाता है। किसी पुण्यतिथिके आनेपर संक्रान्ति या ग्रहणकालमें बुद्धिमान् यजमानको मणियोंसे सुशोभित देवताओंके रथके आकारका सुवर्णमय रथ, जो विचित्र तोरणों और चार पहियोंसे युक्त हो बनवाना चाहिये। उसमें स्वर्णनिर्मित चार श्रेष्ठ हाथी भी रहने चाहिये। उस रथको कृष्णमृगचर्मके ऊपर रखे गये एक द्रोण तिलपर स्थापित करना चाहिये। वह रथ आठों लोकपाल, ब्रह्मा, सूर्य और शिवकी प्रतिमाओंसे युक्त हो। उसके मध्यभागमें लक्ष्मीसहित विष्णुभगवान्की भी मूर्ति होनी चाहिये। उसके ध्वजपर गरुड तथा जुआके

अग्रभागपर विनायकको स्थापित करना चाहिये। वह नाना प्रकारके फलोंसे युक्त हो और उसके ऊपर चैदोबा तना हो। वह पंचरंगे रेशमी वस्त्र, विकसित पुष्पोंसे सुशोभित हो।

नरोत्तम ! अपनी शक्तिके अनुसार उस रथको पाँच पलसे ऊपर सौ पल सोनेतकका बनवाना चाहिये। इस प्रकार वेदज्ञ ब्राह्मणोंद्वारा माङ्गलिक शब्दोंके उच्चारणके साथ स्नान कराया गया यजमान देवताओं और पितरोंकी अभ्यर्चना करे। अञ्जलिमें फूल लेकर तीन बार रथकी प्रदक्षिणा करे तथा सम्पूर्ण सुखोंको प्रदान करनेवाले इन मन्त्रौंका उच्चारण करे-

नमो नमः शङ्करपद्मजार्क-

लोकेशविद्याधरवासुदेवैः

त्वं सेव्यसे वेदपुराणय -

स्तेजोमयस्यन्दन पाहि तस्मात्॥

यत्तत्पदं परमगुह्यतमं मुरारे-

रानन्दहेतुगुणरूपविमुक्तवन्तम् ।

योपैकमानसदृशो मुनयः समाधौ

पश्यन्ति तत्त्वमसि नाथ रथाधिरूढ़।

यस्मात् त्वमेव भवसागरसम्प्लुताण्ड-

मानन्दभारमृतमध्वरपानपात्रम्।

तस्मादचौधशमनेन कुरा प्रसार्य

चामीकरभरथ माधव सम्प्रदानात्॥

(उत्तरपर्व १८९९-११)

'तेजोमय स्पन्दन । शंकर, ब्रह्मा, सूर्य, लोकपाल, विद्याधर, वासुदेव, वेद, पुराण और यज्ञ तुम्हारी सेवा करते हैं, अतः तुम मेरी रक्षा करो। तुम्हें बारम्बार नमस्कार है। रथाविरूद्ध स्वामिन्! जो पद परम गुह्यतम, 'सनातन, आनन्दका हेतु और गुण एवं रूपसे परे है तथा एकमात्र योगरूप मानसिक दृष्टिवाले मुनिगण जिसका समाधिकालमें दर्शन करते हैं, वह आप ही हैं। माधव! चूंकि आप ही भवसागरमें डूबनेवालोंके लिये आनन्दके पात्र, सत्यस्वरूप तथा यज्ञोंमें पानपात्र हैं, इसलिये आप इस सुवर्णमय हस्तिरथके दानसे मेरे पापपुओंको नष्टकर मुझपर कृपा कीजिये।'

जो मनुष्य इस प्रकार प्रणाम करके स्वर्णमय हस्तिरथ-दान करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है और विद्याधर, देवगण एवं मुनीन्द्रगोंद्वारा सेवित इन्द्रियातीत भगवान् शिवके लोकको प्राप्त करता है तथा अपने बन्धुओं, पितरों, पुत्रों एवं सम्पूर्ण बान्धवोंको विष्णुभगवान्के शाश्वत लोकमें ले जाता है। (अध्याय १८९)