नारदजी बोले-साम्ब ! अब मैं ब्रह्माजीद्वारा वर्णित ध्वजारोपणकी विधि बतलाता हूँ। पूर्वकालमें देवता और असुरों में जो भीषण युद्ध हुआ, उसमें देवताओंने अपने-अपने रथोंपर जिन-जिन चिह्नोंकी कल्पना की, वे ही उनके ध्वज कहलाये। उनका लक्षण इस प्रकार है-ध्वजका दण्ड सीधा, व्रणरहित और प्रासादके व्यासके बराबर लम्बा होना चाहिये अथवा चार, आठ, दस, सोलह या बीस हाथ लम्बा होना चाहिये। ध्वजाका दण्ड बीस हाथसे अधिक लम्बा न हो और सम पर्योवाला हो। उसकी गोलाई चार अङ्गुल होनी चाहिये।
ध्वजके ऊपर देवताको सूचित करनेवाला चिह बनवाना चाहिये। भगवान् विष्णुके ध्वजपर गरुड, शिवजीकी ध्वजापर वृष, ब्रह्माजीकी ध्वजापर पद्य, सूर्यदेवकी ध्वजापर व्योम, सोमकी पताकापर नर, बलदेवकी पत्ताकापर फालसहित हल, कामदेवकी पताकापर मकरध्वज, इन्द्रको ध्वजापर हस्ती, दुर्गको 'ध्वजापर सिंह, उमादेवीकी ध्वजायर गोधा, रैवतको ध्वजापर अश्व, वरुणकी ध्वजापर कच्छप, वायुको ध्वजापर हरिण, अग्निकी ध्वजापर मेष, गणपतिको ध्वजापर मूषकका तथा ब्रहार्षियोंकी पताकापर कुशको चिह्न बनाना चाहिये। जिस देवताका जो वाहन हो, वही ध्वजापर भी अङ्कित रहता है।
विष्णुकी ध्वजाका दण्ड सोनेका और पताका पीतवर्णकी होनी चाहिये, वह गरुड़के समीप रखनी चाहिये। शिवजीका ध्वजदण्ड चाँदीका और बेत वर्णकी पताका वृषके समीप स्थापित करे। ब्रह्माका ध्वजदण्ड ताँबेका और पावर्णको पताका कमलके समीप रखे। सूर्यनारायणका ध्वजदण्ड सुवर्णका और व्योमके नीचे पंचरंगी पताका होनी चाहिये, जिसमें किंकिणो लगी रहे एवं पुष्पमालाओंसे संयुक्त हो। इन्द्रका ध्वजदण्ड सोनेका और हस्तीके समीप अनेक वर्णकी पताका होनी चाहिये। बमका ध्वजदण्ड लोहेका और महिषके समीप कृष्णवर्णकी पताका रखनी चाहिये। कुबेरका ध्वजदण्ड मणिमय और मनुष्य-पादके समीप रक्त वर्णकी पताका रखे। बलदेवका ध्वजदण्ड चाँदीका और तालवृक्षके नीचे श्वेतवर्णकी पताका रखनी चाहिये। कामदेवका ध्वजदण्ड त्रिलौह (सोना, चाँदी और ताँबा-मिश्रित)-का और मकरके समीप रक्तवर्णकी पताका स्थापित करनी चाहिये। कार्तिकेयका ध्वजदण्ड त्रिलौहका और मयूरके समीप चित्रवर्णकी पताका एवं गणपतिका ध्वजदण्ड ताम्रका अथवा हस्तिदन्तका एवं मूषकके समीप शुक्लवर्णकी पताका और मातृकाओंके ध्वजदण्ड अनेक रूपोंके तथा अनेक वर्णोको अनेक पताकाएँ होनी चाहिये। रेवन्तकी पताका अश्वके समीप लालवर्णकी, चामुण्डाका ध्वजदण्ड लौहका और मुण्डमालाके समीप नीले वर्णकी ध्वजा होनी चाहिये। गौरीका ध्वजादण्ड ताम्रका और इन्द्रगोप (बीरबहूटी कीट) के समान अतिशय रक्तवर्णकी ध्वजा होनी चाहिये। अग्निका ध्वजदण्ड सुवर्णका और मेधके समीप अनेक वर्णकी पताका होनी चाहिये । वायुका ध्वजदण्ड लोहका और हरिणके समीप कृष्णवर्णकी पताका होनी चाहिये। भगवतीका ध्वजदण्ड सर्वधातुमय, उसके ऊपर सिंहके समीप तीन रंगकी पताका होनी चाहिये।
इस प्रकार ध्वजका पहिले निर्माण कर उसका अधिवासन करे। लक्षणके अनुसार वेदीका निर्माण को, कलशको स्थापना कर सर्वोषधि जलसे ध्वजको स्नान कराये। बेदीके मध्य में उसे खड़ाकर सभी उपचारोंसे उसकी पूजा करे और उसे पहिनाये, दिवपालोको बलि देकर एक राततक अधिवासन करे। दूसरे दिन भीजन कराकर शुभ मुहूर्तमें स्वस्तिवाचन आदि मङ्गल-कृत्य सम्पन्न कर ध्वजको मन्दिरके ऊपर आरूढ़करे। ध्वजारोहणके समय अनेक प्रकारके वाद्योंको बजाये, ब्राह्मणगण वेद-ध्वनि करें। इस प्रकार देवालयपर ध्वजारोहण कराना चाहिये। ध्वजारोहण करानेवालेकी सम्पत्तिकी सदा वृद्धि होती रहती है और वह परम गतिको प्राप्त करता है। ध्वजरहित मन्दिरमें असुर निवास करते हैं, अत: ध्वजरहित मन्दिर नहीं रखना चाहिये। ध्वजारोहणके समय इन मन्त्रोंको पढ़ना चाहिये-
एहोहि भगवन् देव देववाहन वै खग।।
श्रीकरः श्रीनिवासश्च जय जैत्रोपशोभित ।
व्योमरूप महारूप धर्मात्मंस्त्वं च वै गतेः ।।
सानिध्यं कुरु दण्डेऽस्मिन् साक्षी च धूवता वज।
कुरु वृद्धिं सदा कर्तुः प्रासादास्पार्कवल्लभ॥
ॐ एहोहि भगवन्नीश्वरविनिर्मित
उपरिचरवायुमार्गानुसारिन्ड्रीनिवास रिपुध्वंस
यक्षनिलय सर्वदेवप्रियं कुरु सांनिष्यं शान्तिं स्वात्ययन
च मे। भयं सर्वविघ्ना व्यपसरन्तु॥
(माहापर्व १३८।७३-७६)
स्वच्छ दण्डमें पताकाको प्रतिष्ठित करे तथा पताकाका दर्शन करे। इस प्रकार भक्तिपूर्वक जो रविका ध्वजारोपण करता है, वह श्रेष्ठ भोगोंको भोगकर सूर्यलोकको प्राप्त करता है। (अध्याय १३८)