सुमन्तु मुनि बोले-राजन्! जो स्त्री कार्तिक मासके दोनों पक्षोंकी षष्ठी एवं सप्तमी तिथियोंमें क्षमा, अहिंसा आदि नियमोंका पालन कर, संयतेन्द्रिय होती हुई एकभुक्त रहती एवं उपवास करती है और गुड़-घीसे युक्त शालि-अन्न श्रद्धाके साथ भगवान् सूर्यको अर्पित करती है तथा करवीरके पुष्प और घृतके साथ गुग्गुल निवेदित करती है, वह स्त्री इन्द्रनीलके समान सार्वकालिक विमानपर बैठकर दस लाख वर्षातक सूर्यलोकमें आनन्दमय जीवन व्यतीत करती है। सभी लोकोंके भोगोंको भोगकर क्रमश: इस लोकमें आकर जन्म ग्रहण करती तथा अभीप्सित पतिको प्राप्त करती है। इस प्रकार वर्षभरके सभी व्रतोंकी विधि समान कही गयी है। एक समय भोजन और उपवासका समान ही फल होता है। क्षमा, सत्य, दया, दान, शौच, इन्द्रियनिग्रह, सूर्यपूजा, अग्निहवन, संतोष तथा अचौर्यव्रत-ये दस सभी व्रतोंके लिये सामान्य (आवश्यक) धर्म (अङ्ग) हैं।
इसी तरह मार्गशीर्ष आदि मासोंमें निर्दिष्ट नियमोंका पालन करते हुए सूर्यकी पूजा करनेसे अभ्युदयकी प्राप्ति होती है, साथ ही सहस्रों वर्षोंतक सूर्यलोकका सुख भोगकर वह नारी अन्तमें राजपत्नी बनती है।
जो कोई भी पुरुष या स्त्री अथवा नपुंसक भक्तिपूर्वक भगवान् सूर्यको उपासना करते हैं वे सभी अपने मनोऽनुकूल फल प्राप्त करते हैं। (अध्याय १६८)