महाराज युधिष्ठिरने पूछा-भगवन्! अपने पूर्व-जन्मोंका ज्ञान होना बहुत कठिन है। आप यह बतायें कि ऋषियोंके वरदान, देवताओंकी आराधना या तीर्थ, नान, होम, जप, तप, व्रत आदिके करनेसे पूर्वजन्मका ज्ञान प्रास हो सकता है या नहीं? यदि ऐसा कोई व्रत हो, जिसके करनेसे पूर्वजन्मका स्मरण हो सकता है तो आप उसका वर्णन करें।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा-राजन् ! एक ही वर्षमें 'मार्गशीर्ष, फाल्गुन, ज्येष्ठ एवं भाद्रपद' क्रमश: इन चार मासोंमें भद्रव्रतका श्रद्धापूर्वक उपवास करनेसे मनुष्यको अपने पूर्वजन्मका स्मरण हो जाता है। इस विषयमें एक आख्यान है, उसे आप सुनें-
प्राचीन कालमें यमुनाके किनारे शुभोदय नामका एक वैश्य रहता था। वह इस व्रतको करता था। कालक्रमसे वह मृत्युको प्राप्त हुआ और व्रतके प्रभावसे वह दूसरे जन्म में राजा संजयके पुत्र- रूपमें उत्पन्न हुआ, उसका नाम था स्वर्णष्ठीवी। उसे पूर्वजन्मका स्मरण था। कुछ दिनों बाद चोरोंने उसे मार डाला और नारदजीके प्रभावसे वह जीवित हो गया। इस व्रतके प्रभावसे अपने इस विगत वृत्तान्तोंको वह भलीभाँति जानता था।
राजाने पूछा- उसका स्वर्णष्ठीवो नाम कैसे पड़ा? और चोरोंने उसे क्यों मार डाला? तथा किस उपायसे वह जीवित हुआ, इसका विस्तारपूर्वक वर्णन करें?
भगवान् श्रीकृष्णने कहा-महाराज! कुशावती नामकी नगरीमें संजय नामका एक राजा रहता था। एक दिन नारद और पर्वत नागके दो मुनि राजाके पास आये। वे दोनों राजाके मित्र थे। राजाने अर्ध्य-पाध, आसनादि उपचारोंसे उनका पूजन तथा सत्कार किया। उसी समय राजाकी अत्यन्त सुन्दरी राजकन्या वहाँ आयी। पर्वतमुनिने उसे देखकर मोहित हो राजासे पूछा-राजन् ! यह युवती कौन है?' राजाने कहा-'मुने! यह मेरी कन्या है।' नारदजीने कहा-'राजन्! आप अपनी इस कन्याको मुझे दे दें और आप जो दुर्लभ वर माँगना चाहते हों, वह मुझसे माँग लें।' राजाने प्रसन्न होकर कहा-'देवर्षे ! आप मुझे एक ऐसा पुत्र दें जो जिस स्थानमें मूत्र-पुरीष और निष्ठीवन (थूक, खखार)-का त्याग करे, वह सब उत्तम सुवर्ण बन जाय।' नारदजी बोले-'ऐसा ही होगा।'
राजाने अभीष्ट वर प्राप्त कर अपनी कन्याको वस्त्राभूषणसे अलंकृतकर नारदजीसे उसका विवाह कर दिया। नारदकी इस लीलाको देखकर पर्वतमुनिके ओठ क्रोधसे फड़कने लगे, आँखें लाल हो गयीं। वे नारदजीसे बोले-'नारद! तुमने इसके साथ विवाह कर लिया, अतः तुम मेरे साथ स्वर्ग आदि लोकोंमें नहीं जा सकोगे और जो तुमने इस राजाको पुत्र-प्राप्तिका वरदान दिया है, वह पुत्र भी चोरोंद्वारा मारा जायगा।' यह सुनकर नारदजीने कहा-' पर्वत ! तुम धर्मको जाने बिना मुझे शाप दे रहे हो। यह कन्या है, इसपर किसीका भी अधिकार नहीं। धर्मपूर्वक माता पिता जिसे दे दें, वही उसका स्वामी होता है। तुमने मूढ़तावश मुझे शाप दिया है, इसलिये तुम भी स्वर्गमें नहीं जा सकोगे। राजा संजयके पुत्रको चोरोंद्वारा मार डाले जानेपर भी मैं उसे यमलोकसेले आऊँगा।'
'जालिस्मर शब्दका अर्थ है पूर्वजन्मोंको स्मरण करनेवाला व्यक्ति। यह योगदर्शनके अनुसार त्याग, अपरिग्रह और मन-बुद्धि एवं प्रकृति के अनुशोलनसे प्राप्त होता है-"संस्कारसाक्षात्करणात् पूर्वजातिज्ञानम्'। ( योगदर्शन ३। १८) जिस प्रकार अद्रोह, सद्भाव, सरलता आदिको जातिस्मरता (आध्यात्मिकता कुण्डलिनी-जागरणादि) में सहायक माना है, उसी प्रकार आकार, कौटिल्य-देष द्रोहादिको आध्यात्मिकतामें बाधक भी मानना चाहिये और कल्याणकामीको उनसे सदा बचते रहने की भी पेश करनी चाहिये।
इस प्रकार परस्पर शाप देकर और राजा संजयके द्वारा सत्कृत होकर दोनों मुनि अपने- अपने आश्रमकी ओर चले गये। तदनन्तर सातवें महीनेमें राजाको पुत्र उत्पन्न हुआ। वह कामदेवके समान अतिशय रूपवान् और पूर्वजन्मोंका जाता था। नारदजीके वरदानसे जिस स्थानपर वह मूत्र-पुरीष आदिका परित्याग करता, वहीं वह सुवर्ण हो जाता, इसलिये राजाने उसका नाम स्वर्णष्ठीवी रखा। वह राजपुत्र सभी प्राणियोंकी बातोंको समझता था। राजा संजयने पुत्रके प्रभावसे बहुत धन प्राप्तकर राजसूय आदि यज्ञोंका विधिपूर्वक सम्पादन किया। उसने अनेक कूप, सरोवर, देवालयों आदिका निर्माण कराया। पुत्रकी रक्षाके लिये विशाल सेना भी नियुक्त कर दी।
स्वर्णष्ठीवीके प्रभावसे राजा संजयके यहाँ स्वर्णकी ढेर सारी राशियाँ एकत्र हो गयीं। कुछ समयके बाद राजपुत्रकी अत्यन्त ख्याति सुनकर लोभवश मदोद्धत चोरोंने स्वर्णष्ठीवीका हरण कर लिया, परंतु जब उसके शरीरमें कहीं भी सोना नहीं देखा; तब चोरोंने उसे मारकर जंगलमें फेंक दिया। चोरोंद्वारा पुत्रके मारे जानेपर राजा बहुत दुःखी हो विलाप करने लगा। उस समय नारदजी वहाँ पुनः पधारे। नारदजीने अनेक प्राचीन राजाओंकी गाथाएँ सुनाकर राजाके शोकको दूर किया और यमलोकमें जाकर वे राजपुत्रको ले आये। पुत्रको प्राप्तकर राजा बहुत प्रसन्न हुआ और उसने नारदजीसे पूछा-'महाराज। किस कर्मके प्रभावसे यह मेरा पुत्र स्वर्णष्ठीवी हुआ और किस कर्मक प्रभावसे इसको पूर्वजन्मका स्मरण है ?' नारदजोने कहा 'राजन् ! इसने 'भद्र' नामक व्रतको विधिपूर्वक चार बार किया है। यह उसीका प्रताप है। शाला कहकर नारदजी अपने आपको चले गये
भगवान् श्रीकृष्या बोले-महाराज !इस व्रत के करनेसे व्रतीका उत्तम कुलमें जन्म होता है और वह रूपवान् तथा पूर्वजन्मका ज्ञाता एवं दीर्घायु होता है। अब आप इस व्रतका विधान सुनें-इस व्रतके चार भद्र चार पादके रूपमें हैं। मार्गशीर्षमें पहला, फाल्गुनमें दूसरा, ज्येष्ठमें तीसरा और भाद्रपदमें चौथा पाद होता है। मार्गशीर्ष शुक्ल आदि तीन मास 'विष्णुपद' नामक भद्र सभी धर्मोका साधक है। फाल्गुन शुक्ल आदि तीन मास 'त्रिपुष्कर' नामक भद्ररूप है और यह तप आदिका साधक एवं लक्ष्मीप्रद है। ज्येष्ठ शुक्ल आदि तीन मास 'त्रिराम' नामक भद्र है। यह सत्य और शौर्य प्रदान करता है। भाद्रपद शुक्ल आदि तीन मास 'त्रिरंग' नामक भद्र है, यह बहुत विद्या देनेवाला है। सभी स्त्री-पुरुषोंको इस भद्रव्रतको करना चाहिये।
राजा युधिष्ठिरने पूछा-जगत्पते ! इन भद्रोंका विधान आप विस्तारपूर्वक कहें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! इस अतिशय गुस विधानको मैंने किसीसे नहीं कहा है, आपको मैं सुनाता हूँ, आप सावधान होकर सुनें-
मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षको प्रारम्भिक चार तिथियाँ अत्यन्त श्रेष्ठ मानी गयी हैं। ये तिथियाँ हैं-द्वितीया, तृतीया, चतुथों और पञ्चमी। व्रतीको प्रतिपदाके दिन जितेन्द्रिय होकर एकभुक्त रहना चाहिये। प्रात:कालमें द्वितीया तिधिको नित्यक्रियाओंको सम्पन्न कर मध्याह्नमें मन्त्रपूर्वक गोमय तथा मिट्टी आदि लगाकर स्नान करना चाहिये। इन मन्त्रोंके अधिकारी चारों वर्ण हैं, किंतु वर्णसंकरोंको इनका अधिकार नहीं है। विधवा स्त्री यदि सदाचारसम्पन्न हो तो वह भी इस व्रतकी अधिकारिणी है। सधवा स्त्री अपने पतिकी आज्ञासे यह व्रत ग्रहण करे। शरीरमें मिट्टी-लेपन करनेका मन्त्र इस प्रकार है-
त्वं मत्स्त्रे वन्दिता देवैः समलैदैत्यघातिभिः ।।
मयापि वन्दिता भक्त्या मामतो विमलं कुरु॥
(उत्तरपर्व १३ । ६५-६६)
"मृत्तिके! दुष्ट दैत्योंका विनाश करनेवाले देवताओंके द्वारा आप वन्दित हैं, मैं भी भक्तिपूर्वक आपकी वन्दना करता हूँ, मुझे भी आप पवित्र बना दें।'
अनन्तर जलके सम्मुख जाकर सफेद सरसों, कृष्ण तिल, वच और सौषधिका उबटन लगाकर जलमें मण्डल अङ्कित कर ये मन्त्र पढ़ने चाहिये-
त्वमादिः सर्वदेवानां जगतां च जगन्मये।
भूतानां वीरुधां चैव रसानां पतये नमः ।।
गङ्गासागरजं तोयं पौष्कर नार्मदं तथा।
यामुनं सांनिहत्यं च संनिधानमिहास्तु मे ॥
(उत्तरपर्व १३ । ६८-६९)
ये मन्त्र पढ़कर स्नानकर शुद्ध वस्त्र पहन, संध्या और तर्पण करे। फिर घर आकर नियमपूर्वक रहे और चन्द्रोदयपर्यन्त किसीसे सम्भाषण न करे।
इसी प्रकार द्वितीया आदि तिधियोंमें कृष्ण, अच्युत, अनन्त और हषीकेश–इन नामोंसे भक्तिपूर्वक भगवान्का पूजन करे। पहले दिन भगवान् के चरणारविन्दोंका, दूसरे दिन नाभिका, तीसरे दिन वक्षःस्थलका और चौथे दिन नारायणके मस्तकका विधिपूर्वक उत्तम पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे पूजन करे और रानिमें जब चन्द्रोदय हो, तब शशि, चन्द्र, शशाङ्क तथा इन्दु इन नामोंसे क्रमश: चन्दन, आरार, कपूर, दधि, दूर्वा, अक्षत तथा अनेक रली, पुष्पों एवं फलों आदिसे चन्द्रमाको अध्य दे। प्रत्येक दिन जैसे जैसे चन्द्रमाको वृद्धि हो वैसे-वैसे अपमें भी वृद्धि करनी चाहिये अर्घ्य इस मन्त्रसे देना चाहिये
नवो नवोऽसिमासान्ते जायमानः पुनः पुनः।
त्रिरग्रिसपवेतान वै देवानाप्यायसे हविः ।।
गगनाङ्गपासदीप दुग्धाब्धिमधनोद्धव।
भाभासितदिगाभोग रमानुज नमोऽस्तु ते॥
(उत्तरपर्व १३१८६-८७)
'हे रमानुज! आप प्रत्येक मासके अन्तमें नवीन-नवीन रूपमें आविर्भूत होते रहते हैं। तीन अग्नियोंसे समन्वित देवताओंको आप ही हविष्यके द्वारा आप्यायित करते हैं। आपकी उत्पत्ति क्षीरसागरके मन्थनसे हुई है। आपकी आभासे ही दिशा-विदिशाएँ आभासित होती हैं। गगनरूपी आँगनके आप सत्स्वरूपी देदीप्यमान दीपक हैं। आपको नमस्कार है।'
चन्द्रमाको अर्घ्य निवेदित कर वह अर्घ्य ब्राह्मणको दे दे। अनन्तर मौन होकर भूमिपर पद्मपत्र बिछाकर भोजन करे। पलाश या अशोकके पत्रोंद्वारा पवित्र भूमि या शिलातलका शोधन कर इस मन्त्रसे भूमिको प्रार्थना करनी चाहिये-
त्वत्तले भोक्तुकामोऽहं देवि सर्वरसोद्भवे ॥
मदनुग्रहाय सुस्वादं कुर्वन्त्रममृतोपमम् ।
(उत्तरपर्य २३ । ९०-९१)
'सम्पूर्ण रसोंको उत्पन्न करनेवाली हे पृथ्वी देवि! आपके आश्रयमें मैं भोजन करना चाहता हूँ मुझपर अनुग्रह करनेके लिये आप इस अन्नको अमृतके समान उत्तम स्वादयुक्त बना दें।'
अनन्तर शाक तथा पक्कानका भोजन करे। भोजनके बाद आचमन करे और अङ्गोका स्पर्श कर चन्द्रमाका ध्यान करते हुए भूमिपर ही शयन करे। द्वितीयाके दिन क्षार एवं लवणरहित हविष्यका भोजन करना चाहिये। तृतीयाको नीवार (तिन्त्री) तथा चतुर्थीको गायके दूधसे बने उत्तम पदार्थों को ग्रहण करना चाहिये। पञ्चमीको घृतयुक्त कृशरान्न (खिचड़ी) ग्रहण करना चाहिये। इस 'भद्रव्रतमें सावाँ, चावल, गायका घृत तथा अन्य गव्य पदार्थ एवं अयाचित प्राप्त वन्य फल प्रशस्त माने गये हैं। अनन्तर प्रातःकाल खानकर पितरोंका तर्पण कर ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें दान दक्षिणा आदि
देकर विदा करना चाहिये। बादमें भृत्य एवं बन्धुजनोंके साथ स्वयं भी भोजन करे।
इस प्रकार तीन-तीन महीनोंतक चार भद्र-व्रतोंका जो वर्षपर्यन्त भक्तिपूर्वक प्रमादरहित होकर आचरण करता है, उसे चन्द्रदेव प्रसत्र होकर श्री, विजय आदि प्रदान करते हैं। जो कन्या इस भद्रव्रतका अनुष्ठान करती है, वह शुभ पतिको प्राप्त करती है। दुर्भगा स्त्री सुभगा एवं साध्वी हो जाती है तथा नित्य सौभाग्यको प्राप्त करती है। राज्यार्थी राज्य, धनार्थी धन और पुत्रार्थी पुत्र प्राप्त करता है। इस भद्रव्रतके करनेसे स्त्रीका उत्तम कुलमें विवाह होता है तथा वह उत्तम शय्या, अन्न, यान, आसन आदि शुभ पदार्थों को प्राप्त करती है और पुरुष धन, पुत्र, स्त्रीके साथ ही पूर्वजन्मके ज्ञानको भी प्राप्त कर लेता है। (अध्याय १३)