भविष्य महा पुराण

मधूकतृतीया एवं मेघपालीतृतीया-व्रत

युधिष्ठिरने पूछा-भगवन्! मधूक-वृक्षका आश्रय ग्रहण करनेवाली भगवान् शंकरकी भार्या भगवती गौरीकी लक्ष्मी, सरस्वती आदि देवियोंने किस कारणसे अर्चना की, इंसे आप बतायें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-प्राचीन काल में समुद्र-मन्थनसे मधूक-वृक्ष विनिर्गत हुआ। स्त्रियोंको अखण्ड सौभाग्य प्राप्त करानेवाले तथा सभी आधि- व्याधियोंको दूर करनेवाले उस वृक्षको भूलोकवासियोंने पृथिवीपर स्थापित किया। जया-विजया आदि सखियोंसहित भगवती गौरीको उस प्रफुल्लित सुन्दर वृक्षका आश्रय ग्रहण किये देखकर देवताओंने अपनी अभीष्ट इच्छाओंकी पूर्तिहेतु उसकी अनेक उपचारोंसे पूजा की। स्वयं लक्ष्मी, सरस्वती, सावित्री, गङ्गा, रोहिणी, रम्भा तथा अरुन्धती आदिने भी विनयपूर्वक पूजा की। भगवती गौरीने प्रसन्न होकर उन्हें अभिमत फल प्रदान किया। फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षकी तृतीया तिधिको इनकी उपासना हुई थी। इसलिये फाल्गुनके शुक्ल पक्षकी तृतीया तिथिको उपचासकर मधुवनमें जाकर मधूक वृक्षके नीचे ब्रह्मचर्य में स्थित, जटामुकुटसे सुशोभित, तपस्यारत तथा गोधाके स्थपर आरूढ़, रुद्र-ध्यानपरायणा भगवती पार्वतीको प्रतिमाका ध्यान करते हुए गन्ध, पुष्प, दीप, लाल चन्दन, केसर मधुर द्रव्य, स्वर्ण, माणिक्य आदिसे पूजाकर देवीसे इस प्रकार अखण्ड सौभाग्यके लिये प्रार्थना करे-

ॐ भूषिता देवभूषा च भूषिका ललिता उमा।

तपोवनरत्ता गौरी सौभाग्य मे प्रयच्छतु ।

दौभाग्य मे शमयतु सुप्रसन्नमनाः सदा।

अवैधव्यं कुले जन्म ददात्वपरजन्मनि ।

(उत्तरपर्व १६।३४)

'तपोचतरता हे गौरी देखि। आपका नाम ललिता था माहै। आप देवताओको आभूषणस्वरूपा एवं सभीको आभूषित करनेवाली हैं और स्वयं आभूषित हैं। आप मुझे सौभाग्य प्रदान करें। आप मेरे दौर्भाग्यका शमन करें। दूसरे जन्ममें भी मेरा सौभाग्य अखण्डित रहे। आप सर्वदा मुझपर प्रसन्न रहें।'

अनन्तर फूल, जीरक, लवण, गुड़, घी, पुष्पमालाओं, कुंकुम, गन्ध, अगरु, चन्दन एवं सिंदूर आदि तथा वस्त्रोंसे और अनेक देशोत्पत्र अंजनोंसे, पुआ, तिल और तण्डुल, घृतपूरित मोदक इत्यादि नैवेद्योंसे मधूक-वृक्षकी पूजा करे। उसकी प्रदक्षिणा कर ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे। जो कन्या इस उत्तम तृतीया-व्रतको करती है, वह तीनों लोकोंमें दुष्प्राप्य भगवान् विष्णुके समान पति प्राप्त करती है। राजन्! मेरे द्वारा कथित यह व्रत चिरकालतक प्रसिद्ध रहेगा। इस व्रतको रुक्मिणीके सम्मुख प्रथम महर्षि कश्यपने कहा था। जो स्त्री इस व्रतका आचरण करेगी, वह नीरोग, सुन्दर दृष्टिसम्पन्न तथा अङ्ग- प्रत्यङ्गोंसे शोभायुक्त होकर सौ वर्षांतक जीवित रहेगी। अनन्तर किंकिणीके शब्दोंसे समन्वित हंसयानसे रुद्रलोकको प्राप्त करेगी। वहाँ अनेक वर्षातक अपने पति के साथ दिव्य भोगों को प्राप्त कर आठों सिद्धियोंसे समन्वित होगी।

युधिष्ठिरने पूछा- भगवन्! मेघपाली-व्रत कब और कैसे अनुष्ठित होता है, इसका क्या फल है तथा मेघपाली लता कैसी होती है? इसे बतलानेको कृपा करें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-आश्विन मासके कृष्ण पक्षकी तृतीया तिथिको भक्तिपूर्वक स्त्रियों अथवा पुरुषोंको सद्धर्मकी प्रालिके लिये मेधपालीको सप्तधान्य (यव, गोधूम, धान, तिल, कंगु श्यामाक (सावाँ) तथा चना) और अडरित गोधूमके साथ अथवा तिल-तण्डुलके पिण्डोदारा अर्घ्य प्रदान करना चाहिये। मेघपाली ताम्बूलके समान पत्तोंवाली, मञ्जरीयुक्त एक लाल लता है, वह वाटिकाओंमें, ग्राम-मार्गमें होती है तथा पर्वतॊपर प्रायः होती है। व्यापारसे जीवन बितानेवाले वैश्यगण धान्य, तेल, गुड़, कुंकुम, स्वर्ण तथा पद (जूता, छाता, कपड़ा, अंगूठी, कमण्डलु, आसन, बर्तन और भोज्य वस्तु) आदिसे इसकी पूजा करते हैं। मेघपालीके अर्घ्यदानसे जाने-अनजाने जो भी पाप होते हैं वे नष्ट हो जाते हैं। श्रेष्ठ स्त्रियोंको शुभ देश या स्थानमें उत्पन मेघपालीकी फल, गन्ध, पुष्प, अक्षत, नारिकेल, खजूर, अनार, कनेर, धूप, दीप, दही और नये अङ्कुरवाले धान्य-समूहसे पूजा करनी चाहिये तथा लाल वस्त्रोंसे उसे आच्छादित कर और अबीरसे विभूषित कर अर्घ्य देना चाहिये। वह अर्घ्य विद्वान् ब्राह्मणको समर्पण कर देना चाहिये। इस प्रकार मेघपालीकी पूजा करनेवाली नारी या पुरुष परम ऐश्वर्यको प्राप्त करते हैं तथा सुख-सौभाग्यसे समन्वित हो सौ वर्षांतक मर्त्यलोकमें जीवित रहते हैं। अन्तमें विमानपर आरूढ हो विष्णुलोकको प्राप्त करते हैं और अपने सात कुलोंको निःसंदेह नरकसे स्वर्ग पहुँचा देते हैं। जो नरकके भयसे फलादिसे समन्वित अर्ध्य मेघपालीको प्रदान करता है, उसके सभी पाप वैसे ही नष्ट हो जाते हैं जैसे सूर्यके द्वारा अन्धकार नष्ट हो जाता है। (अध्याय १६-१७)