महाराज युधिष्ठिरने कहा- भगवन्! आप सभी शास्त्रोंके मर्मज्ञ हैं, अत: आप गृहदानकी विधि और महिमा बतलानेकी कृपा करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! गार्हस्थ्यधर्मसे बढ़कर कोई धर्म नहीं और असत्यसे बढ़कर कोई पाप नहीं है। ब्राहाणसे बढ़कर कोई पूज्य नहीं और गृहदानसे बढ़कर कोई दान नहीं है। धन, धान्य, स्त्री, पुत्र, हाथी, घोड़ा, गौ, भृत्य आदिसे परिपूर्ण घर स्वर्गसे भी अधिक सुख देनेवाला है। जिस प्रकार सभी प्राणी माताके आश्रयसे जीवित रहते हैं, उसी प्रकार सभी आश्रम भी गृहस्थ आश्रमपर ही आधृत हैं। अपने घर रात्रिको पैर फैलाकर सोने में जो सुख है, वह सुख स्वर्गमें भी नहीं। अपने घरमें शाकका भोजन करना भी उत्तम सुख है, इसलिये महाराज! सुन्दर घर बनवाकर ब्राह्मणको देना चाहिये। जो व्यक्ति शैव, वैष्णव, योगी, दीन, अनाथ, अभ्यागत आदिके लिये गृह, धर्मशाला बनाता है, उस व्यक्तिको सभी व्रत और सभी प्रकारके दान करनेका फल प्राप्त हो जाता है। पक्के ईंट्से सुदृढ़, ऊँचा, शुभ्रवर्ण, जाली, झरोखा, स्तम्भ, कपाट आदिसे युक्त, जलाशय और पुष्प-वाटिकासे भूषित, उत्तम आँगनसे सुशोभित सुन्दर घर बनाना चाहिये। गृह कछुएकी पीठके समान ऊँया एवं बरामदोंसे सुसज्जित होना चाहिये। उसे कई मंजिलों तथा गलियों आदिसे समन्वित होना चाहिये। लोहा, सोना, चाँदी, ताँबा, लकड़ी, मृत्तिका आदिके पात्र वस्त्र चर्म, वल्कल, तृण, पाषाण-पात्र, रस, आभूषण, गाय, भैस, घोड़ा बैल, सभी प्रकार के धान्य, थी. ल. तिल, चावल, ख, ग, गे सरसो मटर अरहर, चना, उड़द, नमक, खजूर, जोरा पनिया चूल्हा पक्की, छलनी, ऊखल, मूसल, सूप, हाँडी, मथानी, झाडू तथा जलकुम्भ आदि ये सब गृहस्थके उपकरण है, इनको घरमें स्थापित करनेके बाद शुभ मुहूर्तमें कुलीन एवं शीलसम्पन्न, वेदशास्त्रके जाननेवाले, गृहस्थधर्मका पालन करनेवाले, जितेन्द्रिय सपत्नीक ब्राह्मणों को बुलाकर वस्त्र, गन्ध, आभूषण, पुष्पमाला आदिसे उनका पूजन कर शान्तिकर्मके लिये उनको नियुक्त करना चाहिये। घरके आँगनमें एक मेखलासहित कुण्डका निर्माण करवाना चाहिये। ब्राह्मणोंद्वारा तुष्टि-पुष्टि प्रदान करनेवाला ग्रहयाग करे। ब्राह्मण रक्षोघ्रसूक्त पढ़नेके बाद वास्तु-पूजा कर सभी दिशाओंमें भूतबलि दे। इसके बाद यजमान पुण्य पवित्र घोषके साथ ब्राह्मणों को दानके निमित्त बनाये गये उन घरों में प्रवेश कराये और वहाँ शय्याओंपर उन सपत्नीक ब्राह्मणोंको बिठलाये। जिस घरको पूर्वमें ही जिस ब्राह्मणके लिये नियत किया गया है उसे 'इदं गृहं गृहाण' 'इस गृहको ग्रहण करें' ऐसा कहकर प्रदान करे। ब्राह्मण 'स्वस्ति' कहें और 'कोऽदात्' (यजु० ७।४८) इस मन्त्रका पाठ करें। यदि सामर्थ्य हो तो एक-एक घर ब्राह्मणों को दे अथवा एक हो घर बनवाकर एक सत्पात्र ब्राह्मणको देना चाहिये । राजन् ! शीत, वायु और धूपसे रक्षा करनेवाली तृणमयी कुटी ब्राह्मणोंको देनेपर भी जब सभी कामनाओंकी पूर्ति हो जाती है और स्वर्ग प्राप्त होता है तो फिर उत्तम घर, दान देनेके फलका वर्णन कहाँतक किया जा सकता है। गाय, भूमि, सुवर्ण आदिके दान और अनेक प्रकारके यम-नियमोंका पालन गृहदानके सोलहवें भागकी भी बराबरी नहीं कर सकते। जो व्यक्ति सभी सामग्रियोसहित सुदढ़ और सुन्दर घर ब्राह्मणको दान करता है, वह शिवलोकको प्राप्त करता है। (अध्याय १६८)