ब्रह्माजी बोले-धर्मज्ञ! अब मैं जगद्धाता देवदेवेश्वर भगवान् सूर्यनारायणके पंदद्वय-माहात्म्यका वर्णन करता हूँ, इसे आप सुनें।
अंशुमाली सूर्यदेवने संसारके कल्याणकी कामनासे अपने दोनों पादोंको एक पादपीठपर रखा है। उनके वामपादको उत्तरायण और दक्षिणपादको दक्षिणायनके रूपमें जानना चाहिये। सभी इन्द्र आदि देवगण इनके चरणोंकी वन्दना करते रहते हैं। हम और आप सूर्यदेवके दक्षिणपादकी अर्चना करते हैं। विष्णु तथा शङ्कर श्रद्धापूर्वक उनके वामपादकी पूजा करते हैं । जो मानव प्रत्येक सप्तमीको भगवान् सूर्यदेवकी विधिवत् आराधना करता है, उसपर वे सदा संतुष्ट रहते हैं।
भंगवान् विष्णुने पूछा-गोलोकस्वामी सूर्य-नारायणकी आराधना किस प्रकार की जाती है? उसका आप वर्णन करें।
ब्रह्माजी बोले-उत्तरायण प्रारम्भ होनेके दिन स्नान करके संयमित मनसे पृत दुग्ध आदि पदार्थोके द्वारा भगवान् सूर्यको स्नान कराना चाहिये। सुन्दर वस्त्रोपहार, पुष्प धूप तथा अनुलेपनादिसे उनकी विधिवत् पूजा कर ब्राह्मणोंको भोजन और दक्षिणादिसे संतुष्ट करना चाहिये। उसके बाद सूर्यभक्ति-परायण व्यक्तिको उनके पदद्वय व्रतका विधान ग्रहण करना चाहिये। तदनन्तर लान करके 'चित्रभानु' दिवाकरकी वन्दना करनी चाहिये। खाते-चलते, सोते-जागते, प्रणाम करते, हवन और पूजन करते समय भगवान् चित्रभानुका ही
जप करते हुए प्रतिदिन उनके नाम-कीर्तनका ही तबतक जप करना चाहिये, जबतक दक्षिणायनका समय न आ जाय। उनकी प्रार्थना इस प्रकार करनी चाहिये-
परमात्ममयं ब्रह्म चित्रभानुमयं परम्।
यमन्ते संस्मरिष्यामि स मे भानुः परा गतिः ।।
(ब्राह्मपर्व १०७।१७)
'चित्रभानु परमात्ममय परम ब्रह्म हैं, जिनका को अन्तकालमें मैं भलीभाँति स्मरण करूँगा, क्योंकि क वे ही सूर्यनारायण मेरी परम गति हैं।'
इस प्रकार स्तुति करके पाण्मासिक भगवान् सूर्यके व्रतको तबतक करना चाहिये, जबतक दक्षिणायन पूर्णरूपसे न आ जाय। उसके पश्चात् यथाशक्ति ब्राह्मणों को भोजन कराकर भगवान् मार्तण्डके सामने पुण्य-कथा और आख्यानका पाठ करना चाहिये। भक्तिपूर्वक यथाशक्ति वाचक और लेखकका पूजन भी करना चाहिये। इस प्रकार जो मनुष्य यह व्रत करता है, उसको इसी जन्ममें सभी पापोंसे मुक्ति मिल जाती है। यदि इस छ: मासके बीच ही व्रतीको मृत्यु हो जाती है तो उसे पूर्ण उपवासका फल प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त उसे भगवान् सूर्यनारायणके चरणद्वय पूजनका फल भी मिलता है।
ब्रह्माजी पुनः बोले-माघ मासके कृष्ण पक्षकी ससमीको सवाप्ति-सप्तमी कहते हैं। इस व्रतसे सभी अभीप्सित कामनाएँ पूर्ण हो जाती है। इस व्रतमें पाखण्डी आदि दुराचारियोंसे वार्तालाप
न करे और एकान-मनसे विनम्र होकर उन्हीं भगवान् सूर्यका पूजन करे।
माघ आदि छः मासोंमें प्रत्येक संक्रान्तिको पारणा मानी गयी है। तदनुसार माष आदि छ; मासोंमें क्रमश: 'मार्तण्ड', 'क', 'चित्रभानु', 'विभावसु', 'भग' और 'हंस'-ये छ: नाम कहे गये हैं। पूरे छ: मासोंमें घृत-दुग्धादि पञ्चगव्य पदार्थों को स्नान और प्राशनके लिये प्रशस्त एवं पापनाशक माना गया है।
इस व्रतमें तेल और क्षार पदार्थ ग्रहण न करे, रात्रिमें जागरण करे। संसारमें सब कुछ देनेवाली यह तिथि सर्वार्थावाप्ति-सप्तमीके नामसे विख्यात है। हे अनघ! अब मैं कल्याण करनेवाली मार्तण्ड- सप्तमीका वर्णन कर रहा हूँ।
यह व्रत पौष मासके शुक्ल पक्षकी सप्तमीको किया जाता है। इसके सम्यक् अनुष्ठानसे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है। इस दिन व्रत रहकर भगवान् सूर्यका 'मार्तण्ड' नामसे पूजन एवं निरन्तर जप करना चाहिये। ब्राह्मणकी भी विशेष श्रद्धा-भक्तिसे पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार पवित्र मनसे सभी मासोंमें उपासना करके प्रत्येक मासमें अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको गौ आदिका दान देना चाहिये। दूसरे वर्षमें उपवासपूर्वक यथाशक्ति सूर्यनारायणके निमित्त गौ आदिका दान देनेसे व्रती साक्षात् भगवान् मार्तण्डके लोकको प्राप्त करता है। इस मार्तण्ड नामक सप्तमीकी नक्षत्रगण उपासना करके ही द्युलोकमें प्रकाशित होते हुए आज भी स्थित दृष्ट होते हैं। (अध्याय १०५-१०९)
Summary of chapter 68 of the Bhavishya Mahā Purana is as follows:
The Kālapuruṣa dāna — the gift of a golden image of cosmic Time — is the most elaborate of the six, requiring the most extensive ritual preparation and the most sustained mantric procedure. Within this section, the ten Daśadānas are also fully described: Dhenu-dāna (cow), Bhūmi-dāna (land), Svarṇa-dāna (gold), Tilaśaila (sesame mountain), Ghṛtaparvata (ghee mountain), Lavaṇācala (salt mountain), Dhānyaśaila (grain mountain), Guḍaparvata (jaggery mountain), Kapāsaśaila (cotton mountain), and Rajatācala (silver mountain). Together these ten are the great accompanying gifts that exponentially enhance any Mahādāna they accompany.