भविष्य महा पुराण

वृषभदानकी महिमा

महाराज युधिष्ठिरने कहा- जनार्दन ! आपकी अमृतमयी वाणी मुझे तृप्ति नही हो रही है, मेरे ह्रदय में एक कौतूहल है। तीनों लोकोंमें यह प्रसिद्धि है कि गौओंका स्वामी-गोपति(वृषभ)

५-भविष्यपुराणमें बार-बार गौओंकी अपार महिमा और गोसहनदान आदिकी विधिका निर्देश यही भूचित करता है कि भारत गो-भक्त देश था और यहाँ दूध-दहीकी सचमुच नदियाँ बहती थी। कथ्यके ब्रजमें गो-दारणकी कथा और वहां की अद्भुत गो-सम्पत्तिको म्या इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। आज जो भारत कंगाल-सा बन गया है तथा रजदान, सुवर्ण शो सहस्र शोदान आदिकी बातें कल्पना-सो लगती हॉगी, वह सब शास्त्रोंकी उपेक्षा और गो-भकि-शून्यताका ही परिणाम है।

२-वाजसने०८।४१ आदिमें बार-बार रोहिणीरूपा गौओंको कामधेनु एवं सुरभिरूपा कहा गया है। रोहिणी गौ प्रायः लाल वर्णकी होती है।

३-गावो भमानतः सन्तु गावों में सन्तु भूत: ।

गाव में सर्वतः सन्तु गवां मध्ये वसाम्यहम्।।

(उत्तरंपर्व १५९ । ३२)

गोविन्दस्वरूप है, अतः प्रभो! ऐसे महनीय  वृषभदानका फल बतानेकी कृपा करें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-राजन् ! सुनिये, यह वृषभदान पवित्रों में पवित्रतम और दानों में सबसे उत्तम दान है। एक स्वस्थ हट-पुष्ट वृषभके दानका फल दस धेनुओंके दानसे अधिक है। हृष्ट-पुष्ट, युवा, सुन्दर, सुशील, रूपर्वान् और ककुद्मान् एक ही शुभ लक्षणसम्पत्र वृषके दानसे उस दान करनेवाले व्यक्तिके सभी कुलॊका उद्धार हो जाता है। पुण्यपर्वके दिन वृषभकी पूँछमें चाँदी लगाकर तथा भलीभाँति उसे अलंकृत कर दे, तदनन्तर दक्षिणाके साथ उस वृषका दान ब्राह्मणको देकर इस प्रकार प्रार्थना करे-

धर्मस्त्वं वृषरूपेण जगदानन्दकारकः ।

अष्टमूर्तरधिष्ठानमतः पाहि सनातन ॥

(उत्तरपर्व १६० ॥ ९)

इस विधिसे वृषभदान करनेवाले व्यक्तिके सात जन्म पहलेके किये गये समस्त पाप इसके प्रभावसे उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं और अन्त में वह व्यक्ति वृषभयुक्त कामचारी दिव्य विमानमें बैठकर स्वर्गलोकमें चला जाता है। महीपते। उस वृषके शरीरमें जितने रोम हैं, उतने हजार वर्षतक वह गोलोकमें पूजित होता है, इसके बाद गोलोकसे अवतीर्ण होकर इस लोकमें उत्तम कुलीन ब्राह्मणके घरमें जन्म लेता है। वह व्यक्ति यज्ञ करनेवाला, महान् तेजस्वी और सभी ब्राह्मणों द्वारा पूजित होता है। महाराज! आपने जो यह पूछा कि यह उत्तम वृषदान किसे करना चाहिये, उसके विषयमें मैं बतला रहा हूँ। जो ब्राह्मण शान्तचित्त, जितेन्द्रिय, वेदवेत्ता, अहिंसक और प्रतिग्रहसे डरनेवाला, मनुष्योंका उद्धार करने में समर्थ तथा गृहस्थ हो। उसे दृढ़, पुष्ट, बलवान्, भारवहन करनेमें समर्थ और सब गुणोंसे युक्त उत्तम वृष प्रदान करना चाहिये। इस प्रकारसे एक वृषभका दान दस धेनुदानसे भी अधिक फलप्रद है। (अध्याय १६०)