भविष्य महा पुराण

सप्त-सप्तमी तथा द्वादश मास-सप्तमी-व्रतोंका वर्णन

शतानीकने कहा-मुने! भगवान् भास्करको अति प्रिय 'जिन अर्कसम्पुटिका आदि सात ससमी-व्रतोंकी आपने पूर्वमें चर्चा की है, उन्हें बतलानेकी कृपा करें।

सुमन्तुजी बोले- महामते ! मैं सात सप्तमियोंका वर्णन कर रहा हूँ, उन्हें सुनिये। पहली सप्तमी अर्कसम्पुटिका नामकी है। दूसरी मरिच-सप्तमी, तीसरी निम्ब-सप्तमी, चौथी फल-सप्तमी, पाँचवीं अनोदना-ससमी, छठी विजय-ससमी तथा सातवीं कामिका नामकी सप्तमी है। इनकी संक्षिस विधि इस प्रकार है-

उत्तरायण या दक्षिणायनमें, शुक्ल पक्षमें, रविवारके दिन ग्रहणमें, पुंल्लिङ्गवाची नक्षत्रमें-इन सप्तमी- व्रतोंको ग्रहण करना चाहिये। व्रतीको जितेन्द्रिय, पवित्रता सम्पन्न और ब्रह्मचारी होकर सूर्यकी अर्चनामें रत्त रहना चाहिये तथा जप-होमादिमें तत्पर रहना चाहिये । व्रतीको चाहिये कि पञ्चमीके दिन एकभुक्त रहकर षष्ठीके दिन जितेन्द्रिय रहे एवं निन्द्य पदार्थोंका भक्षण न करे । अर्क सेवनसे पहली ससमी, मरिचसे दूसरी सप्तमौ तथा निम्बपत्रसे तीसरी सप्तमी व्यतीत करे। फलससमीमें फलोंका भक्षण करना चाहिये। अनोदना-सप्तमीके दिन अन्न भक्षण न करके उपवास करे। विजय-सप्तमोके दिन वायु भक्षण कर उपवास करे। कामिका सप्तमीको भी हविष्य भोजनकर यथाविधि सम्पन्न करना चाहिये। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इन सप्तमी-व्रतोंको करता है, वह सूर्यलोकको प्राप्त कर लेता है।

अर्कसम्पुटिका व्रतसे सात पीढ़ीतक अचल सापति बनी रहती है। मरिच सतमोके अनुमानसे प्रिय पुत्रादिका साथ बना रहता है। निम्बसतमोके पालनसे सभी रोग न हो जाते हैं. इसमें कोई संशय नहीं और फल सामी उतके करनेसे व्रती अनेक पुत्र-पौत्रादिसे युक्त हो जाता है अनोदना-सप्तमीके व्रतसे धन-धान्य, पशु, सुवर्ण, आरोग्य तथा सुख सदा सुलभ रहते हैं। विजय- सप्तमीका व्रत करनेसे शत्रुगण नष्ट हो जाते हैं। कामिका-सप्तमीका विधिवत् अनुष्ठान करनेसे पुत्रकी कामना करनेवाला पुत्र, अर्थकी कामना करनेवाला अर्थ, विद्या-प्राप्तिकी कामना करनेवाला विद्या और राज्यकी कामना करनेवाला राज्य प्राप्त करता है । पुरुष हो या स्त्री इस व्रतको विधिपूर्वक सम्पन्न कर परमगतिको प्राप्त कर लेते हैं। उनके लिये तीनों लोकोंमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है। उनके कुलमें न कोई अंधा होता है, न कुष्ठी, न नपुंसक और न कोई विकलाङ्ग तथा न निर्धन। लोभवश, प्रमादवश या अज्ञानवश यदि व्रत-भङ्ग हो जाय तो तीन दिनतक भोजन न करे और मुण्डन कराकर प्रायश्चित्त करे। पुनः व्रतके नियमोंको ग्रहण करे।

सुमन्तुजीने कहा-राजन्! चैत्रादि बारह मासोंको शुक्ल सप्तमियों में गोमय, यावक, सूखे पते, दूध अथवा भिक्षान्न भक्षण कर या एकभुक्त रहकर उपवास करना चाहिये। भगवान् सूर्यको पूजा कमल- पुष्प, नाना प्रकारके गन्ध, चन्दन, गुग्गुल धूप आदि विविध उपचारोंसे करनी चाहिये तथा इन्हों उपचारोंसे श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी भी पूजा कर उन्हें दक्षिणा देकर संतुष्ट करना चाहिये। इससे व्रतीको अपार दक्षिणावाले यज्ञोंका फल प्राप्त होता है और वह सूर्यलोकमें पृजित होता है। चैत्रादि बारह महीनोमें पूजित होनेवाले भगवान् सूर्यके बारह नाम इस प्रकार हैं-चैत्रमें विष्णु, वैशाखगें अर्यमा, ज्येष्टमें विवस्वान्, आषाढ़में दिवाकर, श्रावणगें पर्जन्य, भाद्रपदों वरुण, आश्विनमें मार्तण्ड, कार्तिकमें भार्गव, मार्गशीर्ष में मित्र, पौषों पूषा, माधों भाग तथा फाल्गुनमें त्वष्टा।(अध्याय २०४-२०१)