भविष्य महा पुराण

नवोदित चन्द्र, गुरु एवं शुक्रको अर्घ्य देनेकी विधि

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! अब मैं नवोदित चन्द्रमाको अर्घ्य देनेकी विधि बता रहा हूँ। प्रतिमास शुक्ल पक्षको द्वितीयाको प्रदोषकालके समय भूमिपर गोबरका एक मण्डल बनाकर उसमें रोहिणीसहित चन्द्रमाको प्रतिमाको स्थापित करके श्वेत चन्दन, धेत पुष्प, अक्षत, धूप, दीप अनेक प्रकार के फल, मेवेश, पहो, वस्त्र तथा दूर्वाङ्कर आदिसे उनका पूजन करे और इस मन्त्रसे चन्द्रमाको अर्ध्य प्रदान करें-

नवो नवोऽसि मासान्ते जायमानः पुनः पुनः।

आप्यायस्व स मे त्वेवं सोमराज नमो नमः।।

(उत्तरमा १११।६)

जो व्यक्ति इस विधिसे चन्द्रमाको प्रतिमास अर्घ्य देता है, उसे पुत्र, पौत्र, धन, पशु, आरोग्य

* इस व्रतका उल्लेख मत्स्यपुराण अध्याय ६१ आदिमें तथा इनकी कशा, इनका अनेक आश्रमों में निवास और अगम्त्यायॆपर ऋग्वेद १।१९1 से लेकर अपि, गरुड, बृहद्धर्म आदि पुरायतको अपार सामग्री भी पड़ी है। हेमाद्रि, गोपाल तथा स्नाकर आदिने भी इन्हें अपने व्रत-निबन्धों में कई पृष्ठों में संग्रहीत किया है।

आदिकी प्राप्ति होती है तथा सौ वर्षतक सुख भोगकर अन्तमें वह चन्द्रलोकको और फिर मोक्षको प्राप्त करता है।

राजन्! शुक्रके दोषकी निवृत्ति के लिये यात्राके आरम्भमें, गमनकालमें और शुक्रोदयके समय शुक्रदेवकी पूजा अवश्य करनी चाहिये। शुक्रकी पूजन-विधिको मैं बता रहा हूँ, उसे आप ध्यानपूर्वक सुनें-

सुवर्ण, चाँदी अथवा कांस्यके पात्र में मोतीयुक्त चाँदीकी शुक्रकी मूर्तिको पुष्प तथा श्वेत वस्त्रसे अलंकृतकर श्वेत चावलोपर स्थापित करे। षोडशोपचार अथवा पञ्चोपचारसे शुक्रदेवकी पूजा करके इस मन्त्रसे उन्हें अर्ध्य प्रदान करे-

नमस्ते सर्वदेवेश नमस्ते भृगुनन्दन।

कवे सर्वार्थसिद्धयर्थ गृहाणाऱ्या नमोऽस्तु ते ।।

(उत्तरपर्व १२०1४)

तदनन्तर प्रणामपूर्वक मूर्तिको विसर्जित कर सवत्सा गौके साथ वह प्रतिमा तथा अन्य सभी सामग्री ब्राह्मणको दे दे। इस विधिसे शुक्रदेवकी पूजा करनेसे सभी मन:कामनाओंकी पूर्ति हो जाती है और फसल अच्छी होती है।

इसी प्रकार सुवर्ण आदिके पात्रमें सुवर्णकी बृहस्पतिकी मूर्ति स्थापित करे। प्रतिमाको सर्षपयुक्त जल तथा पञ्चगव्यसे स्नान कराकर पीत पुष्प और पौत वस्त्रोंसे अलंकृत करे। अनन्तर विविध उपचारोंसे उनका पूजन कर अर्ध्य प्रदान कर घीसे हवन करे। सवत्सा गौके साथ वह बृहस्पतिकी मूर्ति दक्षिणासहित ब्राह्मणको दान कर दे। यात्राकाल, बृहस्पतिकी संक्रान्ति और उनके उदयके समय जो इनका पूजन करता है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। शुक्र तथा बृहस्पतिका इस विधिसे पूजन करनेसे यूजकके घरमें उनका दोष नहीं होता (अध्याय ११५-१२०)