भविष्य महा पुराण

सौर-धर्ममें शुद्धि-प्रकरण

भगवान् भास्करने कहा-खगाधिप ! ब्राह्मणोंको नित्य पवित्र तथा मधुरभाषी होना चाहिये, उन्हें प्रतिदिन स्नानादिसे पवित्र हो चन्दनादि सुगन्धित द्रव्योंको धारणकर देवताओंका पूजन आदि करना चाहिये। सूर्यको निष्प्रयोजन नहीं देखना चाहिये और नग्न स्त्रीको भी नहीं देखना चाहिये। मैथुनसे दूर रहना चाहिये। जलमें मूत्र तथा विष्ठाका परित्याग नहीं करना चाहिये। शास्त्रोक्त नियमोंके अनुसार कर्म करने चाहिये। शास्त्र-वर्णित कर्मानुष्ठानके अतिरिक्त कोई भी व्रतादि नहीं करने चाहिये।

खगाधिपते ! अभक्ष्य-भक्षण सभी वर्गों के लिये वर्जित है। द्रव्यको शुद्धि होनेपर ही कर्मकी शुद्धि होती है अन्यथा कर्मक फलको प्राप्तिमें संशय हो बना रहता है। जातिसे दुष्ट, क्रियासे दुष्ट कालसे दुष्ट, संसर्गसे दुए आश्रयसे दुरा तथा सहल्लेख (स्वभावतः निन्दित एवं अभक्ष्य) पदार्थ अथवा दूषित हदयके एवं कपटी जाति के स्वभावों परिवानग नहीं होता। लहसून पाजायज कुकुरमुत्ता, बैंगन (सफेद) तथा मूली (लाल) आदि जात्या दूषित हैं। इनका भक्षण नहीं करना चाहिये। जो वस्तु क्रियाके द्वारा दूषित हो गयी हो अथवा पतितोंके संसर्गसे दूषित हो गयी हो, उसका प्रयोग न करे । अधिक समयतक रखा गया पदार्थ कालदूषित कहलाता है, वह हानिकर होता है, पर दही तथा मधु आदि पदार्थ कालदूषित नहीं होते। सुरा, लहसुन तथा सात दिनके अंदर व्यायी हुई गायके दूधसे युक्त पदार्थ और कुत्तेद्वारा स्पर्श किये गये पदार्थ संसर्ग-दुए कहे जाते हैं। इन पदार्थोका परित्याग करना चाहिये। शूद्रसे तथा विकलाङ्ग आदिसे स्पृष्ट पदार्थ आश्रय दृषित कहा जाता है। जिस वस्तुके भक्षण करने में मनमें स्वभावतः घृणा उत्पन्न हो जाती है, जैसे पुरीप (विष्ठा) के प्रति स्वभावत: घृणा उत्पन्न होती है उसे ग्रहण नहीं करना चाहिये। वह माल्लेख दोषयुक्त पदार्थ कहा गया है। खीर, दम, पाकादिका माण शास्त्रोक विधिअनुसार ही करना चाहिये।

सपिण्डमें दस दिन, बारह दिन अथवा पंद्रह दिन और एक मासमें प्रेत-शुद्धि हो जाती है। सूतकाशौच तथा मरणाशौचमें दस दिनके भीतर किसी व्यक्तिके यहाँ भोजन नहीं करना चाहिये। दशगात्र एवं एकादशाहके बीत जानेपर बारहवें दिन स्नान करनेसे शुद्धि हो जाती है। संवत्सर पूर्ण हो जानेपर स्नान-मात्रसे ही शुद्धि हो जाती है। सपिण्डमें जन्म और मृत्यु होनेपर अशौच लगता है। दाँत आनेतकके बालकको मृत्यु हो जानेपर सद्यः शुद्धि हो जाती है। चूडाकरणके पहले बालककी मृत्यु हो जानेपर एक दिन-रातकी अशुद्धि होती है तथा चूडाकरणके बाद और यज्ञोपवीत लेनेके पहले मृत्यु होनेपर त्रिरात्र अशुद्धि होती है और इसके अनन्तर दशरात्रकी अशुद्धि होती है। गर्भस्राव हो जानेपर तीन रात्रिके पश्चात् जलसे स्नान करनेके बाद शुद्धि होती है। असपिण्डी (एवं सगोत्री)-की मृत्यु होनेपर तीन अहोरात्रके बाद शुद्धि होती है। यदि केवल शव- यात्रा करता है तो स्नानमात्रसे शुद्धि हो जाती है।

द्रव्यकी शुद्धि आगमें तपाने, मिट्टी और जलसे धोने तथा मल हटाने, प्रक्षालन करने, स्पर्श और प्रोक्षण करनेसे होती है। द्रव्य-शुद्धिके पक्षात् स्नान करनेसे शुद्धि होती है। प्रात:कालका स्नान नित्य-स्त्रान है, ग्रहण में स्नान करना काम्य- सान है तथा क्षौर और शौचादिके पश्चात् जो स्नान किया जाता है वह नैमित्तिक स्नान है, इससे पापादिकी निवृत्ति होती है। (अध्याय १८६)