भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-महाराज! अब इसके बाद मैं सभी पापोंके नाशक एवं अत्यन्त श्रेष्ठ विश्वचक्रदानको विधि बतला रहा हूँ। इसे प्रतप्त सुवर्णके द्वारा निर्मित कराना चाहिये। शक्तिके अनुसार चाँदी तथा ताँबेका भी बनाया जा सकता है। यह विश्वचन एक सहल पल सुवर्णका उत्तम, पाँच सौ पलका मध्यम और ढाई
सौ पलका कनिष्ठ कहा गया है। अल्प वित्तवाला मनुष्य बीस पलसे ऊपरका बना हुआ विश्वचक् न कर सकता है। यह चक्र सोलह अरों तथा आठ नेमियोंसे युक्त घूमता हुआ होना चाहिये। उसके नाभिकमलपर योगारूढ चतुर्भुज भगवान् विष्णुको स्थापित करना चाहिये। उनके बगलमें शत और चक्र हों तथा आठ देवियों उन्हें चारों
ओरसे घेरे हुए हों। उसके दूसरे आवरणमें उसी प्रकार जलशायी, अत्रि, भृगु, वसिष्ठ, ब्रह्मा, कश्यप, मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्किको, तीसरे आवरणमें मनुओं तथा वसुओसहित गौरीको, चौथे आवरणमें बारहों आदित्यों तथा चारों वेदोंको, पाँचवें आवरणमें पाँचों महाभूतों तथा ग्यारहों रुद्रोंको, छठे आवरणमें आठों लोकपालों तथा दिग्गजोंको, सातवें आवरणमें सभी प्रकारके माङ्गलिक अस्त्रोंको तथा आठवें आवरणमें थोड़े-थोड़े अन्तरपर देवताओंको स्थापित करे। दस हाथका एक मण्डप बनाकर उसे वस्त्र, पताका,सतोरण आदिसे अलंकृत करे। मण्डपमें हवनके लिये कुण्डका निर्माण करे। चार हाथकी एक वेदी बनाकर उसके ऊपर कृष्णमृगचर्मपर रखे गये तिलके ऊपर चिपचक्रको स्थापित करना चाहिये।
फिर अठारह प्रकारके अन्न, लवण आदि सभी रस, जलसे भरे हुए आठ माङ्गलिक कलश, विविध प्रकारके वस्त्र, पुष्पमाला, फल, रत्न तथा पँचरंगा वितान -इन सबको भी यथास्थान रखना चाहिये। इसके बाद अधिवासन फिर हवन करे। हवनमें चार चारणिक श्रेष्ठ ब्राह्मण हों। विश्वचक्रमें जिन देवताओं को प्रतिष्ठा-पूजा की गयी हो, उनके लिये हवन करना चाहिये। इससे सम्पूर्ण उपद्रवोंको शान्ति होती है। तदनन्तर माङ्गलिक शब्दों के साथ गृहस्थ यजमान स्नान करके श्वेत वस्त्र धारणकर हवन एवं अधिवासनके उपरान्त अअलिमें पुष्प ग्रहणकर तीन बार प्रदक्षिणा करे और इस मन्त्रका उच्चारण करे-
नमो विश्वम्भरायेति विशचनात्मने नमः ।
परमानन्दरूपी स्वं पाहि नः पापकर्दमात्॥
तेजोमयमिदं बस्मात् सदा पश्यसि सूरयः ।
अपि तत्वं गुणातीत विण नमाम्यहम्॥
पासुदेवे स्थित चार्क तस्य मध्ये तु माषणः ।
अन्योन्याधारणपेण प्रणमामि स्विताविह॥
विश्वचक्रमिदं यस्मात् सर्वपापहर हो।
आयुधं चापिवासम्म तस्माच्छान्तिं ददातु मे ॥
(उत्तरपर्ष १९०।१८-२०)
'विश्वम्भरको नमस्कार है। विश्वचक्रात्माको प्रणाम है। आप परमानन्दस्वरूप हैं, अत: पापरूप कीचड़से हमारी रक्षा कीजिये। चूँकि इस तत्त्व-स्वरूप, गुणातीत, तेजोमय विश्वचक्रको विद्वान् लोग सदा अपने हृदयमें देखते हैं, अत: मैं आपको नमस्कार करता हूँ। यह विश्वचक्र वासुदेव में स्थित है और माधव इस चक्रके मध्यभागमें स्थित हैं, इस प्रकार आप दोनों अन्योन्याधाररूपसे स्थित हों, आपको मैं प्रणाम करता हूँ । चूँकि भगवान् विष्णुका यह विश्वचक्र सम्पूर्ण पातकोंका विनाश करनेवाला, भगवान् का आयुध तथा उनका निवासस्वरूप भी है, अतः यह मुझे शान्ति प्रदान करे।'
इस प्रकार आमन्त्रित करके जो मनुष्य न मत्सररहित हो इस विश्वचक्रका दान करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकमें पूजित होता है तथा वैकुण्ठलोकको प्राप्तकर चार भुजाओंसे युक्त और अविनाशी हो जाता है एव अप्सराओंके समूहद्वारा सेवित होकर तीन सौ कल्पोंतक वहाँ निवास करता है। जो व्यक्ति इस विश्वचक्रका निर्माणकर इसे प्रतिदिन प्रणाम करता है, उसकी आयु बढ़ती है और नित्य लक्ष्मीकी वृद्धि होती है। इस प्रकार जो व्यक्ति सुवर्णनिर्मित सोलह अरोंसे युक्त तथा समस्त जगत् एवं देवताओंके अधिष्ठानरूप इस चक्रका
दान करता है, वह विष्णु-भवनको प्राप्त होता है है तथा उसे सिद्धगण सिर झुकाकर नमस्कार करते हैं। वह पुरुष निष्पाप होकर शुभदर्शन केशक्की भौति मनोरम स्वरूप धारण करता है और बारंबार जन्म-मरणके भयसे भी छूट जाता है। (अध्याय १९०)