सूतजी बोले-ब्राहाणो! शास्त्रविहित यज्ञादि कार्य दक्षिणारहित एवं परिमाणविहीन कभी नहीं करना चाहिये। ऐसा यज्ञ कभी सफल नहीं होता। जिस यज्ञका जो माप बतलाया गया है, उसीके अनुसार विधान करना चाहिये। मानरहित बजा करनेवाले व्यक्ति नरको जाते है। आचार्य, होता, ब्रहा तथा जितने भी सहयोगी हों. वे सभी अस्सी वराटों (कौड़ियों) का एक पण होता है। सोलह पोंका एका पुराण कहा जाता है, सात पुराणोंकी एक रजतमुद्रा तथा आत रजतमुद्राओंकी एक स्वर्णमुद्रा कही जाती है, जो यज्ञ आदिमें दक्षिणा दी जाती है। बड़े उद्यानोंकी प्रतिष्ठा यजमें दो स्वर्णमुद्राएँ, कृपोत्सर्गम आधी स्वर्णमुद्रा (निष्क), तुलसी एवं आमलकी-यागमें एक स्वर्णमुद्रा (निष्क) दक्षिणारूपमें विहित है। लक्ष-होममें चार स्वर्ण-मुद्रा, कोटि-होम, देव-प्रतिष्ठा तथा प्रासादके उत्सर्गमें अठारह स्वर्ण-मुद्राएँ दक्षिणारूपमें देनेका विधान है। तडाग तथा पुष्करिणी-यागमें आधी-आधी स्वर्णमुद्रा देनी चाहिये। महादान, दीक्षा, वृषोत्सर्ग तथा गया-श्राद्धमें अपने विभवके अनुसार दक्षिणा देनी चाहिये। महाभारतके श्रवणमें अस्सी रत्ती तथा ग्रहयाग, प्रतिष्ठाकर्म, लक्षहोम, अयुतहोम तथा कोटिहोममें सौ-सौ रत्ती सुवर्ण देना चाहिये। इसी प्रकार शास्त्रोंमें निर्दिष्ट सत्पात्र व्यक्तिको ही दान देना चाहिये, अपात्रको नहीं। यज्ञ, होममें द्रव्य, काष्ठ, घृत आदिके लिये शास्त्र-निर्दिष्ट विधिका ही अनुसरण करना चाहिये। यज्ञ, दान तथा व्रतादि काँमें दक्षिणा (तत्काल) देनी चाहिये। बिना दक्षिणाके ये कार्य नहीं करने चाहिये। ब्राह्मणोंका जब वरण किया जाय तब उन्हें रज, सुवर्ण, चाँदी आदि दक्षिणारूपमें देना चाहिये। वस्त्र एवं भूमि-दान भी विहित हैं। अन्यान्य दानों एवं यज्ञोंमें दक्षिणा एवं द्रव्योंका अलग अलग विधान है। विधानके अनुसार नियत दक्षिणा देने में असमर्थ होनेपर यज्ञ कार्यकी सिद्धिके लिये देव-प्रतिमा, पुस्तक, रन, गाय, धान्य, तिल, रुद्राक्ष, फल एवं पुष्प आदि भी दिये जा सकते हैं। सूतजी पुनः बोले-ब्राहाणो। अब मैं पूर्णपात्रका स्वरूप बतलाता हूँ। उसे सुनें। काम्य-होममें एक मुष्टिके पूर्णपात्रका विधान है। आठ मुट्ठी अत्रको एक कुचिका कहते हैं। इसी प्रमाणसे पूर्णपात्रओंका निर्माण करना चाहिये। उन पात्रों को अलग कर द्वार प्रदेश में स्थापित करे।
कुण्ड और कुलमा विचिके पारिश्रयिक इस प्रकार है-चौकोर कुण्डके लिये रोप्यादि सर्वतोभदकुण्डके लिये दो रौप्य, महासिंहासनके लिये पाँच रौप्य, सहस्सार तथा मेरुपृष्ठकुण्डके लिये एक बैल तथा चार रौप्य, महाकुण्डके निर्माणमें द्विगुणित स्वर्णपाद, वृत्तकुण्डके लिये एक रौप्य, पद्मकुण्डके लिये वृषभ, अर्धचन्द्रकुण्डके लिये एक रौप्य, योनिकुण्डके निर्माणमें एक धेनु तथा चार माशा स्वर्ण, शैवयागमें तथा उद्यापनमें एक माशा स्वर्ण, इष्टिकाकरणमें प्रतिदिन दो पण पारिश्रमिक देना चाहिये। खण्ड-कुण्ड-(अर्ध गोलाकार-) निर्माताको दस वराट (एक वराट बराबर अस्सी कौड़ी), इससे बड़े कुण्डके निर्माणमें एक काकिणी (माशेका चौथाई भाग), सात हाथके कुण्ड-निर्माणमें एक पण, बृहत्कूपके निर्माणमें प्रतिदिन दो पण, गृह निर्माणमें प्रतिदिन एक रत्ती सोना, कोष्ठ बनवाना हो तो आधा पण, रंगसे रँगानेमें एक पण, वृक्षोंके रोपणमें प्रतिदिन डेढ़ पण पारिश्रमिक देना चाहिये। इसी तरह पृथक कर्मों में अनेक रीतिसे पारिश्रमिकका विधान किया गया है। यदि नाचित सिरसे मुण्डन करे तो उसे दस काकिणो देनी चाहिये स्त्रियोंके नख आदिके रजनके लिये काकिणीके साध पण भी देना चाहिये। धानके रोपयामें एक दिनका एक पण पारिश्रमिक होता है । तैल और क्षारसे वर्जित वस्त्रकी धुलाईके लिये एक पण पारिश्रमिक देना चाहिये। इसमें वस्त्रकी लाबाईके अनुसार कुछ वृद्धि भी की जा सकती है। मिट्टीके खोदनेमें, कुदाल चलाने में, इक्षुदण्डके निष्पीडन तथा सहस पुष्प चयनमें दस-दस काकिणी पारिश्रमिक देना चाहिये। छोटी माला बनाने में एक काकिणी, बड़ी माला बनाने में दो काकिणी देना चाहिये। दीपकका आधार काँसे या पीतलका होना चाहिये। इन दोनों के अभावमें मिट्टीका भी आधार बनाया जा सकता है*।
*भविष्यपुराणका यह अध्याय इतिहासकी दृष्टिसे बड़े महत्वका है। केवल कौटिल्य अर्थशास्त्र और शुक्रनीतिसे ही भारतकी प्राचीन
सूतजी पुनः बोले-ब्राह्मणो। अब मैं कलशोंके विषयमें निश्चित मत प्रकट करता हूँ, जिसका उपयोग करनेसे मङ्गल होता है और यात्रामें सिद्धि प्राप्त होती है। कलशमें सात अङ्ग अथवा पाँच अङ्ग होते हैं। कलशमें केवल जल भरनेसे ही सिद्धि नहीं होती, इसमें अक्षत और पुष्पोंसे देवताओंका आवाहन कर उनका पूजन भी. करना चाहिये-ऐसा न करनेसे पूजन निष्फल हो जाता है। वट, अश्वत्थ, धव-वृक्ष और बिल्व-वृक्षके पल्लवोंको कलशके ऊपर रखे। कलश सोना, चाँदी, ताँबा या मृत्तिकाके बनाये जाते हैं। कलशका निर्माण अपनी सामर्थ्यके अनुसार करे। कलश अभेद्य, निश्छिद्र, नवीन, सुन्दर एवं जलसे पूरित होना चाहिये। कलशके निर्माणके विषयमें भी निश्चित प्रमाण बतलाया गया है। बिना मानके बना हुआ कलश उपयुक्त नहीं माना गया है। जहाँ देवताओंका आवाहन-पूजन किया जाय, उन्हींकी संनिधिमें कलशकी स्थापना करनी चाहिये। व्यतिक्रम करनेपर फलका अपहरण राक्षस कर लेते हैं। स्वस्तिक बनाकर उसके ऊपर निर्दिष्ट विधिसे कलश स्थापित कर वरुणादि देवताओंका आवाहन करके उनका पूजन करना चाहिये। (अध्याय ३-५)