ब्रह्माजीने कहा-हे वासुदेव! जो मनुष्य मिट्टी, लकड़ी अथवा पत्थरसे भगवान् सूर्यके मन्दिरका निर्माण करवाता है, वह प्रतिदिन किये गये यज्ञके फलको प्राप्त करता है। भगवान् सूर्यनारायणका मन्दिर बनवानेपर वह अपने कुलकी सौ आगे और सौ पीछेकी पीढ़ियोंको सूर्यलोक प्राप्त करा देता है। सूर्यदेवके मन्दिरका निर्माण कार्य प्रारम्भ करते ही सात जन्मोंमें किया गया जो थोड़ा अथवा बहुत पाप है, वह नष्ट हो जाता है। मन्दिरमें सूर्यकी मूर्तिको स्थापित कर मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है और उसे दोष फलकी प्राप्ति नहीं होती तथा अपने आगे और पीछेके कुलोंका उद्धार कर देता है। इस विषयमें प्रजाओंको अनुशासित करनेवाले यमने पाशदण्डसे युक्त अपने किंकरोंसे पहले ही कहा है कि 'मेरे इस आदेशका यथोचित पालन करते है हुए तुमलोग संसारमें विचरण करो, कोई भी प्राणी तुमलोगोंकी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं कर सकेगा। संसारके मूलभूत भगवान् सूर्यकी उपासना करनेवाले है, लोगोंको तुमलोग छोड़ देना, क्योंकि उनके लिये यहाँपर स्थान नहीं है। संसारमें जो सूर्यभक्त हैं और जिनका हृदय उन्हीं में लगा हुआ है, ऐसे लोग जो सूर्यको सदा पूजा किया करते हैं, उन्हें दूरसे ही छोड़ देना। बैठते-सोते, चलते-उठते और गिरते पड़ते जो मनुष्य भगवान् सूर्यदेवका नाम संकीर्तन करता है, वह भी हमारे लिये बहुत दूरसे ही त्याज्य है। जो भगवान् भास्करके लिये नित्य-नैमित्तिक यज करते हैं, उन्हें तुमलोग दृष्टि उठाकर भी मत देखना। यदि तुमलोग ऐसा करोगे तो तुमलोगीकी गति रुक जायगी। जो पुष्प-धूप-सुगन्ध और सुन्दर-सुन्दर वस्त्रोंके द्वारा उनकी पूजा करते है, उन्हें भी तुमलोग मत पकड़ना, क्योंकि वे मेरे पिताके मित्र या आश्रितजन हैं। सूर्यनारायणके मन्दिरमें उपलेपन तथा सफाई करनेवाले जो लोग हैं, उनके भी कुलकी तीन पीढ़ियोंको छोड़ देना। जिसने सूर्य-मन्दिरका निर्माण कराया है, उसके कुलमें उत्पन्न हुआ पुरुष भी तुमलोगोंके द्वारा बुरी दृष्टि से देखने योग्य नहीं है। जिन भगवद्भक्तोंने मेरे पिताकी सुन्दर अर्चना की है, उन मनुष्योंको तथा उनके सूर्यकी कुलको भी तुम सदा दूरसे ही त्याग देना।'
महात्मा धर्मराज यमके द्वारा ऐसा आदेश दिये जानेपर भी एक बार (भूलसे) यम-किंकर उनके आदेशका उल्लङ्घन करके राजा सत्राजित्के पास चले गये। परंतु उस सूर्यभक्त सत्राजित्के तेजसे वे सभी यमके सेवक मूञ्छित होकर पृथ्वीपर वैसे ही गिर पड़े, जैसे मूच्छित पक्षी पर्वतपरसे भूमिपर गिर पड़ता है। इस प्रकार जो भक्त भगवान् सूर्यके मन्दिरका निर्माण करता कराता है, वह समस्त यज्ञोंको सम्पन्न कर लेता है, क्योंकि भगवान् सूर्य स्वयं ही सम्पूर्ण यज्ञमय हैं।
ब्रह्माजी बोले-सूर्यको प्रतिष्ठित प्रतिमाको घीसे स्नान कराता है, वह अपनी सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। कृष्णपक्षकी अष्टमीके दिन सूर्यभगवान्को जो घीसे स्नान कराता है, उसे सभी पापोंसे छुटकारा प्राप्त हो जाता है। सप्तमी अथवा षष्टीके दिन सूर्यनारायणको गायके घीसे स्रान कराने से सभी पातक दूर हो जाते हैं। संध्याकालमें घीसे स्रान कराने पर तो ज्ञात-अज्ञात सम्पूर्ण पाप दूर हो जाते हैं। सूर्यनारायण सर्वयज्ञरुप हैं और समस्त हव्य-पदार्थोंमें घी ही उत्तम पदार्थ है, इसलिये उन दोनोंका संगम होते ही सभी पाप
नष्ट हो जाते हैं। सूर्यको दूषसे स्नान करानेवाला मनुष्य सात जन्मोतक सुखी, रोगरहित और रूपवान् होता है और अन्तमें दिव्यलोकमें निवास करता है। जैसे दूष स्वत्ता होता है और रोगादिसे मुक्ति देनेवाला है, वैसे ही दूधसे स्नान करानेपर अज्ञान हटकर निर्मल ज्ञान प्राप्त होता है। दूधके स्रानसे
भगवान् सूर्यनारायण प्रसन्न होकर सभी ग्रहोंको अनुकूल करते हैं तथा सभी लोगोंको पुष्टि और प्रीति प्रदान करते हैं। घी और दूध से तिमिर-विनाशक देवेश सूर्यदेवको स्रान करानेपर उनका दृष्टिमात्र पड़ते ही मनुष्य सबका प्रिय हो जाता है।
Summary of chapter 205 of the Bhavishya Mahā Purana is as follows:
The Uttara Parva concludes with Bhagavān Kṛṣṇa's response to Yudhiṣṭhira's deepest question: what single foundation underlies all the different devatās, vratas, and dānas taught across this Parva? Kṛṣṇa declares: sadācāra — the code of right daily conduct — is that foundation. All vratas and dānas bear fruit only for those who practice sadācāra; without it, even Vedic study with all six aṅgas cannot purify the soul. Kṛṣṇa then gives the complete teaching of sadācāra: the pre-dawn rising, the sandhyā-vandana, the daily ahnika, and the evening prayers. The Parva's closing declaration — *Ācārahīnaṃ na punanti vedāḥ yady apy adhītāḥ sahāṣaḍbhir aṅgaiḥ* — stands as the ultimate statement of the relationship between ritual, ethical life, and genuine liberation.