सूतजी बोले-भृगुश्रेष्ठ शौनक ! बलस्पतिो देवराज इन्द्ररी वसुदेवताओका जो माहात्म्य कहा था, उसे कहता है, आप सुने। पेवस्था मन्वन्तरके आदि सत्ययुगमें विनामुनिका इल्बला नामको पालो थी। वह सता पाथिवा शिवको आरधना करती थी। इसी समय दीक्षितला उत्पन्न पक्षशमा नामक एक द्विज यक्षिणी-पूजनों रत था। वह धूर्त अपने मित्रकी पुत्रवधूके साथ दुःसम्बन्ध रखने कारण कुष्ठरोग ग्रस्त हो गया। उस कुष्ठी द्विजको त्यागकर मन्त्रवत्सला यक्षिणीदेवी कैलासपर शिवलोकको चली गयी। क्षुधासे व्याकुल यक्षशर्मा उत्तम शिवरात्रिके दिन शिवके दर्शन, पूजन और उपदेशसे संतुष्ट हुआ। प्रात:काल होनेपर उस द्विजने पारण किया और वह कुष्ठी उसी शिवमन्दिरमें मर गया । उस पुण्यके प्रभावसे वह कर्णाटकदेशमें राजा हुआ। राजराजके नामसे प्रसिद्ध वह मण्डलीक राजा हुआ। प्रतिदिन उस महाबली राजाने शिवार्चन आदि मङ्गलकार्य ब्राह्मणोंसे कराये और सौ वर्षतक पृथ्वीपर राज्य किया। राजाने अपने श्रेष्ठ पुत्रको राज्याधिकार देकर काशी आकर भगवान् शिवको संतुष्ट किया। तीन वर्ष बीतनेघर ज्योतिलिङ्गसे महादेव प्रकट हुए। वे शिव राजराजेश्वरके नामसे प्रसिद्ध हुए। भगवान् शिवद्वारा पवित्र वह राजा प्राणोंका परित्याग कर इल्वलाके गर्भमें आकर घोर अन्धकारसे आच्छन्न रात्रिको कुत्सित वेलामें पुत्रके रूपमें उत्पन्न हुआ। अतः वह कुबेर नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह शुभ लक्षणोंसे सम्पत्र था। उस बालकने तपके द्वारा परमेष्ठी (ब्रह्मा)-को प्रसन्न किया। भगवान् ब्रह्माने सुवर्णमय रमणीय सुन्दर लङ्कापुरीका निर्माण कराकर उसे दे दिया। कुबेर तीन करोड़ यक्षोंका स्वामी यक्षराके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसके आदेश में निवास करनेवाले अनेक रूपवाले किन्नर थे। गुह्यकोंके स्वामी स्वयं भगवान् कुबेर थे। रावणको जब यह पता लगा कि लङ्का आरम्भसे राक्षसों को पुरी रही है और कुबेरने उसपर बलात् अधिकार जमाकर अपने सेवक पक्षोंको बसाया है तो उन्हें वहाँसे मारकर भगा दिया और स्वयं अपनी राजधानी बनाकर वहाँका राजा हो गया। इससे रखी हो कुबेरने दुपाशक करको राक्ष्ण तो भगवान हरने कुबेरके साथ सुन्दर मैत्री कर ली और विश्वकर्माने अलका नामकी पुरीकी रचना की। सज्जनोंको मङ्गल देनेवाले कुबेरने उसे सहर्ष प्राप्त किया।
यह सुनकर संसारको रुलानेवाला राक्षसराज रावण कैलास पर्वतपर आकर भगवान् शंकरकी तपस्या करने लगा, तब अहंकारदेवता भगवान् रुद्र प्रसन्न होकर जैसे कुबेरके मित्र थे, वैसे ही रावणके भी मित्र हो गये और एक-एक सिरसे करोड़ों सिर उत्पन्न होनेका उसे वरदान दे दिया। देवाधिदेवके प्रसादसे उसका शरीर वज्र हो गया। इस प्रकार वह रावण वरदानके कारण भयंकर बली और उद्दण्ड हो गया। उस राक्षसद्वारा सम्पूर्ण विश्व दु:खसे संतप्त हो गया। यज्ञके अभावमें सभी देवता, प्राणी भूखे रहने लगे। ब्रह्माको आगेकर क्षीरसागरमें जाकर दुःखी सभी देवगणोंने एकत्र हो परमेश्वरको स्तुतियोंसे संतुष्ट किया। तब सगुण-निर्गुण हरिने प्रसन्न होकर देवताओंसे कहा-'देवगणो! मेरी आज्ञासे आपलोग सनातनी विष्णुमायाको शरणमें जाकर जगत् के कल्याणके लिये प्रार्थना करें।
यह सुनकर देवताओंने परा प्रकृतिको स्तुतियोंसे संतुष्ट किया। ब्रह्म-ज्योतिर्मयी शिवादेवीने प्रसन्न होकर अपने शरीरको दो रूपोंमें विभक्त किया और सीता-रामके रूपमें पृथ्वीपर आयीं। परा प्रकृति सीता मङ्गलदायिनी हुई। जगत्-कारणभूता वे सीता भूमिसे उत्पन्न हुई, अयोनिजा होनेपर भी वे सबकी माता है। सहस्र 'राम' नामके जपके समान सीताके एक बार नाम लेनेका फल जानना चाहिये । परात्पर भगवान् रामने रावण आदि राक्षसोंको मारा तथा अपनी पवित्र कीर्तिको लोकमें प्रतिष्ठित कर पुष्पक विमान कुबेरको समर्पित कर दिया। ग्यारह हजार वर्षतक राज्यकर वे परम धामको चले गये।
सूतजीने कहा- शौनक! यह सुनकर प्रथम
*सहस्रं रामरामेति जपितं वेन धीमता। सीताबाम्ना फलं द्वेर्ष च तत्समम् ॥
(प्रतिसर्गपर्व।। १५।५७)
वसुदेवता कुबेर अपने अंशसे पृथ्वीपर धरदत्त वैश्यके पुत्र होकर त्रिलोचन नामसे मथुरामें उत्पन्न हुए। सभी द्रव्योंको हर्षपूर्वक तीर्थोंमें खर्चकर काशीपुरीमें आकर वैष्णव रामानन्दको नमस्कारकर त्रिलोचन उनके शिष्य हो गये। गुरुकी आज्ञासे वे पुनः अपने घरपर आकर रामभक्तिपरायण होकर साधु-सेवामें तत्पर हो गये। भगवान् राम उनके घरमें सभी अभीष्ट फलको देनेवाले दासके रुपमें तेरह मासतक स्थित रहे। वे उनके घरमें मणि, रत्न, विविध वस्त्र, विविध व्यञ्जन देते थे, जिसे भक्त त्रिलोचन स्वयं ब्राह्मणों, वैष्णवों और यतियोंको भी सभी मनोवाञ्छित वस्तु प्रदान करते थे। भगवान् श्रीरामने त्रिलोचनसे कहा-'वत्स! मैं राम हूँ, दास नहीं। मैंने तुम्हारी भक्तिसे प्रसन्न होकर तुम्हारे घरमें दासके रूपमें निवास किया है। हे वैश्य! आजसे मैं तुम्हारे हृदयमें निवास करूँगा।' यह कहकर वे अन्तर्हित हो गये। यह सुनकर वह वैश्य बहुत प्रसन्न हुआ। उसने स्त्री-पुत्र सभीका परित्याग कर दिया और वह परम वैराग्यके साथ श्रीरामके ध्यानमें तत्पर रहकर सरयूतटपर निवास करने लगा। (अध्याय १५)