भविष्य महा पुराण

अव्यङ्गका लक्षण और उसका माहात्म्य

एक बार साम्बने महर्षि व्याससे मगद्वारा धारण किये जानेवाले अव्यङ्गके* विषयमें जिज्ञासा को

व्यासजीने कहा-साम्ब ! मैं तुम्हें अव्यङ्गके विषयगे बताता हूँ, उसे सुनो। देवता, ऋषि, नाग, 'गभर्व, अप्सरा, एश और राक्षस ऋतु क्रमसे भगवान सूर्य के रथके साथ रहते हैं। यह रथ वासुकि नामक नागसे बंधा रहता है। किसी सामय वासुधा गालका कंकरभुल) उत्तरकर पढ़। नागराज वासुकि के शरीरसे उत्पन्न उस निर्मोक(केंचुल)- को भगवान् सर्यने सुवर्ण और

रत्त्रोंसे अलंकृतकर अपने मध्य भागमें धारण कर लिया। इसीलिये भगवान् सूर्यके भक्त अपने देवकी प्रसन्नता के लिये अव्यद धारण करते हैं। उसके धारण करनेसे भोजक पवित्र हो जाते हैं और उनपर सूर्यभगवानका अनुग्रह भी होता है।

इस अव्यङ्गको सर्पके केंचुलकी तरह मध्यमें पोला अर्थात् खाली रखना चाहिये। यह एक वर्गका होना चाहिये। कपासवे सुतसे बना अव्यङ्ग दो सौ अङ्गलका उत्तम, एक सौ बीस अङ्गुलका मध्यम और एक सौ आठ अङ्गुलका

*अहेस्ङ्गत् समुत्पत्रो ह्मव्यङ्गस्तु ततः स्मृतः।।

कनिष्ठ होता है, अत: इससे छोटा नहीं होना चाहिये। यज्ञोपवीतकी तरह आठवें वर्षमें अष्पत धारण करना चाहिये। भोजकोंके लिये यह मुख्य संस्कार है। इसके धारण करनेसे वह सभी क्रियाओंका अधिकारी होता है। यह अव्यङ्ग सर्वदेवमय, सर्ववेदमय, सर्वलोकमय और सर्वभूतमय है। इसके मूलमें विष्णु, मध्यमें ब्रह्मा और अन्त में शशाङ्कमौलि भगवान् शिव निवास करते हैं। इसी तरह ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद क्रमशः मूल, मध्य और अग्रभागमें रहते हैं, अथर्ववेद ग्रन्थिमें स्थित रहता है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश और भूलॊक, भुवोंक तथा स्वर्लोक आदि सातों लोक अव्यङ्गमें निवास करते हैं। सूर्यभक्त भोजकको सभी समय अव्यङ्ग धारणकर भगवान् सूर्यको उपासना करनी चाहिये। (अध्याय १४२)