भविष्य महा पुराण

भगवान् आदित्यकी सप्तावरण-पूजन-विधि

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-वत्स! अब मैं दिवाकर भगवान् सूर्यनारायणकी पूजा-विधि बतलाता हूँ। एक वेदीपर अष्टदल कमलयुक्त मण्डल बनाकर उसमें कालचक्नकी कल्पना करनी चाहिये। उसे बारह अरोसे युक्त होना चाहिये। ये हो सर्वात्मा, सभी देवताओंमें श्रेष्ठ, उज्वल किरणोंसे युक्त खखोल्क नामक भगवान् सूर्यदेव हैं। इसमें हजार किरणोंसे युक्त चतुर्बाहु भगवान् सूर्यको पूजा करनी चाहिये। इनके पश्चिममें अरुण, दक्षिणमें निक्षुधा देवी, दक्षिण में ही रेवन्त तथा उत्तरमें पिंगलकी पूजा करनी चाहिये और वहीं संज्ञाकी भी पूजा करनी चाहिये। अग्निकोणमें लेखककी, नैर्ऋत्यमें अश्विनीकुमारोंकी और वायव्यकोणमें वैवस्वत मनुकी तथा ईशानकोणमें लोकपावनी देवी यमुनाको पूजा करनी चाहिये। द्वितीय आवरणमें पूर्वमें आकाशकी, दक्षिण में देवीकी, पश्चिममें गरुड़की और उत्तरमें नागराज ऐरावतकी पूजा शुभ होती है। अधिकोणम हेलि, नैत्यकोणमें प्रहेलि, वायव्यमें

उर्वशी और ईशानकोणमें विनादेवीकी पूजा करनी चाहिये। तृतीयावरणमें पूर्वमें शुक्र, पश्चिममें शनि, उत्तरमें बृहस्पति, ईशानमें बुष और मण्डलके अग्रिकोणमें चन्द्रमाकी पूजा करनी चाहिये। नैऋत्यकोणमें राहु तथा वायव्यकोणमें केतुकी पूजा करनी चाहिये। चौथे आवरणमें लेखक, शाण्डिलीपुत्र, यम, विरूपाक्ष, वरुण, वायुपुत्र, ईशान तथा कुबेर आदिको उन-उनको दिशाओंमें पूजा करनी चाहिये। पाँचवें आवरणमें पूर्वादि क्रमसे महाश्वेता, श्री, ऋद्धि, विभूति, धृति, उन्नति, पृथ्वी तथा महाकीर्ति आदि देवियोंकी पूजा करनी चाहिये तथा इन्द्र, विष्णु, अर्यमा, भग, पर्जन्य, विवस्वान्, अर्क, त्वा आदि नादश आदिल्योंकी पूजा छठे आवरणमें करनी चाहिये। सिर, नेत्र, अस्त्र-शस्वसे युक्त रषसहित सूर्यकी सातवें आवरणमें पूजा करनी चाहिये। यक्ष, गन्धर्व, मासाधिपति तथा संवत्सर आदिकी भी पूजा करनी चाहिये। इसके बाद भगवान् भास्करका पुष्प, गन्ध आदिसे विधिपूर्वक पूजन कर-'ॐ खखोल्काय नमः' इस मूल मन्त्रसे अपने अङ्गोंका स्पर्श अर्थात् हृदयादिन्यास करते हुए पूजन करना चाहिये। जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक इस विधिसे सूर्यकी नित्य अथवा दोनों पक्षोंकी सप्तमीके दिन पूजन करता है, वह परमपदको प्राप्त कर लेता है। (अध्याय १५०)