भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-महाराज! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके समय ब्रह्मा आदि देवताओंने 'इन्द्रको विजय प्राप्त हो', इसलिये ध्वजयष्टिका निर्माण किया। ध्वजयष्टिको देवताओं, सिद्ध- विद्याधर तथा नाग आदिने मेरु पर्वतपर स्थापित कर सभी उपचारों-पुष्प, धूप तथा दीपादिसे उसकी पूजा की और अनेक प्रकारके आभूषण, छत्र, घण्टा, किंकिणी आदिसे उसे अलंकृत किया। उस ध्वजयष्टिको देखकर दैत्य त्रस्त हो गये और युद्धमें देवताओंने उन्हें पराजितकर स्वर्गका राज्य प्राप्त कर लिया। दैत्य पाताललोकको चले गये। उसी दिनसे देवता उस इन्द्रयष्टिका पूजन और उत्सव करने लगे।
एक समय अपने महान् पुण्य-प्रतापके कारण राजा उपरिचर वसु स्वर्गमें आये। उनका देवताओंने बहुत सम्मान किया। उनसे प्रसन्न होकर इन्द्रने वह ध्वज उन्हें दिया और वर देते हुए कहा कि पृथ्वीमें इस ध्वजकी आप पूजा करें, इससे आपके राज्यके सभी दोष दूर हो जायेंगे और जो भी राजा वर्षा-ऋतु (भाद्रपद शुक्ल द्वादशी) श्रवण नक्षत्र में इसका पूजन करेगा, उसके राज्यमें क्षेम और सुभिक्ष बना रहेगा, किसी प्रकारका उपद्रव नहीं होगा, प्रजाएँ प्रसन्न एवं नोरोग होंगी, सर्वत्र धार्मिक यज्ञ होंगे। राज्यमें प्रचुर धन-सम्पत्ति होगी। इन्द्रका यह वचन सुनकर राजा उपरिचर वसु इन्द्रध्वजको लेकर अपने नगरमें चले आये और प्रतिवर्ष इन्द्रध्वजकी पूजा कर उत्सव मनाने लगे। इस ध्वजयष्टिको भी प्रत्यक्ष देवी माना गया है।
अब मैं इन्द्रध्वजके उत्सवकी विधि बता रहा हूँ। बीस हाथ लम्बे सुपुट, उत्तम कामको एक यष्टि बनाकर उसे सुन्दर रंग-चिरंगे वस्त्रोंसे सुसज्जित करे। उसमें तेरह आभूषण लगवाये। पहला आभूषण पिटक चौकोर होता है, इसे 'लोकपाल पिटक' कहते हैं, दूसरा आभूषण लाल रंगका वृत्ताकार होता है, इसी प्रकार अन्य देवसम्बन्धी पिटकोंका निर्माण कर तथा यष्टिमें बाँधकर कुशा, पुष्पमाला, घण्टा, चामर आदिसे समन्वित उस ध्वजको स्थापित करे। अनन्तर हवन कराकर गुड़से युक्त मिष्टान्न और पायस ब्राह्मणोंको भोजन कराये। भोजनोपरान्त उन्हें दक्षिणा दे। उस ध्वजको धीरेसे खड़ाकर स्थापित कर दे। नौ दिन या सात दिनतक उत्सव मनाना चाहिये। अनेक प्रकारके नृत्य, गायन, वादन कराते हुए मल्लयुद्ध आदि उत्सव भी कराने चाहिये। वस्त्राभूषण तथा स्वादिष्ट भोजनादिसे सभी लोगोंको संतुष्टकर सम्मानित करना चाहिये। रात्रिको जागरणकर ध्वजको भलीभाँति रक्षा करनी चाहिये।
इन्द्रध्वजका पूजन, अर्चन तथा उत्सवादि कार्य सम्पन्न करना चाहिये। यदि एक वर्ष करनेके बाद दूसरे वर्ष किसी व्यवधानके कारण पूजनादि कार्य न हो सके तो पुन: बारह वर्ष बाद ही करना चाहिये। ध्वजके अङ्ग भङ्ग होनेपर अनेक प्रकारके उपद्रव प्रारम्भ हो जाते हैं। यदि ध्वजपर कौआ बैठ जाय तो दुर्भिक्षा पड़ता है, उलूक बैठे तो राजाकी मृत्यु हो जाती है। कपोत बैठे तो प्रजाका विनाश होता है। इसलिये सावधान होकर उसकी रक्षा करनी चाहिये और भक्तिपूर्वक इन्द्रध्वजका उत्थापन कर पूजन करना चाहिये। यदि प्रमादवश ध्वज गिर पड़े या टूट जाय तो सोने अथवा चाँदीका ध्वज बनाकर उसका उत्थापन और अर्चन कर शान्तिक- पौष्टिक आदि कर्म सम्पन्न कराये। ब्राह्मणको भोजन आदिसे संतुए करना चाहिये। इस विधिसे जो राजा इन्द्रध्वजको यात्रा एवं पूजा करता है, उसके राज्यों यचे वृष्टि होती है। मृत्यु औरअनेक प्रकारके ईति-भीति आदि दुर्योगों, कष्टोंका भय नहीं रहता तथा राजा शत्रुओंको पराजित कर चिर कालतक राज्यसुख भोगकर अन्त समयमें इन्द्रलोकको प्राप्त कर लेता है। (अध्याय १३९)