भविष्य महा पुराण

हरकालीव्रत-कथा

राजा युधिष्ठिरने पूछा- भगवन्! भगवती हरकालीदेवी कौन हैं? इनका पूजन करनेसे स्त्रियोंको क्या फल प्राप्त होता है ? इसका आप वर्णन करें?

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! दक्ष प्रजापतिकी एक कन्याका नाम था काली। उनका वर्ण भी नीलकमलके समान काला था। उनका विवाह भगवान् शंकरके साथ हुआ। विवाहके बाद भगवान् शंकर भगवती कालीके साथ आनन्द पूर्वक रहने लगे। एक समय भगवान् शंकर भगवान् विष्णुके साथ अपने सुरम्य मण्डपमें विराजमान थे। उस समय हँसकर शिवजीने भगवती कालीको बुलाया और कहा–'प्रिये! गौरि! यहाँ आओ।' शिवजीका यह वक्रवाक्य सुनकर भगवतीको बहुत क्रोध आया और वे यह कहकर रुदन करने ली कि 'शिवजीने मेरा कृष्णवर्ण देखकर परिहास किया है और मुझे गौरी कहा है, अतः अब मैं अपनी इस देहको अग्निमें प्रज्वलित कर दूंगी।' भगवान् शंकरने उन्हें अनिमें प्रवेश करनेसे रोकनेका प्रयल किया, परंतु देवीने अपनी देह की हरितवर्णकी कान्ति हरी दूर्वा आदि घासमें त्यागकर अपनी देहको अग्निमें हवन कर दिया और उन्होंने पुनः हिमालयकी पुत्री रूपमें गौरी नामसे प्रादुर्भूत होकर शिवजीके वामानमें निवास किया। इसी दिनसे जगत्पूज्या श्रीभगवतीका नाम 'हरकाली' हुआ। महाराज ! भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी तृतीया तिथिको सब प्रकारके नये धान्य एकत्रकर उनपर अङ्करित हरी घाससे निर्मित भगवती हरकालीकी मूर्ति स्थापित करे और गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, मोदक आदि नैवेद्य तथा भाँति भाँतिके उपचारोंसे देवीका पूजन करे । रात्रिमें गीत-नृत्य आदि उत्सवकर जागरण करे और देवी हरकालीको इस मन्त्रसे प्रणाम करे-

हरकर्मसमुत्पन्ने हरकाये हरप्रिये।

पा त्राहीशस्य मूर्तिस्थे प्रणतोऽस्मि नमो नमः॥

(उत्तरपर्व २० । २०)

'भगवान् शंकरके कृत्यसे उत्पन्न हे शंकरप्रिये । आप भगवान् शंकरके शरीरमें निवास करनेवाली है, भगवान शंकरकी गृतिमें स्थित रहनेवाली हैं, मैं आपकी शरण हूँ, आप गेरी रक्षा करें। आपको बार-बार प्रणाम है।

इस प्रकार देवीका पूजन कर प्रातःकाल सुवासिनी स्त्रियाँ बड़े उत्सवसे गीत-नृत्यादि करते हुए प्रतिमाको पवित्र जलाशयके समीप ले जाये और इस मन्त्रको पढ़ते हुए विसर्जित करें -

अर्चितासि मया भवाया गच्छ देवि सुगलयम्।

हरकाले शिवे गौरि पुनरागमनाय च।

(उत्तापर्व २०/२२)

'हे हरकाली देवि! मैंने भक्तिपूर्वक आपकी पूजा की है, हे गौरि ! आप पुनः आगमनके लिये इस समय देवलोकको प्रस्थान करें।'

इस विधिसे प्रतिवर्ष, जो स्त्री अथवा पुरुष व्रत करता है, वह आरोग्य, दीर्घायुष्य, सौभाग्य, पुत्र, पौत्र, धन, बल, ऐश्वर्य आदि प्राप्त करता है और सौ वर्षतक संसारका सुख भोगकर शिवलोक प्राप्त करता है। महादेवके अनुग्रहसे वहाँ वीरभद्र, महाकाल, नन्दीश्वर, विनायक आदि शिवजीके गण उसकी आज्ञामें रहते हैं। जो भी स्त्री भक्तिपूर्वक यह हरकाली-व्रत करती है और रात्रिके समय गीत-वाद्य-नृत्यसे जागरण कर उत्सव मनाती है, वह अपने पतिकी अति प्रिय होती है। (अध्याय २०)