ब्रह्माजी बोले-दिण्डिन् ! शुक्ल पक्षमें रोहिणी नक्षत्रसे युत सप्तमी तिथिको विजयसंज्ञक आदित्यवार कहते हैं। वह सम्पूर्ण पापों और
भयोंको नष्ट कर देता है। उस दिन सम्मान किये गये पुण्यकर्म फोटिगुना फल प्रदान करते हैं।
दिण्डिन् ! माघ मासके कृष्ण पक्षको सप्तमीको
जो दिन हो उसे आदित्याभिमुख कहते हैं। उस दिन प्रातःकाल ही स्नान कर गन्ध-पुष्पादि उपचारोंसे सूर्यनारायणकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर रक्तचन्दनके काष्ठसे बने हुए स्तम्भका आश्रय लेकर सूर्यदेवकी ओर मुखकर महाश्वेता-मन्त्र जपते हुए सायंकालतक खड़ा रहना चाहिये। तदनन्तर ब्राह्मणको भोजन कराकर दक्षिणा देनी चाहिये। तत्पश्चात् मौन होकर स्वयं भी भोजन करना चाहिये। जो मनुष्य इस व्रतका विधिपूर्वक पालन करते हैं, उन्हें भगवान् सूर्यनारायणका अनुग्रह प्राप्त होता है।
दिण्डिन्! संक्रान्तिके दिन यदि रविवार हो तो उसका नाम हृदयवार होता है। वह आदित्यके हृदयको अत्यन्त प्रिय है। उस दिन नक्तव्रत करके मन्दिरमें सूर्यनारायणके अभिमुख एक सौ आठ बार आदित्यहृदयका पाठ करना चाहिये अथवा सायंकालतक भगवान् सूर्यका हृदयमें ध्यान करना चाहिये। सूर्यास्त होनेके पश्चात् घर आकर यथाशक्छि ब्राह्मणको भोजन कराये तथा मौनपूर्वक स्वयं भी खीरका भोजन करके सूर्यदेवका स्मरण करते हुए भूमिपर ही शयन करे। इस प्रकार जो इस दिन व्रत रहकर श्रद्धा-भक्तिसे सूर्यनारायणकी पूजा करता है, उसके समस्त अभीष्ट सिद्ध हो जाते हैं और वह भगवान् सूर्यके समान ही तेज-कान्ति तथा यशको प्राप्त करता है। (अध्याय ८८-१०)
Summary of chapter 102 of the Bhavishya Mahā Purana is as follows:
The Jyeṣṭha Paurṇamāsī is the occasion of the Sāvitri Vrata — the supreme fasting vrata of devoted wives throughout Bhārata. The complete narrative is told: Sāvitri, daughter of King Aśvapati, chose to marry Satyavān knowing he was fated to die within the year. When Yama arrived to claim Satyavān's soul, Sāvitri followed him on foot into the path of the dead, arguing so wisely and with such unwavering devotion that Yama granted her five boons — the last of which was Satyavān's life fully restored. The complete vrata procedure for wives — the three-day fast, the worship of the Sāvitri image, and the listening to the narrative — is given.