भविष्य महा पुराण

प्रतिपत्कल्प-निरूपणमें ब्रह्माजीकी पूजा-अर्चाकी महिमा

राजा शतानीकने कहा-ब्रह्मन् ! आप प्रतिपदा तिथिमें किये जानेवाले कृत्य, ब्रह्माजीके पूजनकी विधि और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन करें।

सुमन्तु मुनि बोले-हे राजन्! पूर्वकल्पमें स्थावर जङ्गमात्मक सम्पूर्ण जगत्के नष्ट हो जानेपर सर्वत्र जल-ही-जल हो गया। उस समय देवताओंमें श्रेष्ठ चतुर्मुख ब्रह्माजी प्रकट हुए और उन्होंने अनेक लोकों, देवगणों तथा विविध प्राणियोंकी सृष्टि की। प्रजापति ब्रह्मा देवताओंके पिता तथा अन्य जीवोंके पितामह है, इसलिये इनकी सदा पूजा करनी चाहिये। ये ही जगतकी सृधि, पालन तथा संहार करनेवाले हैं। इनके मनसे रुद्रका, वक्षःस्थलसे विष्णुका आविर्भाव हुआ। इनके चारों मुखोंसे अपने छ: अङ्गोंके साथ चारों वेद प्रकट हुए। सभी देवता, दैत्य, गन्धर्व यक्ष, राक्षस, नाग आदि इनकी पूजा करते हैं। यह सम्पूर्ण जगत् ब्रह्ममय है और ब्रह्ममें स्थित है, अतः ब्रह्माजी सबसे पूज्य हैं। राज्य, स्वर्ग और मोक्ष-ये तीनों पदार्थ इनकी सेवा करनेसे प्राप्त हो जाते हैं। इसलिये सदा प्रसन्नचित्तसे यावज्जीवन नियमसे ब्रह्माजीकी पूजा करनी चाहिये। जो ब्रह्माजीको सदा भक्तिसे पूजा करता है, वह मनुष्य स्वरूपमें साक्षात् ब्रहा ही है। ब्रह्माजीको पूजासे अधिक पुण्य किसी न समझकर सदा ब्रह्माजीका पूजन करते रहना चाहिये। जो जहाजीका मन्दिर बनवाकर

उसमें विधिपूर्वक ब्रह्माजीकी प्रतिमाकी प्रतिष्ठा करता है, वह यज्ञ, तप, तीर्थ, दान आदिके फलोंसे करोड़ों गुना अधिक फल प्राप्त करता है। ऐसे पुरुषके दर्शन और स्पर्शसे इक्कीस पीढ़ीका उद्धार हो जाता है। ब्रह्माजीकी पूजा करनेवाला पुरुष बहुत कालतक ब्रह्मलोकमें निवास करता है। वहाँ निवास करनेके पश्चात् वह ज्ञानयोगके माध्यमसे मुक्त हो जाता है अथवा भोग चाहनेपर मनुष्यलोकमें चक्रवर्ती राजा या वेद वेदाङ्गपारङ्गत कुलीन ब्राह्मण होता है। किसी अन्य कठोर तप और यज्ञोंकी आवश्यकता नहीं है, केवल ब्रह्माजीकी पूजासे ही सभी पदार्थ प्राप्त हो सकते हैं। जो ब्रह्माजीके मन्दिरमें छोटे जीवोंकी रक्षा करता हुआ सावधानीपूर्वक धीरे-धीरे झाडू देता है तथा उपलेपन करता है, वह चान्द्रायण व्रतका फल प्राप्त करता है। एक पक्षतक ब्रह्माजीके मन्दिरमें जो झाड़ लगाता है, वह सौ करोड़ युगसे भी अधिक ब्रहालोकमें पूजित होता है और अनन्तर सर्वगुणसम्पन्न, चारों वेदों का जाता धर्मात्मा राजाके रूपों पृथ्वीपर आता है। भक्तिपूर्वक ब्रह्माजीका पूजन न करनेतक ही मनुष्य संसारमें भटकता है। जिस तरह मानवका मन विषयोंग मन होता है, वैसे ही यदि ब्रह्माजीमें मन निमग्र रहे तो ऐसा कौन पुरुष होगा जो मुक्ति नहीं प्राप्त कर सकता। ब्रह्माजीके जीर्ण एवं खण्डित

१- इसका वर्णन ठीक इसी प्रकार वराहपुराणा, इससे भी अधिक विस्तार से मिलता है और मुहूर्त चिन्तामणि एवं अन्य ज्योतिषग्रन्थान भी रमणीयतापूर्वक प्रचञ्चित है। व्रतकल्पद्रुम, खतरनाकर, व्रतराज आदिम भी उरगृहोत है।

समास यया चित्तं जनतोषियगोचरे ।

                  यद्येवं ब्रह्मगि यस्तं को न मुच्येत बन्धनात् ॥

(बामापर्व १७।४०)

मन्दिरका उद्धार करनेवाला प्राणी मुक्ति प्राप्त करता है। ब्रह्माजीके समान न कोई देवता है न गुरु, न ज्ञान है और न कोई तप ही है।

प्रतिपदा आदि सभी तिथियों में भक्तिपूर्वक ब्रह्माजीकी पूजा कर पूर्णिमाके दिन विशेषरूपसे पूजा करनी चाहिये तथा शङ्ख, घण्टा, भेरी आदि वाद्य-ध्वनियों के साथ आरती एवं स्तुति करनी चाहिये। इस प्रकार व्यक्ति जितने पर्वोपर आरती करता है, उतने हजार युगतक ब्रह्मलोकमें निवास और आनन्दका उपभोग करता है। कपिला गौके पञ्चगव्य और कुशाके जलसे वेदमन्त्रों के द्वारा ब्रह्माजीको स्नान कराना ब्राहा-सान कहलाता है। अन्य स्नानों से सौ गुना पुण्य इसमें अधिक होता है। यज्ञ एवं अग्निहोत्रादिके लिये ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यको कपिला गौ रखनी चाहिये। ब्रह्माजीकी मूर्तिका कपिला गायके वृत्तसे अध्यन करना चाहिये, इससे करोड़ों वर्षोंके किये गये पापोंका विनाश होता है। यदि प्रतिपदाके दिन कोई एक बार भी घीसें स्नान कराता है तो उसके इक्कीस पीढ़ीका उद्धार हो जाता है। सुवर्ण-वस्त्रादिसे अलंकृत दस हजार सवत्सा गौ वेदज्ञ ब्राह्मणोंको देनेसे जो पुण्य होता है, वहीं पुण्ये ब्रह्माजीको दुग्धसे स्नान करनेसे प्राप्त होता है। एक बार भी दूधसे ब्रह्माजीको स्नान करानेवाला पुरुष सुवर्णक विमानमें विराजमान हो ब्रह्मलोकमें पहुँच जाता है। दहीसे स्नान करानेपर विष्णुलोककी पासि होती है। शहदसे स्नान करानेपर वोरलोक (इन्द्रलोक) को प्राति होती है। ईखके रससे खान करानेपर सूर्यलोककी प्राति होतो. है। शुद्धोदकसे लाल करानेपर सभी पापोंसे मुक्त होकर बहाली कसे निवास करता है। सबसे छने हुए जलाये नहाजीको मान करानेपर वह सदा तृप्त रहता है और सम्पूर्ण विश्व उसके वशीभूत हो जाता है। सौषधियोंसे स्नान करानेपर ब्रह्मलोक, चन्दनके जलसे स्नान करानेपर रुद्रलोक, कमलके पुष्प, नीलकमल, पाटला (लोध्र-लाल), कनेर आदि सुगन्धित पुष्पोंसे स्नान करानेपर ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। कपूर और अगरके जलसे स्नान करानेपर या गायत्रीमन्त्रसे सौ बार जलको अभिमन्त्रित कर उस  जलसे स्नान करानेपर ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है। शीतल जल या कपिला गायके धारोष्ण दुग्धसे स्नान करानेके अनन्तर घृतसे स्नान करानेसे सभी पापोंसे मनुष्य मुक्त हो जाता है। इन तीनों स्रानोंको सम्पन्न कर भक्तिपूर्वक पूजा करनेसे पूजकको अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है। मिट्टीके घड़ेकी अपेक्षा ताँबेके घटसे ब्रह्माजीको स्नान करानेपर सौगुना, चाँदीके घटसे लाखगुना फल होता है और सुवर्ण-कलशसे स्नान करानेपर कोटिगुना फल प्राप्त होता है। ब्रह्माजीके दर्शनसे उनका स्पर्श करना श्रेष्ठ है, स्पर्शसे पूजन और पूजनसे घृतस्नान अधिक फलदायक है। सभी वाचिक और मानसिक पाप घृतस्नान करानेसे नष्ट हो जाते हैं।

राजन्! इस विधिसे स्नान कराकर भक्तिपूर्वक ब्रह्माजीको पूजा इस प्रकार करनी चाहिये- पवित्र वस्त्र पहनकर, आसनपर बैठ सम्पूर्ण न्यास करना चाहिये। प्रथम चार हाथ विस्तृत स्थानमें एक अष्टदल कमलका निर्माण करे। उसके मध्य नाना वर्णयुक्त द्वादशदल यन्त्र लिखे और पाँच रंगोंसे उसको भरे। इस प्रकार यन्त्र निर्माणकर गायत्रीके वर्णोसे न्यास करे। गायत्रीके अक्षरों द्वारा शरीरमें न्यास कर देवताके शरीरमें भी न्यास करना चाहिये। प्रणवयुक्त गायत्री मन्त्रकेद्वारा अभिमन्बित केसर, अगर,

चन्दन, कपूर आदिसे समन्वित जलसे सभी पूजाद्रव्योंका मार्जन करना चाहिये। अनन्तर पूजा करनी चाहिये। प्रणवका उच्चारण कर पीठस्थापन और प्रणवसे ही तेज:स्वरूप ब्रह्माजीका आवाहन करना चाहिये। पद्मपर विराजमान, चार मुखोंसे युक्त चराचर विश्वकी सृष्टि करनेवाले श्रीब्रह्माजीका ध्यान कर पूजा करनी चाहिये। जो पुरुष प्रतिपदा तिथिके दिन भक्तिपूर्वक गायत्री-मन्त्रसे ब्रह्माजीका पूजन करता है, वह चिरकालतक ब्रह्मलोकमें निवास करता है। (अध्याय १७)