ब्रह्माजी बोले- मुनीश्वरो! उत्तम रीतिसे विवाह सम्पन्न कर गृहस्थको जो करना चाहिये, उसका मैं वर्णन करता हूँ
सर्वप्रथम गृहस्थको उत्तम देश में ऐसा आश्रय ढूँढ़ना चाहिये, जहाँ वह अपने धन तथा स्त्रीकी भलीभाँति रक्षा कर सके। बिना आश्रयके इन दोनोंकी रक्षा नहीं हो सकती। ये दोनों-धन एवं स्त्री-त्रिवर्गके हेतु हैं, इसलिये इनकी प्रयत्नपूर्वक रक्षा अवश्य करनी चाहिये। पुरुष, स्थान और घर-ये तीनों आश्रय कहलाते हैं। इन तीनोंसे धन आदिका रक्षण और अर्थोपार्जन होता है। कुलीन, नीतिमान, बुद्धिमान् सत्यवादी, विनयी, धर्मात्मा और दृढव्रती पुरुष आश्रयके योग्य होता है। जहाँ धर्मात्मा पुरुष रहते हों, ऐसे नगर अथवा ग्राममें निवास करना चाहिये। ऐसे स्थानमें गुरुजनोंकी अनुमति लेकर अथवा उस ग्राम आदिमें बसनेवाले श्रेष्ठजनोंकी सहमति प्राप्त कर रहनेके लिये अविवादित स्थलमें घर बनाना चाहिये, परंतु किसी पड़ोसीको कष्ट नहीं देना चाहिये । नगरके द्वार, चौक, यज्ञशाला, शिल्पियोंके रहने के स्थान, जुआ खेलने तथा मांस- मद्यादि बेचनेके स्थान, पाखण्डियों और राजाके नौकरोंके रहने के स्थान, देवमन्दिरके मार्ग तथा राजमार्ग और राजा महल इन स्थानोंसे दूर
रहनेके लिये अपना घर बनाना चाहिये। स्वच्छ, मुख्य मार्गवाला, उत्तम व्यवहारवाले लोगोंसे आवृत तथा दुष्टोंके निवाससे दूर-ऐसे स्थानमें गृहका निर्माण करना चाहिये। गृहके भूमिकी ढाल पूर्व अथवा उत्तरकी ओर हो। रसोईघर, स्नानागार, गोशाला, अन्त:पुर तथा शयन-कक्ष और पूजाघर आदि सब अलग-अलग बनाये जायें। अन्तःपुरकी रक्षाके लिये वृद्ध, जितेन्द्रिय एवं विश्वस्त व्यक्तियोंको नियुक्त करना चाहिये। स्वियोंकी रक्षा न करनेसे वर्णसंकर उत्पन्न होते हैं और अनेक प्रकारके दोष भी होते देखे गये हैं। स्त्रियों को कभी स्वतन्त्रता न दे और न उनघर विश्वास करे। किंतु व्यवहारमें विश्वस्तके समान ही चेष्टा दिखानी चाहिये। विशेषरूपसे उसे पाकादि क्रियाओंमें ही नियुक्त करना चाहिये। स्त्रीको किसी भी समय खाली नहीं बैठना चाहिये।
दरिद्रता, अति-रूपवत्ता, असत्-जनोंका सङ्ग, स्वतन्त्रता, पेयादि द्रव्यका पान करना तथा अभक्ष्य- भक्षण करना, कथा, गोष्ठी आदि प्रिय लगना, काम न करना, जादू-टोना करनेवाली, भिक्षुकी, कुट्टिनी, दाई, नटी आदि दुष्ट स्त्रियों के सङ्ग उद्यान, यात्रा, निमन्त्रण आदिमें जाना, अत्यधिक तीर्थयात्रा करना अथवा देवताके दर्शनोंके लिये घूमना, पतिके
एतदेशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिष्यां सर्वमानवाः।।
आसमुद्रातु वै पूर्वादासमुद्रातु पश्चिमात्।
तयोरेवान्तरं गिर्योरार्यावतं विदुर्बुधाः।।
साथ बहुत वियोग होना, कठोर व्यवहार करना, पुरुषोंसे अत्यधिक वार्तालाप करना, अति क्रूर, अति सौम्य, अति निडर होना, ईर्ष्यालु तथा कृपण होना और किसी अन्य स्त्रीके वशीभूत हो जाना- ये सब स्त्रीके दोष उसके विनाशके हेतु हैं। ऐसी स्त्रियोंके अधीन यदि पुरुष हो जाता है तो वह भी निन्दनीय हो जाता है। यह पुरुषकी ही अयोग्यता है कि उसके भृत्य बिगड़ जाते हैं। स्वामी यदि कुशल न हो तो भृत्य और स्त्री बिगड़ जाते हैं, इसलिये समयके अनुसार यथोचित रीतिसे ताडन और शासनसे जिस भौति हो इनकी रक्षा करनी चाहिये। नारी पुरुषका आधा शरीर है, उसके बिना धर्म-क्रियाओंकी साधना नहीं हो सकती। इस कारण स्त्रीका सदा आदर करना चाहिये। उसके प्रतिकूल नहीं करना चाहिये।
स्त्रीके पतिव्रता होनेके प्राय: तीन कारण देखे जाते हैं-(१) पर-पुरुषमें विरक्ति, (२) अपने प्रतिमें प्रीति तथा (३) अपनी रक्षामें समर्थता ।
उत्तम स्त्रीको साग तथा दाननीतिसे अपने अधीन रखे। मध्यम स्त्रीको दान और भेदसे और अधम स्त्रीको भेद और दण्डनीतिसे वशीभूत करे। परंतु दण्ड देनेके अनन्तर भी साम-दान आदिसे उसको प्रसन्न कर ले। भर्ताका अहित करनेवाली और व्यभिचारिणी स्त्री कालकूट विषके समान होती है, इसलिये उसका परित्याग कर देना चाहिये। उत्तम कुलमें उत्पन्न पतिव्रता, विनीत और भर्ताका हित चाहनेवाली स्त्रीका सदा आदर करना चाहिये। इस रीतिसे जो पुरुष चलता है वह त्रिवर्गकी प्राप्ति करता है और लोकमें सुख पाता है।
ब्रह्माजी बोले- मुनीश्वरो! मैंने संक्षेपमें पुरुषोंको स्त्रियों के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिये, यह बताया। अब पुरुषों के साथ स्त्रियोंको कैसा व्यवहार करना चाहिये, उसे बता रहा हूँ आप सब सुनें-
पतिकी सम्यक् आराधना करनेसे स्त्रियों को पतिका प्रेम प्राप्त होता है तथा फिर पुत्र तथा स्वर्ग आदि भी उसे प्राप्त हो जाते हैं, इसलिये स्त्रीको पतिकी सेवा करना आवश्यक है। सम्पूर्ण कार्य विधिपूर्वक किये जानेपर ही उत्तम फल देते हैं और विधि-निषेधका ज्ञान शास्त्रसे जला जाता है। स्त्रियोंका शास्त्रों अधिकार नहीं है और न ग्रन्थोंके धारण करने में अधिकार है। इसलिये स्त्रीद्वारा शासन अनर्थकारी माना जाता है। स्त्रीजो दूसरेसे विधि-निषेध जानने की अपेक्षा रहती है। पहले तो उसे भर्ता सब धोका निर्देश करता है और भतकि मरने के अनन्तर पुत्र उसे विधवा एवं पतिव्रताके धर्म बतलाये। बुद्धिके विकल्पीको छोड़कर अपने बड़े पुरुष जिस मार्गपर चले हों, उसीपर चलने में उसका सब प्रकार कल्याण है। पतिव्रता स्त्री ही गृहस्थके धर्मोंका मूल है। (अध्याय ८-९)
Summary of chapter 7 of the Bhavishya Mahā Purana is as follows:
The second segment of gṛhastha dharma is devoted to pātivrā dharma — the code of the devoted wife. Her position as the central pillar of the household's spiritual life, her duties toward husband, in-laws, and children, the rites she performs for the welfare of all, and the narratives that illustrate her supreme position in dharma are expounded. The devoted wife is declared to be the household's greatest tapasvinī.