भविष्य महा पुराण

महिषी एवं मेषी-दानकी विधि

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-राजन्! अब मैं पापनाशक, पुण्यप्रद तथा आयु सुखप्रदायक महिषीके दानकी विधि बता रहा हूँ। सूर्य-चन्द्रग्रहण, कार्तिक पूर्णिमा, अयनसंक्रान्ति, शुक्ल पक्षको चतुर्दशो आदि पर्व-दिनोंमें अधवा जब भी सामर्थ्य हो, उसी समय सांसारिक दुःखको निवृत्तिके लिये महिषी-दान करना चाहिये। शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा अलंकृत महिषी उत्तम विद्वान् ब्राह्मणको देनी चाहिये। दान देनेके समय इस मन्त्रको पढ़ना चाहिये-

इन्द्रादिलोकपालानां या राजमहिषी शुभा।

महिषीदानमाहात्म्यात् सास्तु मे सर्वकामदा॥

धर्मराजस्य साहाय्यो यस्य पुत्रः प्रतिष्ठितः ।

महिषासुरस्य जननी या सास्तु वरदा मम ।।

(उत्तरपर्व १६२।२-१०)

जो इन्द्राति लोकपालोको कल्याणकारिणी राजममिषी है और धर्मराजको सहायता करने के लिये जिसका पुत्र ( महिष) उनका वाहन बना हुआ है तथा जो महिषासुरको जननी है. वह मेरे लिये वरदायिनी हो। इस महिषी-दानसे मेरी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण हो जायँ।'

प्रदक्षिणाके पश्चात् पृष्ठभागसे महिषीका दान करना चाहिये। वस्त्र, आभूषण और दक्षिणाके साथ महिषी ब्राह्मणको देकर विसर्जन करना चाहिये। इस विधिसे जो व्यक्ति महिषीका दान करता है, वह इस लोक तथा परलोकमें वाञ्छित फल प्राप्त करता है।

महाराज! इसी प्रकार मेषी-दान भी सभी पापोंको दूर करनेवाला है। एक सुवर्णमयी मेषीको प्रतिमा बनाकर उसे उत्तम भूषण, रेशमी वस्त्र, चन्दन, पुष्पमाला आदिसे अलंकृतकर अथवा प्रत्यक्ष मेघीको अलंकृतकर उसका दान करना चाहिये। ग्रहण, विषुवयोग, अयनसंक्रान्ति आदि पवित्र दिनोंमें, दुःस्वप्र देखनेपर, अमावास्यामें अथवा जब भी श्रद्धा हो तब इसका दान करना चाहिये । दानके समय शिव-पार्वती, ब्रह्मा-गायत्री, लक्ष्मी-नारायण तथा रति-कामदेवकी पूजा करनी  चाहिये, साथ ही लोकपालों और ग्रहोंकी भी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर हवन करना चाहिये। ब्राह्मणकी पूजा करनी चाहिये। पूजनके बाद

मेषीकी प्रतिमाको तिलके कलशपर स्थापित कर उसके सामने नमक रखकर विधिपूर्वक पूजन करे और गृहस्थ ब्राह्मणको उसका दान कर दे। इस दानके प्रभावसे नि:संतानको पुत्र और निर्धनको धन प्राप्त हो जाता है। जो व्यक्ति इस दानकी विधिको सुनता है, वह भी अहोरात्रमें किये गये पापोंसे छूट जाता है। (अध्याय १६२-१६३)