देवगुरु बृहस्पतिजीने कहा-देवेन्द्र ! त्रेतायुगमें अयोध्यानगरीमें शक्रशर्मा नामके एक देवोपासक ब्राह्मण रहते थे। वे अश्विनीकुमार, रुद्र, वसु, सूर्य आदिकी पृथक्-पृथक् मन्त्रोंसे विधिपूर्वक पूजा, हवन आदि करते थे। उनकी श्रद्धा-भक्तिसे की गयी आराधनाद्वारा प्रसन्न होकर तैतीसों देवता अपने गणों के साथ उनके दुर्लभ मनोरथको भी सुलभ कर देते थे। वे विघ्र एवं जरारहित हो दस हजार वर्षांतक देवाराधन करते रहे। देहावसानके बाद उन्होंने सूर्य-सायुज्य प्राप्त किया। उनकी ऐसी शुभ गतिको देखकर देवताओंके साथ देवराज इन्द्र (आप)-ने भी भगवान् सूर्यको आराधना की। आषाढ़ पूर्णिमाको पृथ्वीपर भगवान् भास्कर प्रत्यक्षरूपसे आये और उन्होंने देवताओंसे कहा- 'मैं कलियुगमें अतिशय रमणीय वृन्दावनमें द्विजरूपमें जन्म ग्रहण करूँगा और वह सूर्यरूपसे देवताओंका कार्य सिद्ध करेगा तथा वही द्विज माधव ब्राह्मणका वेदमार्गपरायण पुत्र मधु (मध्वाचार्य) नामसे प्रसिद्ध होगा।' यह कहकर भगवान् सूर्य देवताओंके कार्यक लिये उद्यत हो गये। उन्होंने अपने अङ्गसे तेजको उत्पन्न कर वृन्दावन भेजा। वे माधवके पुत्र पृथ्वीपर मध्वाचार्यके नामसे प्रसिद्ध हुए। उन्होंने मधुर वचनोंद्वारा वेदमार्गसे विमुखोंको सभी तरहसे वशमें कर लिया और उन्हें भुक्ति-मुक्ति देनेवाली वैष्णवी शक्ति भी प्रदान की।
देवेन्द्र ! द्वापर में कृषिकार्यसे जीवनयापन करनेवाले मेघशर्मा नामके एक ब्राह्मण थे। वे ज्ञानी, बुद्धिमान्, धार्मिक तथा वेदमार्गपरायण थे। प्रतिदिन अपने धनके दशांशसे सभी देवताओंकी भक्तिपूर्वक पूजा करते थे। एक बार शंतनुके राज्यकाक्षाने पाँच वर्षातक अनावृष्टि हो गयी। केवल एक कोसपर्यन्त हो धि स्वामा, वाणीभूषण, भट्टोजिदीक्षित के आविर्भावकी कथा होती थी। उस समय धान्यका भाव एक मुद्रामें द्रोणमात्र हो गया। केवल मेघशर्मा नामका वह ब्राह्मण सूर्यकी कृपासे धन-धान्यसम्पन्न था। अन्य पीड़ित प्रजागण राजाकी शरणमें गये। दुःखित राजाने मेघशर्माको बुलाया और प्रणामकर कहा-'द्विजश्रेष्ठ ! आप मेरे गुरु हैं। आप कोई ऐसा उपाय करें, जिससे मेरे राज्यमें सुवृष्टि हो।' इसपर मेघशर्मानेकहा-'राजन्! श्रावण मासमें बारह ब्राह्मणोंद्वारा विधिपूर्वक सूर्य-मन्त्रका जप, हवन, तर्पण, ब्राह्मण-भोजन आदिद्वारा सूर्यको आराधना करनेसे आपके राज्यमें सुवृष्टि होगी।' राजाने वैसा ही किया। भगवान् सूर्यकी कृपासे प्रचुर वृष्टि हुई और सूर्यव्रतपरायण राजा शंतनु उस व्रतद्वारा अतिशय पुण्यवान् नृपश्रेष्ठ हो गये। जिस किसी वृद्ध पुरुषको भी वे अपने हाथसे स्पर्श कर देते थे, वह युवा एवं नीरोग हो जाता था सूर्यदेवके प्रभावसे मेघशर्मा भी युवक हो गया। वह वृद्धावस्थासे रहित होकर सभी विघ्नोंसे शून्य हो पाँच सौ वर्षोतक जीवित रहा। अन्तमें प्राणका परित्याग कर उसने सूर्यलोक प्राप्त किया। अनन्तर वह ब्रह्मलोक चला गया। पुनः भगवान् सूर्यने प्रयागमें आकर पर्जन्यके रूपमें अपना दर्शन कराया और प्रसन्नचित्त होकर देवताओंसे कहा-'देवगणो ! घोर कलियुगर्ने म्लेच्छ-राज्य होगा, उस समय मैं वृन्दावनमें आकर देवकार्य करूँगा।' यह कहकर भगवान् सूर्य वृन्दावन चले गये और वेदशकि पुत्र होकर ' श्रीधर' नामसे विख्यात हुए। उन्होंने श्रीमद्भागवतकी भक्तिपूर्ण भावार्थदीपिका टीका लिखी और भागवतकी अपार महिमा बतलायो।
बृहस्पतिजीने पुन: कहा-देवेन्द्र ! कलियुगमें प्रांशुशर्मा नामक एक ब्राह्मण थे। वे नित्य वेदशास्त्र परायण तथा देवता और अतिथिके पूजक, सत्यवादी, अतिशय साधु, चोरी और हिंसासे रहित थे। वे भिक्षावृत्तिसे अपने पुत्र और स्त्रीकी रक्षा करते थे। एक दिन भिक्षाके लिये मार्गमें जाते समय उन्होंने मायावी कलिको देखा। कलिने एक मनोहर वाटिकाका निर्माण कर ब्राह्मणका वेश बनाया और प्रांशुशर्मासे कहा- 'प्रांशुशर्मा! मेरी बात सुनो। मेरी यह रमणीय वाटिका है। इसमें जाकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करो।' विप्रकी यह वाणी सुनकर प्रांशुशर्मा वाटिकाके अंदर आये। दुष्ट कलिने वाटिकामें आकर सुन्दर फलोंको तोड़कर उसे भोजनके लिये दिया और अञ्जलि बाँधकर प्रणत हो प्रांशुशमसि कहा-'विप्र! मेरे साथ सुन्दर कलिन्दका फल खाओ।' यह सुनकर उन्होंने हँसते हुए मधुर स्वरमें कहा-'विद्वानोंने बताया है कि बहेड़ेके वृक्षपर और कलिन्द्रके फलमें कलि रहता है, अतः मैं इसे नहीं खाऊँगा। यदि तुम अतीव श्रद्धा-भक्तिके साथ ब्राहाण- सेवाले उद्देश्य से इस फलको खाने के लिये दे हो रहे हो तो मैं भगवान् शालग्रामको निवेदित करनेके बाद ही इस फलको ग्रहण कर सकता हूँ, क्योंकि शालग्नाम सच्चिदानन्दविग्रहस्वरूप स्वयं ब्रह्म है । यह निश्चित बात है कि भगवान्को जिसपर दृष्टि पड़ जाती है, वह अभक्ष्य भी भक्ष्य बन जाता है।' यह सुनकर कलि लज्जित होकर निराश हो गया । ब्राह्मण उस फालको लेकर भूमिग्राममें चले आये। पुनः कलियुग राजाके पेशमें प्रांशुशर्माक पास आया और उसने प्रसन्न होकर कहा-'ब्राह्मण देवता। क्या तुमने फल प्रहण कर लिया. उसे मुझे शीघ्र दिखलाओ।' यह सुनकर पाशुशान बासमुण्डके समान तरा फलको लाकर उसे दिखला दिया। इसपर ड हो उस कालोनाक्षणको पेलोसे मारकर लौहपय कारागारने बंद कर दिया। प्रातःकाल सूर्योदय होनेपर दुःखी प्रांशुशर्माने भगवान् भास्करको वेदके सूक्तोंसे संतुष्ट किया। प्रसन्न हो साक्षात् सनातन रविने आकाशवाणीसे विपके कान में यह वाक्य कहा-'महाभाग विप्र! कालरूप स्वयं हरिने विश्वके पालन आदिके लिये चारों युगोंका निर्माण किया है। उन्होंने ही कलिको विश्वसमूहको मृत्युके लिये रचा है। इसलिये घोर कलियुग आनेपर विष्णुमायासे विनिर्मित कलिंजर नगरमें जाकर आनन्दपूर्वक जीवन बिताओ।' भगवान् सूर्यने ऐसा कहकर उस ब्राह्मणकी रक्षाके लिये उसे कलिंजर भेज दिया। ब्राह्मण प्रांशुशर्मा वहाँ एक सौ पचीस वर्षांतक रहकर भगवान् सूर्यको आराधना करते हुए पुत्र और पत्रीके साथ सूर्यलोक चला गया। वे ही प्रांशुशर्मा अट्ठाईसवें कलियुगमें भाद्रपद मासकी पूर्णिमाको शिवदत्तके पुत्ररूपमें कलिंजरमें विष्णुशर्मा-विष्णुस्वामी* नामसे प्रसिद्ध हुए। वे वेदशास्त्र एवं कलाओंके ज्ञाता थे और देवताओंके पूजक तथा परम वैष्णव थे। देवेन्द्र! पूर्वकालमें चैत्ररथ नामक स्थानमें मेधावीमुनिका मंजुघोषा अप्सरासे भगशर्मा नामका पुत्र हुआ। जन्म लेते ही माता-पिताने जब उसे छोड़ दिया, तब वह किसी प्रकार सौभाग्यसे भगवान् सूर्यकी आराधनामें तत्पर हो गया और तपद्वारा सौ वर्षातक उनकी निरन्तर आराधना करता रहा। अन्तमें सूर्यमण्डलकी अधिदेवता भगवती सावित्री उसपर प्रसनु हो प्रकट हुई। आश्विन मासमें उन्होंने उस ब्राह्मणको मण्डलका राजा बना दिया और वह आश्विन मास में सूर्यरूप होकर प्रकाशमान हो ता। सारा संसार उसकी पूजा करने लगा, इसलिये हे इन्द्र ! तुम भी उन्ही सूर्य की आराधा करो। वे तुम्हारा भी परम कल्याण करेंगे।
श्रीधरस्वामी और विष्णुस्वामी के विस्तृत चरित्र भक्तमाल' और 'कल्याण' के भक्तचरिताक में प्रकाशित हैं। दोनों भगवान् के परम श्रेष्ठ भक्त हुए हैं। श्रीधरस्वामीकी गीता, भागवत एवं विष्णुपुराणपर भक्तिपूर्ण टीकाएँ प्राप्त हैं।
अपने गुरु बृहस्पत्तिके वचनोंके अनुसार देवेन्द्रने भी आश्विन मासमें सूर्यकी आराधना की। भगवान् सूर्यने प्रत्यक्ष हो इन्द्रसे कहा-'देवराज ! कान्यकुब्जमें सत्यदेव ब्राह्मणके घरपर मैं उनके पुत्र-रूपमें 'वाणीभूषण' नामसे अवतार ग्रहण करूंगा। अनन्तर उन्होंने ऐसा ही किया और कालक्रममें वाणीभूषणने अपने नामसे छन्दःशास्त्रके ग्रन्थकी रचना की और पाखण्डियोंको परास्त किया। उन्होंने भगवान् विष्णुकी उपासनासे वैष्णवी शक्ति प्राप्त की थी।
बृहस्पति पुनः बोले-देवराज इन्द्र! किसी समय सरयू नदीके किनारे देवयाजी नामक एक ब्राह्मण रहते थे। वे सभी देवोंकी उपासना करनेवाले और नित्य वेदपाठी थे। उनके एक पुत्र उत्पत्र हुआ, किंतु उत्पन्न होते ही वह मृत्युको प्राप्त हो गया। यह जानकर दु:खी. हो देवयाजीने भगवान् सूर्यकी आराधना की। भगवान् सूर्यकी कृपासे वह मृत बालक पुनः जीवित हो गया और उसका नाम पड़ा विवस्वान् । यह सोलह वर्षकी अवस्थामें ही सभी शास्त्रोंका प्रकाण्ड विद्वान् हो गया। यह धर्मपरायण तथा सूर्यव्रतपरायण था। इसका विवाह भी सम्पन्न हो गया। एक-दिन शिवरात्रिका पुण्य पर्व था। विवस्वान्ने ब्रत ग्रहण किया था। इस दिन पत्नी सुशीलासे कामवश सम्पर्क करने के कारण वह भयंकर कुष्ठरोगसे ग्रस्त हो गया। वह बहुत दुःखी हो गया। पुन: किसीसे द्वादश रविवार- व्रतोंका उपदेश प्राप्तकर निराहार रहते हुए उसने जितेन्द्रिय होकर भगवान् सूर्यको आराधना को इस भक्तिसे तथा भगवान् सूर्यको कपासे उसका कुष्ठरोग दूर हो गया और उसको सारी पीड़ा समाप्त हो गयी। इससे उसको भगवान् सूर्यमे अत्यन्त सा उपयो और वह 'आदित्यस्यस्तोत्र का पाठ करने लगा इसके प्रभावसे वह कामदेव के समान सुन्दर रुपवान् हो गया। पूर्वमें स्त्रियोंद्वारा पत्सित वही विवस्वान् अब उनका प्रियभाजन बन गया, किंतु विवस्वान् अखण्ड ब्रह्मचर्यवत धारणकर ब्रह्मध्यानपरायण हो गया। सौ वर्षोंतक वह नीरोग एवं ज्ञानवान् रहा। अन्त में अपने प्राणोंका परित्याग कर वह सूर्यरूप हो गया और सूर्यमण्डलके बीचसे कार्तिक मासमें एक लाख वर्षतक प्रकाश करता रहा। हे महेन्द्र ! तुम भी देवताओंके साथ उन भगवान् सूर्यको पूजा करो।
सूतजीने कहा- मुने! देवराज इन्द्रने बृहस्पतिके वचनोंको सुनकर श्रद्धापूर्वक एक मासतक भगवान् सूर्यको कार्तिक मासमें विधिवत् पूजा की। कार्तिक पूर्णिमामें भगवान् सूर्यने प्रकट होकर इन्द्रसे कहा- 'इन्द्र! मैं अवतार धारण कर देवकार्यको सिद्ध करुंगा। विद्याभिमानी भट्टोंने सूत्रपाठ तथा धातुपाठका अन्यथा अर्थ किया है, अर्थका अनर्ध किया है तथा स्वर और वर्णके अर्थको भ्रंश कर दिया है। मैं उन पाखण्डियोंको जीतकर वेदका उद्धार करूँगा।' ऐसा कहकर वे भगवान् सूर्य काशीमें वेदशर्माके घरमें दीक्षित-वंशमें उत्पन्न हुए। वे यथानाम तथा- गुण थे। वे बारह वर्षकी अवस्थामें ही सभी शास्त्रोंमें पारङ्गत हो गये। भगवती पार्वतीके प्रिय तथा संसारके स्वामी भगवान् विश्वनाथकी उन्होंने आराधना की। तीन वर्षके बाद भगवान् शंकरने उन्हें महान् ज्ञान प्रदान किया। उस दिव्य ज्ञानके प्रभावसे उन्हें व्यक्त तथा अव्यक्तका सब ज्ञान स्मार्ट हो गया और उन्होंने सिद्धान्तकौमुदी नामक व्याकरणग्रन्थकी रचना की। पाखण्डी भट्टीको उन्होंने परास्त कर जीत लिया था, इसलिये उनका 'भट्टीजिदीक्षित' नाम संसारमे विला देवगुरु बृहस्पति बाले- देवराज इन्द्र ! पूर्वकालमें काञ्चीपुरमें एक दैवज्ञ ज्योतिषी ब्राह्मण रहता था। वह वेदमार्गानुनामी राजा सत्यदत्तका पुरोहित था। किसी समय उस ज्योतिषीने राजा सत्यदत्तसे कहा-'राजन् ! पुष्यनक्षत्रसे युक्त यह अभिजित् नामका मुहूर्त है। इस समय आप बाजार लगवायें, इसमें क्रय-विक्रय होनेसे आपको अतिशय लाभ होगा।' तब राजाने डुगडुगी पिटवायी-'बाजार में जिसका सामान नहीं बिकेगा, उसे राजा खरीदेगा- यह हमारी सत्य घोषणा है।' ऐसी घोषणा सुनकर बाजारमें अनेक वस्तुएँ बिकनेके लिये आ गयीं, परंतु दूसरे वणिक्-जनोंने उन सबको खरीद लिया। उसी समय एक लोहार लोहेका एक 'दरिद्रपुरुष' बनाकर बाजारमें लाया और उसका सौ रुपये मूल्य माँगा। परंतु उसे बाजार में किसीने भी नहीं खरीदा। राजाने दरिद्रकी मूर्ति समझकर भी घोषणाके अनुसार उसे सौ रुपये में खरीद लिया और महलमें लाकर कोषागारमें रखवा दिया। उस मूर्तिके प्रभावसे रातमें राज्यसे सत्कर्म, धर्म और लक्ष्मी राजाके देखते देखते जाने लगे। सत्यने पुरुषरूपमें राजासे कहा-'राजन् ! जहाँ दरिद्रताका निवास रहता है, जहाँ कोई कर्मपरायण नहीं होता, कर्मके बिना पृथ्वीपर धर्म स्थिर नहीं हो सकता, धर्मके बिना लक्ष्मीकी कोई शोभा नहीं होती और लक्ष्मौके बिना मैं नहीं रह सकता।' यह कहकर जानेको इच्छा करते हुए सत्यको राजाने पकड़ा और नम वचन में कहा-'प्रभो। मैंने, आपका परित्याग नहीं किया है, मैंने सत्यका ही पालन किया है। अत: आप मेरा घर छोड़कर क्यों जा रहे हैं?' यह सुनकर सत्यदेव पुनः राजाके परमें चले गये, उनके पोले पोले लक्ष्मी भी घरगे आने लगों। राजाने लक्ष्मीसे कहा 'देवि ! आप बसला है, पाँव चल होकर रह सकती हैं तो मेरे परमे आगे। यह सुनकर अचल होने का वर प्रदान कर लक्ष्मी भी राजाके घरमें प्रविष्ट हो गयी। राजा सत्यदत्तने पुनः अपने पुरोहित ज्योतिषीको बुलाकर उन्हें एक लक्ष मुद्रा प्रदान की और सभी बातें उनकी बता दीं। उस पुरोहितने पुत्रके जन्मके समय यह धन प्राप्त किया था, अत: उस सम्पूर्ण धनको श्रेष्ठ गणकने बालकके पालन-पोषणमें व्यय कर दिया और उसका 'पूषा' नाम रखा। पूषाने मार्गशीर्ष मासमें सूर्यकी आराधना की। उनकी कृपासे वह ज्योतिषशास्त्रमें पारङ्गत हो गया तथा सूर्यमें लीन हो गया। इसलिये हे देवेन्द्र! तुम भी मार्गशीर्षमें भगवान् सूर्यकी पूजा करो।
सूतजी बोले- मुने! बृहस्पतिके निर्देशानुसार इन्द्रने भी मार्गशीर्ष मासमें सूर्यको आराधना की और प्रसन्न होकर पूषारूपमें भगवान् सूर्यने उसे प्रत्यक्ष दर्शन देकर कहा-'देवगणो! उज्जयिनीमें रुद्रपशुके घरपर मिहिराचार्य (वराहमिहिर)-के नामसे मैं जन्म ग्रहण करूंगा। मैं ज्योतिषशास्त्रका प्रवर्तक होऊँगा। अनन्तर मूलगंण्डान्त एवं अभिजित्के योगर्ने रुद्रपशु ब्राह्मणके घरपर एक बालकका जन्म हुआ। पिताने उत्पन्न पुत्रको काठको पेटीमें रखकर रात्रि में नदी में बहा दिया। वह बहता हुआ समुद्र में चला गया, पर वहाँ राक्षसियोंके द्वारा वह रक्षित हुआ। पुन: उसने लङ्कामें आकर ज्योतिषका अध्ययन किया। जातक, फलित, मूकप्रश्न आदि ज्योतिषके सभी अङ्गोंका भलीभाँति अध्ययन कर यह विभीषणके पास आया और इसने भक्तराज विभीषणको प्रणाम किया तथा कहा-'मुझे राधासियोंने यहाँ पहुँचा दिया है, मैं आपकी शरणमें हूँ।' विभीषणने उसे श्रेष्ठ वैघ्याच समझकर उसकी जन्मभूमिमें भेज दिया। म्लेच्छोंक द्वारा बिनाए ज्योतिषका इसने पुनः उद्धार किया। (अध्याय ८)