भविष्य महा पुराण

मन्दारषष्ठी-व्रत

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-राजन् ! अब मैं सभी पापोंको दूर करनेवाले तथा समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले मन्दारषष्ठी नामक व्रतका विधान बतलाता हूँ। व्रती माघ मासके शुक्ल पक्षको पञ्चमी तिथिको स्वल्प भोजन कर नियमपूर्वक रहे और षष्ठीको उपवास करे। ब्राह्मणोंका पूजन करे तथा गन्दारका पुष्प भक्षण कर रात्रि में शयन करे। षष्ठीको प्रातः उठकर स्नानादि करे तथा तासपात्रमें काले तिलोंसे एक आदल कमल बनाये। उसपर हाथमें कमल लिये भगवान् सूर्यकी सुवर्णकी प्रतिमा स्थापित करे। आठ सोनेके अर्कपुष्पोंसे तथा गन्धादि उपचारोंसे अष्टदल कमलके दलोंमें पूर्वादि क्रमसे भगवान् सूर्यके नाम-मन्त्रोंद्वारा इस प्रकार पूजा करे–'ॐ भास्कराय नमः' से पूर्व दिशामें, 'ॐ सूर्याय नमः' से अग्निकोणमें, 'ॐ अर्काय नमः' से दक्षिण में, 'ॐ अर्यम्णे नमः' से नै त्यो, 'ॐ वसुधात्रे नमः' से पश्चिममें, 'ॐ चण्डभानवे नम:' से वायव्यमें,

*मत्यपुराणके अध्याय 76 में फलसप्तमी नामसे इसी व्रतका वर्णन हुआ है।

'ॐ पूष्णे नमः' से उत्तरमें, 'ॐ आनन्दाय नमः' से ईशानकोणमें तथा उस कमलकी मध्यवर्ती कर्णिकामें 'ॐ सर्वात्मने पुरुषाय नमः' यह कहकर शुक्ल वस्त्र, नैवेद्य तथा माल्य एवं फलादि सभी उपचारोंसे भगवान् सूर्यका पूजन करे। सप्तमीको पूर्वाभिमुख मौन होकर तेल तथा लवण भक्षण करे। इस प्रकार प्रत्येक मासकी शुक्ल-षष्ठीको व्रतकर सप्तमीको पारण करे। वर्षके अन्तमें वही मूर्ति कलशके ऊपर स्थापित कर यथाशक्ति वस्त्र, गौं, सुवर्ण आदि ब्राह्मणको प्रदान करे और दान करते समय यह मन्त्र पढ़े-

नमो मन्दारनाथाय मन्दारभवनाष च।

त्वं च वै तारयस्वास्मानस्मात् संसारकर्दमात्॥

(उत्तरपर्व ४०।११)

'हे मन्दारभवन, मन्दारनाथ भगवान् सूर्य। आप हमलोगोंका इस संसाररूपी पङ्कसे उद्धार कर दें, आपको नमस्कार है।'

इस विधिसे जो मन्दारषष्ठीका व्रत करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर एक कल्पतक सुखपूर्वक स्वर्गमें निवास करता है और जो इस विधानको पढ़ता है अथवा सुनता है, वह भी सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है*। (अध्याय ४०)