भविष्य महा पुराण

अग्नि-पूजन-विधि

सूतजी बोले-ब्राह्मणो! नित्य-नैमित्तिक यागादिकी समाप्तिमें हवन हो जानेपर भगवान् अग्निदेवकी षोडश उपचारोंसे पूजा करनी चाहिये। अग्निको वायुद्वारा प्रदीस कर पीठस्थ देवताओंकी पूजा कर हाथमें लाल फूल ले निम्न मन्त्र पढ़कर ध्यान करे-

इष्ट शक्तिस्वस्तिकाभीतिमुच्चैदीर्दोभिर्धारयन्तं वरान्तम् ।

हेमाकल्पं पासस्थं त्रिनेत्रं ध्यायेद्वह्नि बद्धमौलिं जटाभिः॥

(मध्यागपत ।।१६।३)

'भगवान् अग्निदेवता अपने हाथों में उत्तम पृष्ट (यज्ञपात्र), शक्ति, स्वस्तिक और अभय-मुद्रा धारण किये हैं, देदीप्यमान सुवर्ण-सदृश उनका स्वरूप है, कमलके ऊपर विराजमान है, तीन नेत्र हैं तथा वे जटाओं और मुकुटसे सुशोभित है।'

मण्डपके पूर्व आदि द्वारदेशोंमें कामदेव, इन्द्र, वराह तथा कार्तिकेयको आवाहित कर स्थापित करे। तदनन्तर आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय तथा गन्धादि उपचारोंसे पूजन कर आठ मुद्राएँ प्रदर्शित करे। फिर सुवर्ण-वर्णवाले निर्मल, प्रज्वलित, सर्वतोमुख, महाजिल तथा महोदर भगवान् अग्निदेवकी. आकाशरूपमें पूजा करे। अग्निको जिह्वाओंका भी ध्यान करे। इसके बाद भगवान् अग्निदेवका विविध उपचारोंसे पूजन करे*।(अध्याय १६)

* सर्वप्रथम निम्नलिखित मन्त्रसे तीन घुष्पगुच्छोंद्वारा अग्निदेवको आसन प्रदान करे-

आसन-मन्त्र-

त्वमादिः सर्वभूतानां संसारार्णवतारकः । परमज्योतीरूपस्त्वमासन सफलीकुरु॥

संसार रूपी सागरसे उद्धार करनेवाले, सम्पूर्ण प्राणियोंमें आदि, परम ज्योतिः स्वरूप हे अग्निदेव ! आप इस आसनको ग्रहण कर मुझे सफल बनायें। अनन्तर करबद्ध प्रार्थना करे-

प्राद्य-मन्त्र-

वैश्वानर नमस्तेऽस्तु नमस्ते हव्यवाहन स्वागत ते सुरखेत शान्तिं कुरु नमोऽस्तु ते

का है

हव्यवाहन वैश्वानरदेव! आप देवताओं में श्रेष्ठ है, आपका स्वागत है, अपको नमस्कार है, आप शान्ति प्रदान करें।

पाद्य-मन्त्र-

नमस्ते भगवन् देव आपोनारायणात्मक ।

सर्वलोकहितार्थाय पाई च प्रतिगृह्यताम्॥

नर नारायणस्वरूप है भगवान् वैभानादेव! आपको नमस्कर है। आप समस्त संसारके हित के लिये इस पाद्य-जलको ग्रहण करें।

आर्य मन-नारायण पां धाम ज्योतीरूप सनातनः।

गृहाणाम्यं मया दत्तं विश्वरूप नमोऽस्तु ते॥

हे विकरूप! आप ज्योतीरूप हैं, आप हो सनातन, परम धाम एवं नगरायम हैं, आपको नमस्कार है, आप मेरे द्वारा दिये गये इस अर्यको ग्रहण करें।

आचमनीय-मत्र-

जगदादित्यरूपेण प्रकाशति यः सदा । तर, प्रकाशरूपाय नमस्ते जातवेदो ।

जो आदित्यरूपसे सम्पूर्ण संसारको नित्य प्रकाशित करते रहते हैं. ऐसे उन जातवेदा तथा प्रकाशस्वरूप भगवान् वैवानरको नमस्कार हे अग्निदेव ! इस आदमदोर जलको आम सहन करें।

सानीच मज-धनकाय नागरतेऽस्तु सर्वचाचप्रणाशन । नानीयं ते मया दतं सर्वकामा सिद्धये ।

सभी पापों का नाश करने वाले है धनञ्जयदेव! आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण वामन ओंकी सिद्धि के लिये मेरे द्वारा दिये गये इस मानीय जलको आप ग्रहण करें।

अङ्गाप्रोक्षण एवं वन-मन-हुताशान महायाहो देवदेव सनातन शरणं से प्रगल्छामि देहि ये परम् पदम् ।।

है देवदेव सनातन महाबाहु हुताशन ! मैं भारको धारण , मुझे आप पर