Read Bhavishya Maha Purāṇa in Hindi Online

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भविष्य पुराण – संरचना एवं स्वरूप

अष्टादश महापुराणों में अत्यंत विलक्षण और महत्ता से परिपूर्ण भविष्य पुराण का स्थान अति विशिष्ट है। इस पावन पुराण को मुख्य रूप से चार प्रमुख पर्वों में विभक्त किया गया है, जिन्हें ब्राह्म पर्व, मध्यम पर्व, प्रतिसर्ग पर्व और उत्तर पर्व के नाम से जाना जाता है। इसमें लगभग चौदह सहस्र श्लोक सन्निहित हैं, जो धर्म, समाज, इतिहास तथा भविष्यकालीन घटनाओं का अनुपम समागम प्रस्तुत करते हैं। ब्राह्म पर्व में सृष्टि वर्णन, संस्कारों की महिमा, वर्णव्यवस्था, तथा मुख्य रूप से भगवान सूर्य की उपासना एवं सौर संप्रदाय के गूढ़ सिद्धांतों का विस्तृत प्रतिपाद विधान है। मध्यम पर्व में विविध कर्मकांड, मंत्र अनुष्ठान, वास्तु शास्त्र तथा तंत्र-मंत्र की पावन विधियाँ प्रस्तुत की गई हैं। प्रतिसर्ग पर्व इस पुराण का अति प्रसिद्ध एवं अनूठा भाग है, जिसमें ऐतिहासिक एवं भविष्यकालीन राजवंशों, म्लेच्छ शासकों, कलिकाल के परिवर्तनों तथा महापुरुषों के अवतरण का भविष्यवाणी रूप में मनोहारी विवरण दिया गया है। उत्तर पर्व में धार्मिक व्रतों, उत्सवों, दानों तथा भक्तिपूर्ण अनुष्ठानों की विशद चर्चा है। यह पवित्र पुराण त्रिकालदर्शी दृष्टिकोण प्रदान करके मानवमात्र को ईश्वर भक्ति एवं सनातन धर्म के पथ पर चलने की प्रेरणा प्रदान करता है।

भविष्य पुराण – मुख्य विषय एवं दर्शन

श्री भविष्य पुराण का मूल दर्शन भगवान सूर्य, सर्वव्यापक श्रीहरि विष्णु तथा देवाधिदेव शिव की एकीकृत उपासना और कलिकाल में धर्म-संरक्षण पर आधारित है। इस पुराण में भगवान सूर्य को प्रत्यक्ष देव के रूप में पूजने और उनकी उपासना से आरोग्य, दीर्घायु तथा ज्ञान प्राप्त करने पर विशेष बल दिया गया है। इसके साथ ही, यह पुराण भावी युगों में होने वाले नैतिक एवं सामाजिक परिवर्तनों का यथार्थ चित्र प्रस्तुत करते हुए यह स्थापित करता है कि चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी विषम क्यों न हों, सनातन धर्म की ज्योति सदैव प्रज्वलित रहती है। इस ग्रंथ में वर्णाश्रम धर्म, सदाचार, विविध पावन व्रतों के पालन, सूर्योपासना के विधान, शाकद्वीपीय ब्राह्मणों के आगमन और भक्तिमार्ग की सहजता का निरूपण किया गया है। यह दिव्य पुराण मानव चेतना को जागृत करते हुए यह अमर संदेश देता है कि कलियुग के अंधकार में निष्काम भक्ति, सत्य का आचरण और सूर्य देव का ध्यान ही जीव को अज्ञान के बंधन से मुक्त कर परमगति प्रदान करने वाला सिद्ध माध्यम है।

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सरल अनुवाद

ब्राह्म पर्व

अध्याय 1 — परंपरा, वंशावली, ब्रह्मांड विज्ञान तथा पंचपर्व संरचना

शौनकादि ऋषियों के पावन सत्रयाग में महर्षि सुमंतु का राजा शतानीक की सभा में आगमन होता है, जहाँ व्यास जी की आज्ञा से भविष्य पुराण की कथा का प्राकट्य होता है। इस अध्याय में पुराण की पंचपर्व संरचना, जगदुत्पत्ति, ब्रह्मा जी के चारों मुखों से चारों वेदों का आविर्भाव, चतुरानन द्वारा वर्णाश्रम व्यवस्था की स्थापना और चार युगों के कालचक्र का अलौकिक निरूपण किया गया है।

अध्याय 2 — गर्भाधान से यज्ञोपवीत: प्रथम सोलह संस्कार

मानव जीवन को आध्यात्मिक रूप से सुसंस्कृत बनाने हेतु गर्भाधान से लेकर यज्ञोपवीत तक के पावन १६ संस्कारों का विस्तृत विधान बतलाया गया है। पुंसवन, सीमंतोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकरण और कर्णवेध आदि संस्कारों के समय, मंत्र तथा वर्णानुसार पालन योग्य नियमों का भक्तिपूर्ण निरूपण प्राप्त होता है।

अध्याय 3 — विवाह: विवाह के आठ शास्त्रीय प्रकार

पाणिग्रहण संस्कार के अंतर्गत ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गांधर्व, राक्षस और पैशाच नामक विवाह के आठ शास्त्रीय भेदों का विस्तारपूर्वक निरूपण किया गया है। इनके शुभ-अशुभ परिणामों तथा इन विवाहों से उत्पन्न होने वाली संतान के धार्मिक गुणों का प्रामाणिक विवेचन प्रस्तुत किया गया है।

अध्याय 4 — ब्रह्मचारी धर्म, ओंकार, गायत्री तथा गुरु-शिष्य संबंध

ब्रह्मचर्य आश्रम के अति कठोर नियमों, ओंकार एवं सर्वपापहारिणी गायत्री महामंत्र के अलौकिक महात्म्य का गान किया गया है। गुरु और शिष्य के मध्य विद्यमान पवित्र आध्यात्मिक संबंध की व्याख्या करते हुए आंगिरस के आख्यान द्वारा माता-पिता एवं आचार्य की देवतुल्य सेवा को सर्वोत्तम धर्म घोषित किया गया है।

अध्याय 5 — यज्ञोपवीत संस्कार और संस्कार-चक्र की पूर्णता

द्विजत्व की प्राप्ति कराने वाले यज्ञोपवीत संस्कार का पूर्ण विधि-विधान वर्णित है। यह अध्याय पूर्ववर्ती अध्यायों में वर्णित संस्कार-प्रणाली की पूर्णाहुति करते हुए यह स्थापित करता है कि दिव्य संस्कारों से संस्कृत मानव जीवन ही धर्म और ईश्वरीय अनुग्रह को प्राप्त करने का सच्चा अधिकारी बनता है।

अध्याय 6-10 — गृहस्थ धर्म: धनार्जन, दैनिक आचरण तथा पंचमहाकीर्तन

गृहस्थ आश्रम के अति महनीय दायित्वों, धर्मानुकूल धनार्जन और गृहस्थ की दैनिकचर्या का निरूपण किया गया है। ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, भूतयज्ञ और मनुष्ययज्ञ नामक पंचमहायज्ञों के नियमित अनुष्ठान का विधान बताते हुए कहा गया है कि इनका निष्ठापूर्वक पालन करने वाला गृहस्थ समस्त महायज्ञों के फल का भागी बनता है।

अध्याय 11-15 — पतिव्रता धर्म: समर्पित पत्नी के कर्तव्य

गृहस्थ जीवन के अत्यंत पावन अंग के रूप में पतिव्रता धर्म की अनुपम महिमा का गान किया गया है। परिवार की आध्यात्मिक रीढ़ के रूप में समर्पित पत्नी के कर्तव्यों, उसके पावन आचरण, व्रत-अनुष्ठानों तथा गृहस्थी में उसकी सर्वोच्च स्थिति को बतलाते हुए उसे घर की सबसे बड़ी तपस्विनी स्वीकार किया गया है।

अध्याय 16 — व्रत चक्र का शुभारंभ: प्रतिपदा व्रत

तिथियों पर आधारित भविष्य पुराण के सुप्रसिद्ध व्रत-चक्र का शुभारंभ प्रतिपदा तिथि से होता है। प्रतिपदा तिथि के अधिष्ठातृ देव, व्रत की शास्त्रीय विधि, उपवास के नियम, दान-पुण्य तथा तिथि सम्बद्ध पावन आख्यान का वर्णन करते हुए आगामी समस्त व्रत-विधान की आधारशिला रखी गई है।

अध्याय 17 — द्वितीया व्रत विधान

द्वितीया तिथि के पावन व्रत की पूजा-विधि, इसके अधिष्ठाता देव की स्तुति, उपवास के नियम तथा इस तिथि की दिव्य उत्पत्ति और महात्म्य को प्रकट करने वाली कथा का मधुर गान किया गया है।

अध्याय 18 — तृतीया व्रत और तीज पर्व माहात्म्य

तृतीया तिथि के व्रत एवं लोकप्रसिद्ध तीज पर्वों के अनुष्ठान का भक्तिमय निरूपण है। स्त्रियों के अखण्ड सौभाग्य, वैवाहिक सुख-समृद्धि तथा पारिवारिक कल्याण हेतु इस व्रत की उत्पत्ति और इसके पौराणिक महात्म्य का सजीव वर्णन प्रस्तुत किया गया है।

अध्याय 19 — चतुर्थी व्रत: च्यवन, सुकन्या एवं अश्विनिकुमार आख्यान

चतुर्थी तिथि के व्रत के साथ महर्षि च्यवन और सुकन्या की अमर कथा का वर्णन प्राप्त होता है। सुकन्या के निष्काम पतिव्रत धर्म तथा च्यवन मुनि द्वारा अश्विनिकुमारों को यज्ञ में सोमभाग दिलाने के वृत्तांत के माध्यम से चतुर्थी व्रत के अलौकिक प्रभाव को रेखांकित किया गया है।

अध्याय 20-25 — पंचमी एवं षष्ठी व्रत माहात्म्य

पंचमी तिथि के अंतर्गत नागपंचमी तथा नागदेवताओं की पूजा का विधान है, जबकि षष्ठी तिथि में भगवान स्कंद कार्तिकेय की उपासना एवं बाल-कल्याण सम्बन्धी व्रतों की कथाएँ वर्णित हैं। इन तिथियों के अधिष्ठातृ देवों के प्राकट्य और उनके व्रत-फल का विशद वर्णन किया गया है।

अध्याय 26-71 — सप्तमी व्रत: सूर्य व्रत चक्र का शुभारंभ

ब्राह्म पर्व के अति महान अंश का प्रारंभ होता है, जहाँ सप्तमी तिथि को भगवान सूर्य नारायण की परम प्रिय तिथि घोषित किया गया है। वर्ष के प्रत्येक मास की सप्तमी, विशिष्ट नक्षत्र योगों में किए जाने वाले सूर्य व्रतों, दिव्य सूर्य-स्तोत्रों तथा सूर्यदेव की कृपा से रिद्धि-सिद्धि पाने वाले भक्तों के आख्यानों का क्रमबद्ध निरूपण है।

अध्याय 72-73 — सांब-सूर्य आख्यान: दुर्वासा शाप और चंद्रभागा तट पर तपस्या

भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र सांब द्वारा दुर्वासा ऋषि के शाप से कुष्ठरोग से ग्रस्त होने और उससे मुक्ति हेतु चंद्रभागा नदी के तट पर बारह वर्षों तक किए गए सूर्यदेव के कड़े तप का वर्णन है। भगवान भास्कर ने सांब की अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें साक्षात दर्शन दिए और रोगमुक्त कर आरोग्य प्रदान किया।

अध्याय 74-126 — निरंतर मासिक सूर्य व्रत चक्र

सप्तमी तिथि से जुड़े विभिन्न मासों एवं ऋतुओं के सूर्य व्रतों की विस्तृत श्रृंखला जारी रहती है। प्रत्येक अध्याय में विशिष्ट सूर्य व्रत का नाम, संकल्प विधि, स्तोत्र पाठ, दान-माहात्म्य तथा भक्ति के प्रभाव से रोगों से मुक्ति, खोए हुए राज्य की पुनः प्राप्ति और अंततः मोक्ष की प्राप्ति का सजीव वर्णन है।

अध्याय 127-129 — सांब-सूर्य आख्यान: विश्वकर्मा निर्मित सूर्य प्रतिमा की प्राप्ति

दिव्य आरोग्य प्राप्ति के पश्चात सांब को सूर्यदेव द्वारा चंद्रभागा नदी में छिपी मूर्ति को खोजने का आदेश मिलता है। नदी के जल स्तर घटने पर सांब को देवशिल्पी विश्वकर्मा द्वारा रचित अति तेजस्वी, सर्वांगसुंदर सूर्यदेव की प्राचीन दिव्य प्रतिमा प्राप्त होती है।

अध्याय 130-132 — अयन, ग्रहण तथा खगोलीय सूर्य व्रत

उत्तरायण, दक्षिणायन, सूर्यग्रहण, चंद्रग्रहण तथा दुर्लभ खगोलीय योगों के अवसर पर किए जाने वाले अति प्रभावकारी सप्तमी व्रतों की विधि बताई गई है। इन विशेष अवसरों पर किए गए व्रत-पूजन से संचित पापों का तत्काल क्षय होता है।

अध्याय 133 — सांब-सूर्य आख्यान: मित्रवन सूर्य मंदिर की स्थापना

सूर्यदेव के निर्देशानुसार सांब ने सांबपुर (मित्रवन) में भव्य सूर्य मंदिर का निर्माण कराया और विश्वकर्मा रचित प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा की। मंदिर में सेवा-पूजा हेतु शाकद्वीप से मग ब्राह्मणों को लाने और पूजन-पद्धति स्थापित करने का ऐतिहासिक एवं पौराणिक वृत्तांत वर्णित है।

अध्याय 134-150 — सप्तमी व्रत चक्र की पूर्णाहुति

विभिन्न मासों एवं अवसरों के शेष सप्तमी व्रतों के वर्णन के साथ सौर-व्रत चक्र की पूर्णता होती है। ब्राह्म पर्व का यह भाग संपूर्ण पौराणिक साहित्य में भगवान सूर्य की उपासना का सबसे विस्तृत, क्रमबद्ध और प्रामाणिक विधान प्रस्तुत करता है।

अध्याय 151-174 — सौरधर्म: सूर्य भक्ति का संपूर्ण पथ

भगवान सूर्य द्वारा अपने सारथि अरुण को दिए गए ‘सौरधर्म’ के गूढ़ आध्यात्मिक ज्ञान का निरूपण है। इसमें सूर्यमंडल की संरचना, सप्त-अश्व रथ का रहस्य, सूर्य के २४ दिव्य स्वरूप, परिवार देव (दंड, पिंगल, नवग्रह), सूर्य नमस्कार की शास्त्रीय विधि तथा सूर्य-तीर्थ में प्राण त्यागने पर मिलने वाली परम मुक्ति का वर्णन है।

अध्याय 175-182 — अष्टमी से द्वादशी तक के पावन व्रत

सौरधर्म के पश्चात अष्टमी से द्वादशी तिथियों के व्रतों का निरूपण किया गया है। अष्टमी तिथि में शिव एवं दुर्गा पूजा, नवमी में देवी उपासना, दशमी में उत्सव व्रत, एकादशी में विष्णु भक्ति तथा द्वादशी में व्रत-समापन का शास्त्रीय विधान और आख्यान वर्णित हैं।

अध्याय 183-186 — श्राद्ध विधि तथा अशौच धर्म

पितृकार्य हेतु आवश्यक श्राद्ध के विविध प्रकारों (नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि आदि), मातृ-श्राद्ध विधि, पिंडदान के मंत्रों तथा सुपात्र ब्राह्मण लक्षणों का विवेचन है। साथ ही जन्म-मरण के समय मान्‍य अशौच नियमों और शुद्धिक्रिया का स्पष्ट वर्णन किया गया है।

अध्याय 187-197 — त्रयोदशी, चतुर्दशी तथा पूर्णिमा व्रत माहात्म्य

त्रयोदशी तिथि में यम एवं पितृ-तर्पण, चतुर्दशी में भगवान शिव की आराधना तथा पूर्णिमा तिथि में आयोजित होने वाले कार्तिक, माघ, फाल्गुन और ज्येष्ठ पूर्णिमा के महाउत्सवों एवं व्रतों के अलौकिक परिणामों का गान किया गया है।

अध्याय 198-209 — भीष्म-व्यास संवाद: सूर्य महिमा और अर्घ्य माहात्म्य

कुरुक्षेत्र में शरशय्या पर लेटे भीष्म पितामह और महर्षि वेदव्यास के मध्य सूर्य-उपासना पर अलौकिक संवाद होता है। व्यास जी बतलाते हैं कि प्रातः-सायं निष्कपट भाव से अर्पित एक अर्घ्य भी जन्मांतर के पापों को भस्म कर देता है और प्रत्यक्ष सूर्य नारायण ही साक्षात ज्ञानस्वरूप ब्रह्म हैं।

अध्याय 210-216 — ब्राह्म पर्व: फलश्रुति एवं समापन

ब्राह्म पर्व की फलश्रुति का गान करते हुए इस पर्व के पठन-श्रवण के अनंत पुण्यों का निरूपण किया गया है। संस्कारों के विधान, सूर्य-व्रत चक्र, सांब आख्यान और सौरधर्म के इस महान संग्रह को परम मंगलकारी, यशोवर्धक तथा मुक्तिप्रद घोषित कर ब्राह्म पर्व का समापन होता है।

मध्यम पर्व

प्रथम खंड – अध्याय 1 — पुराण विषय एवं पुरुषार्थ चतुर्थक निरूपण

महर्षि सूत जी शौनकादि ऋषियों को मध्यम पर्व के मुख्य विषयों का परिचय देते हैं। इसमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चार पुरुषार्थों के स्वरूप, मानव मात्र के सामान्य कर्तव्यों तथा वैदिक आचार-संहिता का निरूपण किया गया है।

अध्याय 2 — ब्रह्मांड उत्पत्ति तथा इसके लक्षण

परमब्रह्म की इच्छा से अव्यक्त प्रकृति के क्षोभ, महत्तत्त्व, अज्ञान, पंचतन्मात्राओं और पंचमहाभूतों के क्रमबद्ध विकास से ब्रह्मांड की उत्पत्ति तथा इसके विभिन्न लक्षणों का सूक्ष्म दार्शनिक निरूपण किया गया है।

अध्याय 3 — सौरमंडल एवं ग्रह-नक्षत्र व्यवस्था

सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहू और केतु की कक्षाओं, उनकी गति, नक्षत्र मंडल के प्रभाव तथा ब्रह्मांडीय पिंडों के पारस्परिक संबंधों का विशद विवरण प्रस्तुत किया गया है।

अध्याय 4 — जम्बूद्वीप संरचना एवं ग्रह-स्थिति

सात द्वीपों के मध्य स्थित जम्बूद्वीप की भौगोलिक स्थिति, नववर्षों (भारतवर्ष आदि), प्रमुख पर्वतों, नदियों तथा नवग्रहों के सूक्ष्म प्रभावों का निरूपण किया गया है।

अध्याय 5 — ब्राह्मण महिमा एवं त्याज्य दोष

सच्चे ब्राह्मण के गुणों, उसके तपोबल तथा समाज में उसके पूज्य स्वरूप का वर्णन है। साथ ही, साधक के पतन का कारण बनने वाले २६ प्रकार के सूक्ष्म दोषों (क्रोध, लोभ, असत्य आदि) का वर्जन बतलाया गया है।

अध्याय 6 से 10 — चौबीस विद्याएँ एवं संस्कार-विधान

ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, छह वेदांग, मीमांसा, न्याय, धर्मशास्त्र, पुराण, तथा आयुर्वेद, धनुर्वेद, गंधर्ववेद व अर्थशास्त्र रूपी अठारह विद्याओं के साथ-साथ अन्य व्यावहारिक कलाओं एवं संस्कारों का विस्तृत निरूपण है।

अध्याय 11 से 15 — वर्णाश्रम धर्म एवं आचार संहिता

चारों वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) तथा चारों आश्रमों (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास) के निष्काम कर्तव्यों, सामाजिक मर्यादाओं तथा दैनिक जीवन के व्यावहारिक नियमों का व्याख्यान किया गया है।

अध्याय 16 से 21 — पञ्चमहाभूत, काय-चिकित्सा एवं आहार-शुद्धि

मनुष्य शरीर की संरचना, त्रिदोष (वात्, पित्त, कफ) के संतुलन, आहार-विहार की शुद्धि, तथा सात्विक जीवन शैली द्वारा रोग-निवारण के प्रामाणिक सिद्धांतों का निरूपण प्रस्तुत किया गया है।

द्वितीय खंड (अध्याय २२ – ४०): तंत्र, मंत्र, यंत्र एवं औषधि विज्ञान

अध्याय 22 — तंत्र शास्त्र का प्रादुर्भाव एवं दीक्षा विधि

मध्यम पर्व का तांत्रिक अनुभाग प्रारंभ होता है। इसमें गुरु-शिष्य लक्षण, तांत्रिक दीक्षा के विभिन्न प्रकार (शांभवी, शाक्ती, मांत्री), तथा साधक की मानसिक पात्रता का सुंदर निरूपण किया गया है।

अध्याय 23 से 27 — गायत्री एवं सूर्य-मंत्र साधना

सर्वपापहारिणी गायत्री महामंत्र तथा भगवान सूर्य के गोपनीय बीजाक्षरों के जप, न्यास, ध्यान तथा होम की शास्त्रीय तांत्रिक विधि का वर्णन है, जिससे साधक को अमोग तपोबल की प्राप्ति होती है।

अध्याय 28 से 32 — यंत्र निर्माण एवं बीजाक्षर-विधान

सूर्य-यंत्र, विष्णु-यंत्र तथा शक्ति-यंत्रों के निर्माण हेतु भोजपत्र, स्वर्ण, ताम्र पत्र पर अंकन की विधि, बीजाक्षरों (ह्रीं, श्रीं, क्लीं आदि) के रहस्य तथा यंत्र-पूजन के चमत्कारी प्रभावों का वर्णन किया गया है।

अध्याय 33 से 36 — गरुड़ विद्या एवं विष-चिकित्सा

सपेरों, सर्पदंश एवं विषैले जीवों के प्रभाव को नष्ट करने वाली प्राचीन ‘गरुड़ विद्या’, विष-निवारक मंत्रों, जड़ी-बूटियों (दिव्य औषधियों) तथा मंत्रपूत जल के चमत्कारी प्रयोगों का विशद वर्णन है।

अध्याय 37 से 40 — शांति-कर्म एवं ग्रहापचार निवारण

नवग्रहों की प्रतिकूलता से उत्पन्न होने वाले शारीरिक एवं मानसिक कष्टों के निवारण हेतु ग्रह-शांति, अष्टोत्तरशत आहुतियों का होम, दान-दक्षिणा तथा शांति-स्तोत्रों के पाठ का विधान बतलाया गया है।

तृतीय खंड (अध्याय ४१ – ६२): वास्तु शास्त्र, राजधर्म एवं देव-प्रतिष्ठा

अध्याय 41 से 45 — वास्तु शास्त्र एवं गृह निर्माण सिद्धांत

भवन निर्माण हेतु भूमि-परीक्षा, दिशा-शोधन, वास्तु-पुरुष मंडल का पूजन, शिलान्यास विधि तथा वास्तु दोषों को दूर करने वाले शांति-सूक्तों का विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है।

अध्याय 46 से 50 — राजधर्म, नीतिशास्त्र एवं राज्याभिषेक

राजा के कर्तव्य, प्रजा-पालन के सिद्धांत, विदेश नीति (साम, दाम, दंड, भेद), दुर्ग निर्माण, सेना संचालन तथा राजा के पावन शास्त्रीय राज्याभिषेक समारोह का निरूपण किया गया है।

अध्याय 51 से 55 — धातु एवं काष्ठ प्रतिमा लक्षण

भगवान सूर्य, विष्णु, शिव तथा दुर्गा जी की मूर्तियों के निर्माण हेतु सुवर्ण, रजत, कांस्य, पाषाण एवं पवित्र काष्ठ के चयन, प्रतिमाओं के अंग-प्रत्यंग के शास्त्रीय माप का विवरण है।

अध्याय 56 से 60 — मंदिर निर्माण एवं प्राण-प्रतिष्ठा विधि

भव्य देवालयों के शिखर, मंडप, ध्वजारोहण, अधिवासन समारोह, तथा शास्त्रोक्त मंत्रों द्वारा विग्रहों में चेतना (प्राण-प्रतिष्ठा) स्थापित करने की संपूर्ण महा-विधि का गान किया गया है।

अध्याय 61 — तांत्रिक शांति-विधान एवं लोक-कल्याण

समस्त समाज को महामारी, अकाल, तथा दैवीय आपदाओं से बचाने हेतु किए जाने वाले सार्वजनिक महायज्ञों, कोटि-होम तथा तांत्रिक शांति-विधान का निरूपण है।

अध्याय 62 — मध्यम पर्व की फलश्रुति एवं समापन

मध्यम पर्व के पठन, श्रवण एवं मनन के अनंत पुण्यों का संकीर्तन करते हुए महर्षि सूत जी बतलाते हैं कि जो साधक इस पर्व में वर्णित मंत्र-तंत्र और धर्म का पालन करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर ऐहिक सुख एवं अंत में सूर्यलोक (परमपद) प्राप्त करता है।

प्रतिसर्ग पर्व

खंड 1, अध्याय 1 — सत्ययुग के राजवंश: वैवस्वत मनु तथा इक्ष्वाकु वंश

नैमिषारण्य में सूत जी ऋषियों को वैवस्वत मन्वन्तर के राजवंशों का इतिहास सुनाते हैं। सूर्यदेव के तप से जन्मे वैवस्वत मनु और उनके पुत्र इक्ष्वाकु द्वारा सूर्यवंश की स्थापना, राजा कुवलयाश्व, दृढ़ाश्व, त्रिशंकु, हरिश्चंद्र, सगर तथा अंबरीष जैसे परम धार्मिक एवं तपस्वी चक्रवर्ती राजाओं के पावन चरित्र का निरूपण किया गया है।

खंड 1, अध्याय 2 — मध्य-सत्ययुग प्रलय तथा सूर्यवंश का निरंतर प्रवाह

सत्ययुग के मध्य में आए एक महान प्रलय काल और उसके उपरांत सुदर्शन के नेतृत्व में हिमालय क्षेत्र में संस्कृति के पुनरुद्धार की कथा है। त्रेतायुग में सूर्यवंश की निरंतरता और उसमें मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामचंद्र जी के प्राकट्य की पावन पृष्ठभूमि निर्मित की गई है।

खंड 1, अध्याय 3 — युगों के माध्यम से चंद्रवंश का इतिहास

चंद्रवंश का त्रेता और द्वापर युगों में विस्तार, प्रमुख चंद्रवंशी राजाओं की वंशावली, पांडवों एवं कुरुओं के जन्म तथा कुरुक्षेत्र के महासंग्राम का संक्षिप्त वर्णन है। यह अध्याय उस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को स्थापित करता है जिस पर भविष्य की कथाएँ आधारित हैं।

खंड 1, अध्याय 4 — कलिकाल का प्रारंभ और परमार राजवंश

महाभारत युद्ध के पश्चात कलिकाल का पदार्पण, अधर्म का प्रसार, विदेशी शक्तियों के आगमन तथा परमार राजवंश के प्राकट्य की कथा है, जिस वंश में सनातन धर्म के महान रक्षक सम्राट विक्रमादित्य का जन्म होना निश्चित हुआ।

खंड 1, अध्याय 5-7 — सम्राट विक्रमादित्य का जन्म और आर्यधर्म पुनरुद्धार

भगवान शंकर के वरदान से गंधर्वसेन के घर सम्राट विक्रमादित्य का अवतार होता है। उनका मुख्य उद्देश्य भारतवर्ष में घुसे शकों और म्लेच्छों का संहार करना तथा आर्यधर्म की पुनः प्रतिष्ठा करना था। विक्रमादित्य के बाल्यकाल, ऋषियों द्वारा उनकी पहचान तथा धर्म-संस्थापन की तैयारियों का सुंदर वर्णन है।

खंड 2, अध्याय 1 — विक्रम-बेताल चक्र: बेताल पंचविंशति का आरंभ

राजा विक्रमादित्य द्वारा श्मशान में रात के समय श्मशान-वृक्ष से बेताल (शव) को ले जाने और बेताल द्वारा गूढ़ धर्म-प्रश्नों से युक्त २५ कथाएँ सुनाने का अलौकिक क्रम प्रारंभ होता है। पहला अध्याय इस अद्भुत धर्म-विचार की पृष्ठभूमि तैयार करता है।

खंड 2, अध्याय 2-23 — बेताल की बाईस नीतिमय कथाएँ

बेताल राजा विक्रमादित्य को न्याय, विवाह, कर्तव्य, सत्य और अधर्म से जुड़ी नीतिपूर्ण कथाएँ सुनाता है। राजा द्वारा सही उत्तर देते ही बेताल पुनः वृक्ष पर जा लटकता है। इन कथाओं के माध्यम से राजा और प्रजा हेतु धर्म-अधर्म के सूक्ष्म रहस्यों को उजागर किया गया है।

खंड 2, अध्याय 24-29 — श्री सत्यनारायण व्रत कथा

भगवान श्रीहरि विष्णु द्वारा नारद जी को कलिकाल के परम सुलभ श्री सत्यनारायण व्रत की महिमा का निरूपण है। निर्धन ब्राह्मण, लकड़ी बेचने वाला भील, साधु वैश्य, और राजा तुंगध्वज के दृष्टांतों के माध्यम से श्रद्धापूर्वक सत्यदेव के पूजन से समस्त संकटों के नाश और परमपद की प्राप्ति का गान किया गया है।

खंड 2, अध्याय 30-32 — पाणिनि का तप और माहेश्वर सूत्रों की प्राप्ति

व्याकरणाचार्य पाणिनि के पूर्वजन्म (पितृशर्मा) की कथा तथा केदार क्षेत्र में भगवान शिव की कठोर तपस्या का वर्णन है। शिव जी ने प्रकट होकर अपने डमरू वादन से १४ ‘माहेश्वर सूत्र’ प्रदान किए, जिससे संस्कृत व्याकरण की दिव्य आधारशिला रखी गई।

खंड 2, अध्याय 33-35 — दुर्गा सप्तशती माहात्म्य: तीनों चरित्रों की महिमा

श्री दुर्गा सप्तशती के तीन चरित्रों का माहात्म्य बतलाया गया है। प्रथम चरित्र से वेदविद्या की प्राप्ति, मध्यम चरित्र से महालक्ष्मी की कृपा और उत्तम चरित्र से महासरस्वती की अनुकंपा द्वारा सर्वज्ञता प्राप्त होने के पावन आख्यान दिए गए हैं।

खंड 3, अध्याय 1 — आल्हा-खंड: कलिकाल में पांडवों का पुनर्जन्म

महाभारत युद्ध की अंतिम रात्रि में श्रीकृष्ण-शिव संवाद के अनुसार कलिकाल में पांडवों के पुनरवतार की भविष्यवाणी है। युधिष्ठिर का मलखान, भीम का वीरन, अर्जुन का परिमल, और श्रीकृष्ण के अंश का आल्हा के रूप में बुंदेलखंड की पावन धरा पर प्राकट्य और धर्म युद्ध का वर्णन है।

खंड 3, अध्याय 2-4 — शालिवाहन, म्लेच्छ आचार्य तथा राजा भोज का दिग्विजय

विक्रमादित्य के पौत्र राजा शालिवाहन की हिमालय में विदेशी आचार्य से भेंट और सनातन धर्म की श्रेष्ठता की स्थापना का प्रसंग है। साथ ही धारानगरी के राजा भोज के दिग्विजय अभियान और महाकालेश्वर की कृपा से विजय प्राप्त करने का वर्णन है।

खंड 4, अध्याय 1 — कलिकाल के राजवंश: आंध्र वंश तथा राजपूत राजा

कलिकाल के उत्तरार्ध में आंध्र वंश (सातवाहन) तथा सूर्य-चंद्र वंश की शाखाओं से प्रादुर्भूत विभिन्न राजपूत राजवंशों के उत्थान और उनके धार्मिक आचरण का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया है।

खंड 4, अध्याय 2-6 — दिल्ली सल्तनत और विदेशी आक्रमणों का संकेत

भारतवर्ष में विदेशी आक्रमणकारियों के आगमन, मंदिरों के विनाश और कलिकाल के भीषण प्रभाव का भविष्यद्वक्ता रूप में वर्णन किया गया है, जिसे धर्म के ह्रास और आचार्यों के अवतरण की पृष्ठभूमि के रूप में दिखाया गया है।

खंड 4, अध्याय 7-12 — सूर्यदेव की कृपा से महान आचार्यों का प्राकट्य

कलिकाल में सनातन धर्म की रक्षा हेतु भगवान सूर्य एवं ईश्वर के अंश से महान आचार्यों के अवतरण की अमर कथा है। काशी में धन्वंतरि, बंगाल में जयदेव जी (गीतगोविंद रचयिता), जगद्गुरु आदि शंकराचार्य, श्री रामानुजाचार्य और श्री मध्वाचार्य के अलौकिक प्राकट्य एवं धर्म-रक्षा अभियानों का वर्णन है।

खंड 4, अध्याय 13-21 — चैतन्य महाप्रभु: कलिकाल का परम दिव्य अवतार

गौड़ देश (बंगाल) में माता शची के घर ‘कृष्ण-चैतन्य’ के रूप में स्वयं भगवान के प्राकट्य और हरिनाम संकीर्तन आंदोलन के विस्तार की परम पावन कथा है। श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा कलिकाल में ‘हरे कृष्ण’ महामंत्र को परम साधन के रूप में स्थापित करने का महात्म्य वर्णित है।

खंड 4, अध्याय 17-18 — भक्ति संतों के पूर्वजन्म: कबीर, नरसी, मीरा, नानक व रैदास

कलिकाल को तारने वाले महान निरोग तथा सगुण संतों — कबीरदास, नरसी मेहता, भक्त पीपा, गुरु नानक देव, नित्यानंद प्रभु, संत रैदास तथा साधना कसाई के पूर्वजन्मों एवं उनकी अनन्य भगवद्भक्ति की पावन कथाएँ कही गई हैं।

खंड 4, अध्याय 22-23 — अकबर, सूरदास तथा उत्तर-कलिकाल

मुग़ल काल का संदर्भ और महान अष्टछाप कवि संत सूरदास जी की अलौकिक कृष्णभक्ति का वर्णन है, जो यह दर्शाता है कि बाह्य उथल-पुथल के बीच भी भक्ति की अंतरंग धारा सदैव प्रवाहित रहती है।

खंड 4, अध्याय 24-26 — कलियुग के चार चरण, कल्कि अवतार और सत्ययुग वापसी

कलियुग के चारों चरणों में धर्म के घटते प्रभाव और अंत में संभल ग्राम में भगवान कल्कि के अवतार का प्रसंग है। भगवान कल्कि दुष्टों का संहार कर अधर्म का अंत करेंगे और पुनः धर्म की स्थापना कर स्वर्णिम सत्ययुग का शुभारंभ करेंगे।

उत्तर पर्व

अध्याय 1 — उत्तर पर्व का आमुख: पुलस्त्य-प्रियव्रत संवाद

कुरुक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण राजा युधिष्ठिर को महर्षि पुलस्त्य और राजा प्रियव्रत के प्राचीन संवाद के माध्यम से समस्त पावन व्रतों, महादानों, उपाख्यानों तथा सदाचार के नियमों का ज्ञान प्रदान करते हैं।

अध्याय 2 — प्रतिपदा एवं द्वितीया व्रत: उत्तर पर्व के व्रतों का प्रारंभ

उत्तर पर्व के तिथिव्रतों का शुभारंभ होता है, जिसमें प्रतिपदा और द्वितीया तिथियों के अधिष्ठातृ देवों की पूजा, उपवास के नियम तथा सर्ववर्णों हेतु सुलभ फलदायिनी साधनाओं का वर्णन किया गया है।

अध्याय 3 — नारद-माया-सुंदरी: संसार की मोहमाया का निरूपण

तृतीया व्रत के अंतर्गत नारद जी का स्त्री रूप (सुंदरी) धारण करने और गृहस्थ जीवन के ५० वर्षों के मोह-जाल को एक क्षण में अनुभव करने का अलौकिक आख्यान है, जो यह दर्शाता है कि यह संपूर्ण संसार श्रीहरि की महामाया ही है।

अध्याय 4-22 — चतुर्थी से सप्तमी तक के पावन व्रत

चतुर्थी में गणपति पूजा, पंचमी में नाग पूजा, षष्ठी में कार्तिकेय एवं बाल-रक्षा व्रत तथा सप्तमी में भगवान सूर्य की असीम कृपा प्राप्त करने वाले पावन व्रतों और उनकी विधि का वर्णन प्राप्त होता है।

अध्याय 23 — स्वर्णष्ठीवी तथा जातिस्मर भद्र व्रत

जन्म से स्वर्ण त्याग करने वाले राजकुमार स्वर्णष्ठीवी की कथा तथा पूर्वजन्म के व्रतों की स्मृति बनाए रखने वाले ‘जातिस्मर भद्र व्रत’ के अनुष्ठान का सुंदर विवरण प्रस्तुत किया गया है।

अध्याय 24-54 — अष्टमी से एकादशी तक के महाव्रत

अष्टमी में शिव-दुर्गा पूजा, नवमी में देवी आराधना तथा एकादशी में सर्वपापहारिणी विष्णु-भक्ति के कड़े उपवासों की महिमा बताई गई है। एकादशी व्रत को समस्त पापों से मुक्त कर परमपद देने वाला सर्वोत्तम व्रत कहा गया है।

अध्याय 55 — श्रीकृष्ण जन्माष्टमी: सर्वश्रेष्ठ तिथि व्रत

भाद्रपद कृष्ण अष्टमी (रोहिणी नक्षत्र) पर भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव रूपी जन्माष्टमी व्रत का संपूर्ण विधि-विधान वर्णित है। अहोरात्र उपवास, मध्यरात्रि बाल-मुकुंद पूजन तथा दान की पावन विधि बताई गई है।

अध्याय 56-68 — नवमी से एकादशी व्रतों की निरंतरता

अशोक नवमी, महानवमी तथा वर्ष भर की विभिन्न एकादशियों के पावन माहात्म्य एवं उनके अनुष्ठान की कथाओं का क्रमबद्ध विवेचन किया गया है।

अध्याय 69 — गोवत्स द्वादशी: गौ-वत्स पूजन व्रत

कार्तिक शुक्ल द्वादशी को मनाए जाने वाले गोवत्स द्वादशी व्रत का निरूपण है, जहाँ गाय और बछड़े को सर्वदेवमय मानकर पूजन किया जाता है। भक्त ध्रुव की माता सुनीति द्वारा इस व्रत को करने से ध्रुव को प्राप्त हुई ईश्वरीय रक्षा का आख्यान वर्णित है।

अध्याय 70-101 — त्रयोदशी, चतुर्दशी तथा पूर्णिमा महाव्रत

त्रयोदशी में यम-पूजा, चतुर्दशी में महाशिवरात्रि व्रत का अलौकिक माहात्म्य तथा पूर्णिमा तिथियों में शरद पूर्णिमा, होलिका तथा गुरु पूर्णिमा जैसे महाउत्सवों के अनुष्ठान का विस्तृत गान किया गया है।

अध्याय 102 — सावित्री व्रत: यमराज से पतिप्राण रक्षा

ज्येष्ठ पूर्णिमा को किए जाने वाले वट-सावित्री व्रत की प्रसिद्ध कथा है, जहाँ सती सावित्री ने अपने पातिव्रत्य धर्म और ज्ञानबल से यमराज को प्रसन्न कर अपने मृत पति सत्यवान के प्राणों को पुनः प्राप्त किया।

अध्याय 103 — महाकार्तिकी: अपूर्ण व्रत और कलिंग भद्रा के तीन जन्म

कार्तिक पूर्णिमा (महाकार्तिकी) के व्रत की महिमा का वर्णन है। महारानी कलिंग भद्रा के अपूर्ण व्रत के कारण तीन जन्म लेने और अंततः व्रत पूर्ण कर मोक्ष प्राप्त करने की कथा यह सिखाती है कि व्रत का पुण्य कभी निष्फल नहीं जाता।

अध्याय 104-113 — वार-व्रत: सातों वारों के पूजन नियम

सप्ताह के सातों दिनों (रविवार से शनिवार) के अधिष्ठातृ देवों (सूर्य, शिव-चंद्र, स्कंद, विष्णु, बृहस्पति, लक्ष्मी, शनि) के वार-व्रतों की सहज विधि बताई गई है, जो गृहस्थों हेतु परम कल्याणकारी हैं।

अध्याय 114 — पिप्पलाद और शनैश्चर: शनिवार व्रत की कथा

महर्षि पिप्पलाद द्वारा शनिदेव को अपने तपोबल से परास्त करने और तत्पश्चात शनिवार व्रत, पीपल पूजा, तिल-तेल दान तथा पिप्पलाद स्तोत्र के द्वारा शनि-दोष निवारण का पावन विधान स्थापित करने का आख्यान है।

अध्याय 115-116 — नक्षत्र एवं योगों पर आधारित विशेष व्रत

विशिष्ट नक्षत्रों एवं दुर्लभ खगोलीय योगों में किए जाने वाले विशेष व्रतों की शास्त्रीय विधि बताई गई है, जो जीवन में अचानक आने वाली बाधाओं को शांत कर मंगल प्रदान करते हैं।

अध्याय 117-118 — अगस्त्य-अर्घ्य तथा भद्रा शांति विधान

कन्या राशि के सूर्य में अगस्त्य तारे के उदय पर दिए जाने वाले स्वर्ण-अगस्त्य अर्घ्य का माहात्म्य तथा पंचांग की विष्टि (भद्रा) के अशुभ प्रभाव को शुभ में बदलने वाले भद्रा-शांति विधान का वर्णन है।

अध्याय 119-128 — सांभरायणी व्रत: मास-नक्षत्र व्रत प्रणाली

स्वर्ग की सिद्धा सांभरायणी द्वारा वर्ष के बारह मासों की पूर्णिमा को नक्षत्रों के योगानुसार किए जाने वाले ‘मास-नक्षत्र व्रतों’ की खगोलीय एवं आध्यात्मिक साधना का सुंदर निरूपण किया गया है।

अध्याय 129-174 — विशेष एवं ऋतु संबंधी व्रत तथा स्त्री-सौभाग्य व्रत

ऋतु संबंधी व्रतों, ग्रहण-संक्रांति व्रतों तथा स्त्रियों के अखण्ड सौभाग्य, संतान-रक्षा और सुख-समृद्धि हेतु किए जाने वाले विविध सौभाग्य व्रतों एवं अनुष्ठानों की शास्त्रीय विधि बताई गई है।

अध्याय 175 — तुलापुरुष महादान: भार तुल्य सुवर्ण दान

महादानों में सर्वश्रेष्ठ ‘तुलापुरुष दान’ का विधान है, जिसमें साधक अपने भार के बराबर सुवर्ण का दान ब्राह्मण को देता है। इस दान से १०,००० अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त होता है।

अध्याय 176 — हिरण्यगर्भ महादान: सुवर्ण ब्रह्मांड दान

सुवर्ण निर्मित ब्रह्मांड रूपी पात्र में तिल एवं रत्न भरकर दिए जाने वाले हिरण्यगर्भ दान का निरूपण है, जिससे साधक पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त होकर ब्रह्मलोक प्राप्त करता है।

अध्याय 177 — ब्रह्मांड महादान: १४ लोकों का सुवर्ण दान

चौदह लोकों की प्रतिकृति वाले सुवर्ण ब्रह्मांड का दान करने की महिमा और राजा सुद्युम्न की कथा वर्णित है, जिन्होंने इस दान को करके ब्रह्मलोक में स्थायी स्थान प्राप्त किया।

अध्याय 178-179 — कल्पवृक्ष महादान: सुवर्ण कल्पवृक्ष दान

पाँचों मुख्य देवताओं से सुशोभित स्वर्ण निर्मित कल्पवृक्ष के दान की अलौकिक विधि बताई गई है, जो साधक की समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण कर मोक्ष प्रदान करता है।

अध्याय 181-190 — कालपुरुष महादान तथा १० दशदान

काल के प्रतीक सुवर्ण कालपुरुष दान तथा दस प्रकार के महादानों — धेनु, भूमि, स्वर्ण, तिलशैल, घृतपर्वत, लवणचल, धान्यशैल, गुड़पर्वत, कपासशैल और रजताचल दान की विधि एवं महिमा बताई गई है।

अध्याय 191-193 — भुवन-प्रतिष्ठा दान: राजा राजी की कथा

स्वर्ण निर्मित विश्व मॉडल के दान (भुवन-प्रतिष्ठा) की महिमा और चक्रवर्ती राजा राजी के पूर्वजन्म की कथा है, जिनके इस दान के प्रभाव से उन्हें तीनों लोकों का आधिपत्य प्राप्त हुआ था।

अध्याय 195-204 — महापर्वत दान: दस पर्वताकार दान

तिल, गुड़, धान्य, घृत, लवण आदि दस पवित्र वस्तुओं के पर्वताकार दान की विस्तृत विधि बताई गई है, जिसे महादान यज्ञ की पूर्णाहुति माना जाता है।

अध्याय 205 — सदाचार: समस्त धर्मों की आधारशिला

भगवान श्रीकृष्ण राजा युधिष्ठिर को बतलाते हैं कि समस्त व्रतों, पूजाओं और दानों की सफलता का एकमात्र मूल ‘सदाचार’ (शुद्ध दैनिक आचरण) है। आचारहीन व्यक्ति को ६ अंगों सहित पड़े वेद भी पवित्र नहीं कर सकते।

अध्याय 206-207 — उत्तर पर्व: फलश्रुति तथा अंतिम मंगल संदेश

उत्तर पर्व की फलश्रुति का गान करते हुए संपूर्ण भविष्य पुराण का समापन किया जाता है। इस पावन पुराण का भक्तिपूर्वक श्रवण करने वाले भक्त पर भगवान श्रीकृष्ण की अनन्त कृपा बरसती है और उसे परम गति की प्राप्ति होती है।

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