देवगुरु बृहस्पतिने कहा- देवेन्द्र ! प्राचीन कालमें किसी समय वेदपारङ्गत विष्णुशर्मा नामके एक ब्राह्मण थे। वे प्रसन्नचित्तसे सर्वदेवमय विष्णुकी पूजा करते थे, इसलिये देवतालोग भी उनकी प्रतिष्ठा करते थे। वे भिक्षावृत्तिसे जीवननिर्वाह करते थे, उनकी स्वी थी किंतु कोई पुत्र न था। एक समय उनके परपर कोई अतिथि आया। दयालुहृदय उस महात्माने विष्णुशमांकी स्त्रीको आर्थिक स्थिति तथा नम्रता देख उसे तीन दिनों के लिये एक पारसमणि दो और कहा कि इसके स्पर्शसे लोहा भी सोना हो जाता है। इतने दिनों में मैं सरयुमें खान कर तुम्हारे पास लौट आऊँगा। उसके जानेपर ब्राह्मणी ने उस पाणसे पर्याय सोना तैयार कर लिया। तबतक विष्णुशर्मा भी आ गये। उन्होंने अपार सुवर्णराशिसे सम्पन्न अपनी पनीको देखकर कहा- 'जहाँ वह पारसमणिका स्वामी गया है, तुम भी वहीं चली जाओ। मैं अकिशान है, विष्णुभक्त हूँ। चोर-डाकुओके भयसे चनका संग्रह नहीं करता। इसपर उनकी पतिव्रता पजी-हर गयो और पारसमणि उसे समर्पित कर पुन उनकी मेला तत्पर हो गयी। ब्राह्मण विष्णुशर्माने उस सारे धन एवं पारसको घर्घरा-सरयू नदीमें फेंक दिया। तीन दिनोंके बाद उस अतिथिने आकर ब्राह्मणीसे पूछा कि क्या तुमने पारसमणिसे सोना नही बनाया उसने कहा- मेरे पतिने उसे क्रोधपूर्वक ग्रहणकर घाघरामें फेंक दिया। उस दिनसे मैं जिस-किसी प्रकार लोहेके मर्तनोंके अभावमें आगमें ही भोजन बना रही हूँ।' यह सुनकर वह यति आश्चर्यचकित हो गया। दिनभर वहीं रुका रहा। संध्यासमय ब्राह्मणके आनेपर उसने रुक्षस्वरमें कहा-'ब्राह्मण! तुम दैवद्वारा मोहित प्रतीत होते हो; क्योंकि तुम दरिद्र भी हो और धन भी संग्रह नहीं करना चाहते हो। अत: मेरा पारस शीघ्र ही लौटा दो, नहीं तो मैं अपना प्राण त्याग दूँगा।' यतिके इस प्रकार कहनेपर विष्णुशनि कहा-'तुम घाघराके किनारे जाओ, वहीं तुम्हारा पारस मिल जायगा।' यह कहकर यतिके साथ वहाँ जाकर उसने बहुत से कंटकोंसे ढके अनेक पारसमणियोंको उसे दिखाया। उस यतिने ब्राह्मणको नमस्कार कर नम्रतापूर्वक कहा-'मैंने बारह वर्षोंतक भलीभाँति शिवको आराधना की, तब मैंने इस शुभ रनको प्राप्त किया। विप्रश्रेष्ठ ! आपके दर्शनभात्रसे हो मुझ लोभात्याने आज अनेकों पारसमणियोंको प्राप्त कर लिया।' यह कहकर उससे शुभ ज्ञान प्राप्त कर मोक्ष प्राप्त कर लिया। इधर विष्णुशर्माने एक हजार घर्षातक पृथ्वीपर रहकर सूर्यको आराधना करके विष्णुलोकको प्राप्त किया। वे ही विष्णुशर्मा वैष्णव तेज धारणकर फाल्गुनके महीने में तीनों लोकोंमें तप रहे है और देवकार्य सिद्ध कर रहे हैं।
देवेन्द्र ! फाल्गुन मासमें उन सूर्यको आराधना कर तुम भी सुख प्राप्त करो। उन्होंने देवताओंके साथ ऐसा ही किया। प्रसन्न हो भगवान् सूर्य सूर्यमण्डलसे प्रकट होकर सभी देवताओंके देखते देखते इन्फे शरीर प्रविध हो गये। उस जसे जन्हो अपना शरीर जयोनिज विपरूप धारण किया भीर शचीदेवी भी योगे बाणोके रूपमें अवतीर्ण हुईं। एक वर्ष बाद शवादे को गर्भ भादपद मासके राम पाने गुरुवारको दादरे तिथिमें ब्राह्मवेलामें एक दिव्य बालकका जन्म हुआ। जो वास्तवमें भगवान् विष्णुके कलावतार थे। उस समय रुद्र, वसु, विश्वेदेव, मरुद्गण, साध्य, सिद्ध तथा भास्कर आदि देषोंने उस सनातन हरिरूप बालककी दिव्य स्तुति की और कलियुगमें दितिपुत्रोंद्वारा पीड़ित देवताओं तथा अधर्मसे दुःखी पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये प्रार्थना की। यही आगे चलकर श्रीकृष्णचैतन्यके नामसे विख्यात हुए।
सूतजी बोले-मुने! स्तुतिके अनन्तर सभी देवगण बृहस्पतिके पास आकर कहने लगे- महाभाग! हम सभी रुद्रगण, ये वसुगण तथा अश्विनीकुमार पृथ्वी पर किस-किस अंशरूपमें अवतरित होंगे, इसे आप बतलानेकी कृपा करें।
बृहस्पतिने कहा- देवगणो ! इस विषयमें आप-लोगों को मैं एक दूसरी बात बता रहा हूँ-प्राचीन कालमें मृगव्याध नामका एक अधन ब्राह्मण था। वह मार्गमें सदा धनुर्बाण धारणकर विप्रोंको हिंसा किया करता था। वह महामूर्ख ब्राह्मणों को मारकर उनके यज्ञोपवीतोंको ग्रहणकर उत्साहपूर्वक शोर मचाता था । वह दुष्ट द्विजाधम तीनों वर्गों को, विशेषकर ब्राह्मणोंको मारता था। उस समय ब्राह्मणोंका विनाश देखकर देवगण भयभीत हो ब्रह्माके पास आये और सभी बातें उन्हें बतायीं। यह सुनकर दुःखी हो ब्रह्माने सभी लोकों में गमन करनेवाले सप्तर्षियोंसे कहा-'द्विजोनमो। आप सभी वहाँ जाकर भगव्याधको समझायें।' यह सुनकर बसिष्ठ आदि ऋषियोंके साथ गरीचि मृगच्याच बन गये। पुनर्बाणधारी महाबली मृगव्याधने उन लोगोंको देखकर भयंकर वचन चाहा-'आज मैं तुमलोगोको मारगा।' मरीचि आदिने हराकर कहा-'तुम हमालोको क्यों मारोगे ? कुलके लिये सरोगे या अपने लिये यह शोध बताओ। यह सुनकर उस मृगव्याधने कहा- मैं अपने कुलके लिये और अपने कल्याणके लिये (तुमलोगोंको) मारुँगा।
यह सुनकर उन लोगोंने कहा-'धनुर्धर! अपने घरमें यह पूछकर शीघ्र आओ कि विप्रहत्यासे किये गये पापोंको कौन भोगेगा? यह विचार करो।' यह सुनकर उस घोरात्माने अपने कुलवालोंसे पूछा-'आजतक मैंने जो पाप अर्जित किया है, उसे तुमलोग भी वैसे ही ग्रहण करो, जैसे धनको ग्रहण किया है।' उस अधम ब्राह्मणके इस वचनको सुनकर उसके कुटुम्बियोंने कहा-'हमलोग तुम्हारे किये गये पापको ग्रहण नहीं करेंगे, क्योंकि यह भूमि और ये सूर्य साक्षी हैं, हमलोगोंने कोई पाप नहीं किया है।' यह सुनकर उस मृगव्याधने मुनियोंकि पास जाकर हाथ जोड़कर कहा-'महात्माओ! जिस प्रकार मेरे पापोंका क्षय हो, आपलोग वैसा उपाय बतायें।' मृगव्याधके यह कहनेपर ऋषियोंने कहा-' एक उत्तम मन्त्र है, उसे सुनो-वह है 'रामका नाम।' यह सभी प्रकारके पापोंको दूर करनेवाला है। अब हमलोग जा रहे हैं, जबतक वापस तुम्हारे पास न आ जायें, तबतक तुम इस महामन्त्र अर्थात् राम नामका जप करो। यह कहकर मुनिगण तीर्थान्तरों में भ्रमण करने चले गये और वह मूर्ख व्याध विप्र 'मरा-मरा' का हजार वर्षतक निरन्तर जप करता रहा। उसके जपके प्रभावसे वह अरण्य उत्पलों (कमलों)-से परित्याप्त हो गया और तभीसे वह स्थान पृथ्वीपर उत्पलारण्यके नामसे प्रसिद्ध हो गया।
अनन्तर सता बल्मीक बने उस गुगब्याधके पास आये और उसकी मिट्टी हटाकर उसको शुद्ध विप्रक रूपमें देखकर आश्चर्यचकित होकर कहने लगे-'वल्मीकसे निकलने के कारण तुम वाल्मीकि कहे जाओगे। त्रिकालज्ञ महामति विप्र ! तुम इसी नामसे प्रसिद्ध होओगे।' यह कहकर वे सप्तर्षि अपने-अपने स्थानपर चले गये। वाल्मीकिमुनिने अष्टादश कल्पसमन्वित शतकोटिविस्तृत तथा सभी पापोंका विनाशक निर्मल पद्यबद्ध रामायणका निर्माण किया। अनन्तर वे शिव होकर वहीं निवास करने लगे। देवगणो! हरको प्रिय लगनेवाले उस मृगव्याध शिवके चरित्रको आपलोग सुनें ।
वैवस्वत मन्वन्तरके आद्य सत्ययुगमें ब्रह्माने उत्पलारण्यमें आकर एक यज्ञ किया। उस समय वहाँपर सरस्वतीदेवी नदी होकर आ गयीं। अनन्तर ब्रह्माने अपने मुखसे कल्याणकारी ब्राह्मणों, बाहुओंसे क्षत्रियों, ऊरुसे उत्तम वैश्यों और पैरोंसे शुभाचारसम्पन्न शुोको उत्पन्न किया। द्विजराज सोम (चन्द्रमा), सूर्य, तेज वीर्यकी रक्षा करनेवाले कश्यप, मरोचि, रत्नाकर, अर्थात् समुद्र एवं प्रजापति आदिको भी उत्पन्न किया। दक्षके मनसे अनेक कन्याएँ उत्पन्न हुई। विमायाले प्रभावसे वे कलाओंके रूप में पृथ्वी पर स्थित हुई। भगवान् ब्रह्माने अश्विनी आदि सत्ताईस नक्षत्र लोककी अभिवृद्धिके लिये सोमको तथा दोरह अदिति आदि कन्याएँ कश्यपको और कीर्ति आदि कन्याएँ धर्मको प्रदान की। उन्होंने वैवस्वत मन्वन्तरमें अनेक सृष्टियाँ की। ब्रह्माको आज्ञाके अनुसार पृथ्वी पर दक्ष उन लोगों के प्रजापति हुए। यज्ञमें तत्पर दक्ष प्रजापतिने स्वयं वहाँ निवास किया। सभी देवगण दक्षको नमस्कार कर वहाँ विचरण करते थे, किंतु भूतनाथ महादेवने कभी उनको नमस्कार नहीं किया। इससे कुद्ध होकर दक्षने यज्ञमें उन्हें भाग नहीं दिया। मृगव्याध शिव क्रुद्ध होकर वीरभद्र के रूप में प्रकट हो गये। उनके
रामनाम हि तज्ज्ञेयं सांधौघविनाशनम् ।
(प्रतिसर्गपर्य ४। १० । ५२)
२-मराभरामरेत्येवं सहस्वायद जजाप
जपप्रभावाभिवहनमुत्पलसंकुलम्
सास्थानमुत्पलारण्यं प्रसिद्धमभवद्भुवि ।
(प्रतिमर्गपर्व ४१०-५४)
३-वल्मीकिनिः सूतो यस्मात् तस्माहाल्मीतिरुत्तमम् ।
तब नाम भवद्विप त्रिकालज्ञ महामते ॥
(प्रतिसर्गपर्व ४॥ १०॥ ५६)
साथ त्रिशिरा, त्रिनेत्र और त्रिपद शिवगण भी वहाँ आये। वीरभद्र आदिके द्वारा देव, मुनिगण और पितृगण पीड़ित होने लगे। उस समय यज्ञपुरुष भयभीत हो मृग होकर शीघ्रतासे भागने लगा। तब शिवने व्याधरूपको धारण किया । रुद्ररूपी व्याधके द्वारा वह मृग छिन्न-भिन्न अङ्गवाला हो गया। तब भगवान् ब्रह्माने मधुर स्तुतियोंसे रुद्रव्याधको संतुष्ट किया। संतुष्ट मृगव्याधने दक्षके यज्ञको पूर्ण कराया। तुलाराशिमें सूर्यके आनेपर उस रुद्रको सत्ताईस नक्षत्रवाले चन्द्रमण्डलमें स्थापित कर स्वयं ब्रह्मा सत्यलोकको चले गये और रुद्र चन्द्रके समान रूपवान् हो गये। वीरभद्र रुद्रने यह सुनकर प्रसन्नचित्त हो अपने शरीरसे एक तेजको उत्पन्न कर भैरवदत्त नामक विपके घरमें भेजा। घोर कलियुगमें वही शिव शंकर (शंकराचार्य) नामसे उसके पुत्ररूपमें अवतरित हुए। वह बालक गुणवान्, सकल शास्त्रवेत्ता एवं ब्रह्मचारी हुआ। उसने शांकरभाष्यकी रचना कर शैवमतको प्रतिष्ठित किया और त्रिपुण्ड्र, अक्ष (रुद्राक्ष)-माला और पञ्चाक्षर-मन्त्र प्रदान किया। (अध्याय १०)